Wednesday, March 7, 2018

NCERT की पुस्तकों में मुग़लो का नही शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप का इतिहास होगा

March 7, 2018

🚩देश का भविष्य आने वाले बच्चे होते हैं अगर उनको गलत इतिहास पढ़ाया जाता है तो आगे चलकर देश के लिए रक्षक बनने की जगह देश के भक्षक बन जाते हैं। आजतक बच्चों को विदेशी अंग्रेज एवं मुगल बाबर, अकबर, औरंगजेब आदि #आक्रमणकारी, क्रूर, लुटेरे, #बलात्कारियों का #इतिहास #पढ़ाया #जाता था जिसमें बच्चे उनसे वैसी ही प्रेरणा लेते थे जैसे उन्होंने शोषण के कार्य किये हैं लेकिन देश, धर्म के लिए अपने प्राणों की बलि देने वाले #महापुरुषों का #इतिहास #नही #पढ़ाया #जाता था अब NCERT की पुस्तकों में इनका इतिहास पढ़ाया जायेगा ये अत्यंत खुशी की बात है ।
In the books of NCERT, there will be no history of the
Mughals Shivaji Maharaj, Maharana Pratap

🚩#छत्रपति शिवाजी महाराज, #महाराणा प्रताप, #बाजीराव पेशवा आदि #राष्ट्रीय #महापुरुषों के #योगदान से आज #हिन्दू समाज #अभिमान के साथ जी रहा है । दुर्भाग्य से केंद्रीय स्तर की ‘एन.सी.ई.आर.टी.’ की पुस्तकों में अनेक वर्षों से छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास केवल 6 पंक्तियों में पढाया जाता था, और महाराणा प्रताप के नाम का तो केवल उल्लेख रहता था । इसके विपरीत अकबर, बाबर आदि आक्रमणकारी मुगलों का इतिहास अनेक पन्नों में पढाया जाता था । वर्ष 2008 से हिन्दू जनजागृति समिति इस विषय में राष्ट्रीय स्तर पर अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों के साथ मिलकर आंदोलन कर रही है । परिणामस्वरूप, वर्ष 2008 में गोवा शासन ने  समिति के इस आंदोलन का संज्ञान लेकर, इतिहास की पुस्तक निरस्त की और इसमें छत्रपति शिवाजी महाराज तथा छत्रपति संभाजी महाराज का पाठ जोडकर, नई पाठ्यपुस्तक विद्यार्थियों को दी ।

🚩मुगलों को आदर्श माननेवाली कांग्रेसी सरकार महाराष्ट्र और देहली में पैर जमाए बैठी थी । इसलिए उन्हें इसमें परिवर्तन करने की इच्छा नहीं हुई । वर्ष 2014 में हिन्दुत्वनिष्ठ सरकार सत्ता में आने के पश्‍चात भी इस विषय का अनेक बार स्मरण दिलाया गया । अंततः यह प्रयास सफल हुआ । 

🚩अब केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला किया है, NCERT की किताबों का सिलेबस अब बदला जायेगा, और कक्षा 7 की किताब में शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप इन दोनों पर अब चैप्टर होंगे, कक्षा 7 के बच्चों को भारत के इन 2 महान शूरवीरों के बारे में असली जानकारी दी जाएगी, इसके साथ साथ केंद्र सरकार NCERT की किताबों में और बदलाव करने जा रही है ।

🚩अब इस्लामिक हमलावरों को जहाँ जहाँ भी महान बताया गया है वो सब हटाया जायेगा और असली नायकों को सिलेबस में शामिल किया जायेगा, 7वी. की किताब में शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप पर चैप्टर एक शुरुवातभर है, ये कदम बहुत जरुरी था और 2014 में जब से भाजपा सरकार बनी है तभी से ये मांग की जा रही थी कि इतिहास की किताबों से गलत चीजें हटाई जाये जो सेकुलरों और वामपंथियों ने भरी हुई है ताकि देश की पीढ़ी ये जान सके कि अकबर नहीं बल्कि महाराणा प्रताप विजेता थे और महान थे,  औरंगजेब नहीं शिवाजी महाराज असली महान थे ।

🚩आपको बता दें कि हिन्दू जनजागृति समिति तो इस मांग को लेकर पिछले कई सालों से प्रदर्शन भी कर रही थी, पिछले दिनों योगी आदित्यनाथ ने भी कहा था कि इतिहास की किताबों को फिर से लिखने की जरुरत है और उसमें जो गंदगी भर दी गई है उसे साफ़ करना आवश्यक है और अब शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप पर पुरे चैप्टर होंगे NCERT की किताब में, #अगले #सत्र से कक्षा #7 के #बच्चे राजे और #राणा को #पढ़ेंगे और उनकी #महानता को #जानेंगे ।

🚩हिन्दू जन जागृति एवं जिन संगठनों ने इसमें प्रयत्न किया उन सभी को खूब-खूब धन्यवाद है जो बच्चो को सही इतिहास पढ़ाई करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी और विजेता हुए, हिन्दुओं को बटने के कारण ही सफलता नहीं मिल रही है अगर हिन्दू एक हो जाये तो हिन्दू राष्ट्र भी घोषित हो सकता है ।

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Tuesday, March 6, 2018

हिन्दू भूल गए हिन्दुओं का नववर्ष 18 मार्च को आ रहा है, शुरू करें तैयारी, जानिए कैसे करना है

March 6, 2018

हिन्दू धर्म पृथ्वी के उदगम से ही शुरू है और सबसे सर्वश्रेष्ठ धर्म है; परंतु दुर्भाग्य की बात है कि हिन्दू ही इसे समझ नहीं पाते । पाश्चात्य कल्चर को योग्य और अधर्मी कृत्यों का अंधानुकरण करने में ही अपने आप को धन्य समझते हैं । 31 दिसंबर की रात में नववर्ष का स्वागत और 1 जनवरी को नववर्षारंभ दिन मनाने लगे हैं ।
New year of Hindu forgotten Hindus is coming on 18th March,
 start preparing, know how to do

अंग्रेजी कालगणना ने इस वर्ष अपने 2018 वें वर्ष में पदार्पण किया है, जबकि हिन्दू कालगणना के अनुसार इस चैत्र शुक्ल 1 को 15 निखर्व, 55 खर्व, 21 पद्म (अरब) 93 करोड 8 लाख 53 सहस्र 120 वां वर्ष आरंभ हो रहा है ।
(टिप्पणी : 1 खर्व अर्थात 10,00,00,00,000 वर्ष (हजार करोड या वर्ष)
और 1 निखर्व अर्थात 1,00,00,00,00,000 वर्ष (दस हजार करोड वर्ष)

नव संवत्सर 2075 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा , 18 मार्च 2018 से प्रारंभ हो रहा है यही हिन्दुओं का नया वर्ष है, इसे धूमधाम से जरूर मनाए ।

चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा ही हिन्दुओं का वर्षारंभ दिवस है; क्योंकि यह सृष्टि की उत्पत्ति का पहला दिन है । इस दिन प्रजापति देवता की तरंगें पृथ्वी पर अधिक आती हैं ।

भारतीय नववर्ष की विशेषता   - 
 
पुराणों में लिखा है कि जिस दिन सृष्टि का चक्र प्रथम बार विधाता ने प्रवर्तित किया, उस दिन चैत्र सुदी 1 रविवार था। हिन्दुओं के लिए आने वाला संवत्सर 2075 बहुत ही भाग्यशाली होगा , क़्योंकि इस वर्ष भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को रविवार है,   शुदी एवम  ‘शुक्ल पक्ष एक ही  है। 

चैत्र के महीने के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि (प्रतिपद या प्रतिपदा) को सृष्टि का आरंभ हुआ था। हिन्दुओं का नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को शरू होता है । इस दिन ग्रह और नक्षत्र में परिवर्तन होता है । हिन्दी महीने की शुरूआत इसी दिन से होती है ।

पेड़-पौधों में फूल ,मंजर ,कली इसी समय आना शुरू होते हैं , वातावरण मे एक नया उल्लास होता है जो मन को आह्लादित कर देता है। जीवों में धर्म के प्रति आस्था बढ़ जाती है । इसी दिन ब्रह्मा जी  ने सृष्टि का निर्माण किया था । भगवान विष्णु जी का प्रथम अवतार भी इसी दिन हुआ था। नवरात्र की शुरुअात इसी दिन से होती है । जिसमें हिन्दू उपवास एवं पवित्र रहकर नववर्ष की शुरूआत करते हैं।

परम पुरूष अपनी प्रकृति से मिलने जब आता है तो सदा चैत्र में ही आता है। इसीलिए सारी सृष्टि सबसे ज्यादा चैत्र में ही महक रही होती है। वैष्णव दर्शन में चैत्र मास भगवान नारायण का ही रूप है। चैत्र का आध्यात्मिक स्वरूप इतना उन्नत है कि इसने वैकुंठ में बसने वाले ईश्वर को भी धरती पर उतार दिया। 

न शीत न ग्रीष्म। पूरा पावन काल। ऐसे समय में सूर्य की चमकती किरणों की साक्षी में चरित्र और धर्म धरती पर स्वयं  श्रीराम रूप धारण कर उतर आए,  श्रीराम का अवतार चैत्र शुक्ल नवमी को होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि  के ठीक नवे दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था । आर्यसमाज की स्थापना इसी दिन हुई थी । यह दिन कल्प, सृष्टि, युगादि का प्रारंभिक दिन है । संसारव्यापी निर्मलता और कोमलता के बीच प्रकट होता है  हिन्दुओं का नया साल विक्रम संवत्सर विक्रम संवत का संबंध हमारे कालचक्र से ही नहीं, बल्कि हमारे सुदीर्घ साहित्य और जीवन जीने की विविधता से भी है। 

कहीं धूल-धक्कड़ नहीं, कुत्सित कीच नहीं, बाहर-भीतर जमीन-आसमान सर्वत्र स्नानोपरांत मन जैसी शुद्धता। पता नहीं किस महामना ऋषि ने चैत्र के इस दिव्य भाव को समझा होगा और किसान को सबसे ज्यादा सुहाती इस चैत्र में ही काल गणना की शुरूआत मानी होगी। 

चैत्र मास का वैदिक नाम है-मधु मास। मधु मास अर्थात आनंद बांटता वसंत का मास। यह वसंत आ तो जाता है फाल्गुन में ही पर पूरी तरह से व्यक्त होता है चैत्र में। सारी वनस्पति और सृष्टि प्रस्फुटित होती है ,  पके मीठे अन्न के दानों में, आम की मन को लुभाती खुशबू में, गणगौर पूजती कन्याओं और सुहागिन नारियों के हाथ की हरी-हरी दूब में तथा वसंतदूत कोयल की गूंजती स्वर लहरी में।

चारों ओर पकी फसल का दर्शन ,  आत्मबल और उत्साह को जन्म देता है। खेतों में हलचल, फसलों की कटाई , हंसिए का मंगलमय खर-खर करता स्वर और खेतों में डांट-डपट-मजाक करती आवाजें। जरा दृष्टि फैलाइए, भारत के आभा मंडल के चारों ओर। चैत्र क्या आया मानो खेतों में हंसी-खुशी की रौनक छा गई। 

नई फसल घर में आने का समय भी यही है । इस समय प्रकृति मे उष्णता बढ्ने लगती है , जिससे पेड़ -पौधे , जीव-जन्तु में नवजीवन आ जाता है । लोग इतने मदमस्त हो जाते है कि आनंद में मंगलमय  गीत गुनगुनाने लगते हैं । गौर और गणेश की पूजा भी इसी दिन से तीन दिन तक राजस्थान में की जाती है । चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के समय जो वार होता है वह ही वर्ष में संवत्सर का राजा कहा जाता है ,  मेषार्क प्रवेश के दिन जो वार होता है वही संवत्सर का मंत्री होता है इस दिन सूर्य मेष राशि में होता है ।

सभी हिन्दू चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष मनाने का संकल्प ले | इस वर्ष 18 मार्च 2018 रविवार  को हिन्दू नववर्ष आ रहा है। सभी हिन्दू तैयारी शुरू कर दे।

आज से ही अपने सभी सगे-संबंधी, परिचित और मित्रों को पत्र एवं सोशल मीडिया आदि द्वारा शुभ संदेश भेजना शुरू करें ।

संस्कृतिरक्षा के लिए गांव-शहरों में 18 फरवरी नववर्ष निमित्त प्रभात फेरियां, झांकिया की सजावट वाली यात्राएं, पोस्टर लगाकर, स्थानिक केबल पर प्रसारण करवाकर नववर्ष का प्रचार-प्रसार जरूर करें ।

Monday, March 5, 2018

सुरेश चव्हाणके :आजादी के बाद सबसे ज्यादा प्रताड़ित किया गया जिनको वो हैं संत आसाराम बापू

March 4, 2018
हाल में एकमात्र राष्ट्रवादी चैनल सुदर्शन न्यूज के मुख्य संपादक श्री सुरेश चव्हाणके भारत बचाओ अभियान यात्रा पर हैं वो जब लखनऊ में पहुँचे तो उन्होंने हिन्दू संत आसाराम बापू का खुलकर समर्थन किया ।
उन्होंने कहा कि आजादी के पहले की स्थिति और मुगलों के समय का तो मुझे पता नहीं लेकिन आजादी के बाद हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा षड्यंत्रपूर्वक जिनको प्रताड़ित किया गया उन संत का नाम है आसाराम बापू जी। सबसे ज्यादा प्रताड़ित..इतनी प्रताड़ना की पराकाष्ठा मैंने कहीं नहीं देखी ।
Suresh Chavanke: After Independence, the highest punishment was given to those who are Sant Asaram Bapu
हम सब जानते हैं कि कैसे कानून का दुरुपयोग किया गया है ।
सुरेश जी ने आगे कहा कि यात्री भाइयों को बताना चाहता हूँ कि कानून का मिसयूज कैसे किया जाता है मैक्सिमम मतलब उस Max का अंत नहीं इतना सब कुछ। बापू आसारामजी पर आरोप लगाने वाली उस लड़की की उम्र के कारण पॉक्सो एक्ट लगाया गया जबकि वह अल्पायु नहीं है बाकि डॉक्यूमेंट है किसी ने सुने न सुने ।
जो घटना घटी वहां पर मैं खुद गया था और खुद जाकर वह डिस्टेंस कितना है वो सब चेक किया ।वाकई में क्या हुआ होगा इतनी देर में और मेरे साथ में मैं और कई पत्रकार और पुलिस अधिकारियों को भी लेकर गया था। ऐसे कई चीजों का विश्लेषण किया और कितनी चीज है जो हमारे (बापू आशारामजी के ) पक्ष में है उसके बावजूद भी किसी चीज को कानून के कटघरे में डाल दो और सालों किसी को जेल में सड़ाओ । मैंने तो ऐसा दूसरा कोई केस देखा नहीं जो बापूजी के बारे में देखा है ।
अत्याचार सहकर भी सेवाकार्य कर रहे हैं
सुरेश जी ने आगे बताया कि बापू आसारामजी तो अंदर है लेकिन यह लोग (बापू आसारामजी के अनुयायी ) जो आज बापू आसारामजी का नाम लेकर इतना बड़ा कार्य चला रहे हैं विभिन्न आपदाओं के बावजूद कितनों को क्या-क्या झेलना नहीं पड़ा होगा पहले कुछ समय तक तो यह मीडिया वालों की गंदी गेम के कारण बापू आसारामजी का नाम लेकर चलने वाले व्यक्ति की तरफ लोग गलत निगाह से देखते थे, कितनी हीन भावना से कैसे कैसे गंदे कॉमेंट्स रहे होंगे, काम करना कितना मुश्किल रहा होगा ।
मित्रों! हम तो निकले हैं फूल माला मिल गई है ठीक है हमारे पीछे यात्रा के कई षड्यंत्र हो रहे हैं कोई कोर्ट में जा रहा है कोई अधिकारी आगे आकर उसको रोक रहा है लेकिन जो बापू आसारामजी के भक्तों ने झेला है मुझे लगता है कि इस देश में किसी राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता नेता या यहां तक कि बंगाल, केरला में जो राजनीतिक कार्यकर्ता पर अत्याचार होते हैं उससे भी 1000 गुना ज्यादा अत्याचार बापू आसारामजी के भक्तों पर हुए।  कितनी महिलाओं को लाठी डंडे झेलने पड़े कितने लोगों ने मतलब आप में से कई लोगों ने तो अपने घर को स्वाहा किया ।
अनुयायी समाज तक सच्चाई पहुँचा रहे हैं
[youtube https://www.youtube.com/watch?v=J7MKLGCTxEk?feature=player_embedded]
सुरेश जी ने कहा कि बापू आसारामजी के भक्तों का कहना है कि नहीं नहीं हम लड़ेंगे क्योंकि पीछे हटेंगे तो पता नहीं यह लड़ाई कमजोर हो जाएगी मैं ऐसे कई लोगों (बापू आसारामजी के भक्तों ) को जानता हूँ जिनकी दुकान तक बंद हो गई, जिनकी नौकरी छूट गई वह फिर भी थैला लेकर प्रूफ लेकर लोगों के पास जा रहे हैं RSS के लोगों को मिलते है,  BJP से मिलते  हैं, सत्ता से जुड़े लोगों को मिलते हैं, पत्रकारों को मिलते हैं, हमारे पास भी आते हैं कितने लोग मतलब वो कोई एक्टिविस्ट नहीं है लेकिन मैं बताऊं जब आप (षडयंत्रकारी) अत्याचार की अति कर देते हो तो उसके बाद सत्य का जो चक्र है ना वह उल्टा परिणाम देने लगता है, और वह चक्र क्या परिणाम दे रहा है यह तमाम वह लोग हैं जो लोग ईश्वर और खुद इसमें कनेक्ट है ।
एक षडयंत्र ने करोड़ो राष्ट्रवादी पैदा किये
आगे बताते हुए सुरेश जी ने कहा कि बापू आसारामजी पर हुए अत्याचार ने इस देश में कई करोड़ हिंदूवादी एक्टिविस्ट पैदा कर दिए । जो (बापू आसारामजी के अनुयायी ) भक्ति भाव और भजन के आगे जाते नहीं थे देश में बाकि क्या चीजें हो रही हैं वह स्वाभाविक से आदमी अलग चीजों में होता है धार्मिक क्षेत्र का, लेकिन आज ज्यादातर लोग (बापू आसारामजी के अनुयायी) सोशल मीडिया में एक्टिव है, Twitter का ट्रेंड चलाते हैं, मैसेजेस भेजते हैं, भाषण सीख गए हैं। ऐसी ऐसी महिलाएं मुझे नहीं लगता कि वह घूंघट वाली महिलाएं हैं । मैंने दिल्ली में देखी थी ।प वह चौराहे पर खड़े होकर भाषण दे सकती है यह सारा जोश उनके अंदर जो भरा वह इस एक घटना (बापू आसारामजी पर षड्यंत्र) ने भरा! कभी कभी मुझे ऐसा लगता है कि शायद हिंदुत्व का आंदोलन कमजोर पड़ रहा है और उस आंदोलन में एक साथ कई करोड़ कार्यकर्ता की जरूरत थी क्योंकि एक साथ कई कार्यकर्ता तो बड़ी मुश्किल है । आपको तो पता है कि कार्यकर्ता खड़ा करना कितना मुश्किल होता है लेकिन हजारों साल के हिंदुत्ववादी मूमेंट में किसी एक घटना ने अगर करोड़ों कार्यकर्ताओं को खड़ा किया होगा तो बापू आसारामजी की घटना ने किया है यह इतिहास याद रखेगा की एक घटना का परिवर्तन कैसे होता है। हमें इस घटना का आज भी दुःख है ।
न्यापालिका को पछताना पड़ेगा
सुरेश जी ने आगे कहा कि मैं दावा करता हूं कि आने वाले दिनों में हिंदुस्तान को और न्यायपालिका को पछतावा करना पड़ेगा कि दोनों ने जो बापू आसारामजी पर अत्याचार किये वो कितने गलत थे ।
न्यापालिका बिकती है
सुरेश जी ने आगे कहा कि अब केस अंतिम स्टेज में है कभी भी कुछ भी हो सकता है । बापू आसारामजी जी हमारे लिए पवित्र थे हैं और रहेंगे और हम यह केवल मैं आप लोगों के सामने नहीं कहता हूँ बल्कि मैं आप लोगों के सामने कम बोलता हूँ चैनल पर  इससे ज्यादा बोलता हूँ। अब आजकल कार्यक्रम इसलिए नहीं कर रहे हैं क्योंकि केस चल रहा है पॉजिटिव होगा तो तो हम हैं ही कुछ नेगेटिव भी होता है तो हम आपसे आगे रहेंगे हमेशा हमेशा से ज्यादा इस देश में न्यायपालिकाएं बिकती हैं प्रभावित होती है यह मैं पहले भी कह चुका हूँ आगे भी कहता हूँ कैमरे पे कहता हूँ क्योंकि मुझे ये कहने में डर नहीं है खुद न्यायपालिका के अंदर के ही सिस्टम के अंदर के जज से लेकर मजिस्ट्रेट वकील इस बात को दोहरा चुके हैं इसलिए इन व्यवस्थाओं से बहुत ज्यादा भरोसा करने की जरूरत नहीं है।
दिव्य शक्ति की इच्छा से नव हिंदुस्तान का निर्मित
सुरेश जी ने बताया कि हम तो दिव्य व्यवस्था के वाहक हैं और इसलिए हमने उस दिव्य व्यवस्था पर अपनी श्रद्धा रखनी चाहिए भाव रखना चाहिए । वही व्यवस्था इन तमाम चीजों को क्योंकि भगवान किस बंदे से क्या करना चाहता है कोई बता नहीं सकता कभी-कभी वह बातें समझने में सौ-सौ साल लग जाते हैं और इसीलिए हम यह माने कि दिव्य शक्ति की इच्छा के आधार पर नव हिंदुस्तान को निर्मित करने की आवश्यकता है । आने वाले दिन बहुत मुश्किल हैं, मैंने जो यात्रा निकाली है जान हथेली पर लेकर जिस मुद्दे को उठाया है, लोग एक दूसरे को चार लोगों में ही इस मुद्दे को बोलना नहीं चाहते उनको लगता है कि कोई सुन लेगा तो पता नहीं क्या हो जाएगा हम तो खुले मैदान में यात्रा लेकर निकले हैं इसलिए क्योंकि इससे बड़े-बड़े होल इससे बड़े-बड़े आश्रम पाकिस्तान में थे ना लेकिन उनका क्या हो गया और इसलिए यह अगर बचा रहे तो एक ही चीज काम आ सकती है वह है हिंदू का बहुसंख्यक होना और वह होने के लिए जो कानून जरूरी है हम दो हमारे दो तो सबके दो तो इसके लिए हम प्रयास कर रहे हैं। बापू आसारामजी के भक्त तमाम जगह पर मेरे साथ हैं ही, हमारे दो भाई यात्रा में मेरे साथ चल रहे हैं।

Sunday, March 4, 2018

कान्वेंट स्कूल का सच जानकर आप भी चौंक जायेंगे

March 4, 2018
भारत में आजकल बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाने का प्रचलन बहुत चल रहा है सभी का कहना है कि बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में भेजों, लेकिन वास्तव में उनके माता-पिता कॉन्वेंट स्कूल का सच नही जानते है इसलिए अपने बच्चों को भेजते हैं, आइये आज आपको कॉन्वेंट स्कूलों से अवगत कराते हैं ।
AKnowing the truth of the Convent School will surprise you

क्या आप भी अपने बच्चों को गटर (convent) में भेजते हैं ?
करीब 2500 साल पहले यूरोप में बच्चे पालने की परंपरा नहीं थी। बच्चा पैदा होते ही उसे टोकरी में रखकर लावारिस छोड़ दिया जाता था। अगर किसी चर्च के व्यक्ति की नजर पड़े तो वो बच जाता था नहीं तो उसे जानवर खा जाते थे।
कान्वेंट का सच...
जिस यूरोप को हम आधुनिक व खुले विचारों वाला मानते हैं, आज से 500 वर्ष पहले वहाँ सामान्य व्यक्ति मैरेज (शादी) भी नहीं कर सकता था क्योंकि उनके बहुत बड़े (दार्शनिक) अरस्तू का मानना था कि आम जनता मैरेज करेगी तो उनका परिवार होगा, समाज होगा तो समाज शक्तिशाली बनेगा, शक्तिशाली हो गया तो राजपरिवार के लिए खतरा बन जाएगा।  इसलिए आम जनता को मैरेज न करने दिया जाए। बिना मैरेज के जो बच्चे पैदा होते थे, उन्हें पता न चले कि कौन उनके माँ-बाप हैं, इसलिए उन्हें एक साम्प्रदायिक संस्था में रखा जाता था, जिसे वे कान्वेंट कहते थे। उस सहजता के प्रमुख को ही माँ- बाप समझे इसलिए उन्हें फादर, मदर, सिस्टर कहा जाने लगा।
यूरोप के दार्शनिक रूसो के अनुसार बच्चे पति पत्नी के शारीरिक आनंद में बाधक हैं इसलिए इनको रखना अच्छा नहीं है क्योंकि शारीरिक आनंद ही सब कुछ होता है और एक दार्शनिक प्लेटो के अनुसार हर मनुष्य के जीवन का आखिरी उद्देश्य हैं शारीरिक आनंद  की प्राप्ति और बच्चे अगर उसमें रुकावट है तो उन्हें रखना नहीं छोड़ देना है।
ऐसे ही दूसरे दार्शनिक जैसे दिकारते, लेबेनीतज, अरस्तू सबने अपने बच्चों को लावारिस छोड़ा था।
ऐसे छोड़े हुए बच्चों को रखने के लिए यूरोप के राजाओं ने या सरकारों ने कुछ संस्थाएँ खड़ी की जिनको CONVENT कहा जाता था। CONVENT माने लावारिस बच्चो का स्कूल । CONVENT में पढ़ने वाले बच्चों को माँ बाप का एहसास कराने के लिए यहाँ पर पढ़ाने वाले जो अध्यापक होते है उनको मदर, फादर, ब्रदर, सिस्टर कहते हैं।
आप सोच रहें होंगे उस समय अमेरिका यूरोप की क्या स्थिति थी, तो सामान्य बच्चो के लिए सार्वजनिक विद्यालयों की शुरुआत सबसे पहले इंग्लैंड में सन 1868 में हुई थी, उसके बाद बाकी यूरोप अमेरिका अर्थात जब भारत में प्रत्येक गांव में एक गुरुकुल था,  97% साक्षारता थी तब इंग्लैंड के बच्चों को पढ़ने का अवसर मिला। तो क्या पहले वहाँ विद्यालय नहीं होते थे ? होते थे परंतु महलों के भीतर, वहाँ ऐसी मान्यता थी कि शिक्षा केवल राजकीय व्यक्तियों को ही देनी चाहिए सबको तो सेवा करनी चाहिए ।
अब आप ही तय करें आपको क्या चाहिए कान्वेंट ? या गुरुकुल ? स्त्रोत : संस्कारवान पत्रिका
भारत में कॉन्वेंट स्कूलों में कोई हिन्दू त्यौहार नही मनाने देते हैं और न ही उन दिनों में छुट्टियां दी जाती हैं, तिलक या मेहंदी लगाकर जाये तो भी उनको सजा दी जाती है, मतलब हिन्दू संस्कृति मिटाने का खुला षडयंत्र रचा जा रहा है, कॉन्वेंट स्कूल में बच्चों के यौन शोषण के मामले भी कई सामने आए हैं।
भारत मे कॉन्वेंट स्कूलों की स्थापना...
भारत से लॉर्ड मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी : “ मैंने जो कॉन्वेंट स्कूलों की स्थापना की है, इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में, संस्कृति के बारे में, परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, जब ऐसे बच्चे होंगे भारत में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।”
उसने कहा था कि ‘मैं यहाँ (भारत) की शिक्षा-पद्धति में ऐसे कुछ संस्कार डाल जाता हूँ कि आनेवाले वर्षों में भारतवासी अपनी ही संस्कृति से घृणा करेंगे... मंदिर में जाना पसंद नहीं करेंगे... माता-पिता को प्रणाम करने में तौहीन महसूस करेंगे, साधु-संतों से नफरत करेंगे... वे शरीर से तो भारतीय होंगे लेकिन दिलोदिमाग से हमारे ही गुलाम होंगे..!'
उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ-साफ दिखाई दे रही है, आज कॉन्वेंट स्कूल की शिक्षा पद्धति के कारण JNU जैसी यूनवर्सिटी में छात्र हिन्दू देवी-देवताओं को ही गालियां बोल रहे हैं, दारू पी रहे हैं, मांस खा रहे हैं, दुष्कर्म कर रहे हैं, बॉलीवुड, मीडिया ,टीवी सीरियलों में लोग हिन्दू तो दिखते हैं लेकिन दिलोदिमाग से अंग्रेज होते जा रहे हैं । इसलिए हिन्दू देवी-देवताओं, साधु-संतों, हिन्दू त्यौहारों के खिलाफ हो गए हैं।
भारत ने वेद-पुराण, उपनिषदों से पूरे विश्व को सही जीवन जीने की ढंग सिखाया है । इससे भारतीय बच्चे ही क्यों वंचित रहे ?
जब मदरसों में कुरान पढ़ाई जाती है, मिशनरी के स्कूलों में बाइबल तो हमारे स्कूल-कॉलेजों में रामायण, महाभारत व गीता क्यों नहीं पढ़ाई जाएँ ?
जबकि मदरसों व मिशनरियों में शिक्षा के माध्यम से धार्मिक उन्माद बढ़ाया जाता है और हिन्दू धर्म की शिक्षा देश, दुनिया के हित में है ।
सभी हिन्दू अभिभावकों को भी कॉन्वेंट स्कूल में हिन्दू छात्रों पर पड़ने वाले गलत संस्कारों तथा उनके साथ हो रही प्रताड़ना को देखते हुए अपने बच्चों को वहां नहीं भेजना चाहिए । कॉन्वेंट स्कूल का संपूर्ण बहिष्कार करना चाहिए ।
कई घटना में छात्रा ने कॉन्वेंट स्कूल प्रशासन के ‘टाॅर्चर’ के कारण आत्महत्या कर ली और एक विद्यार्थी कूद गया । कर्इ घटनाआें में यह सामने आया है कि किसी भी अपयश, ब्लू वेल जैसे गेम्स या किसी प्रकार की ‘टॉर्चर’ की कारण बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं । 
इसका मूल कारण है उनमें सुसंस्कारों का अभाव । यदि आप अपने बच्चों को अच्छे संस्कारी बनाना चाहते हैं तो कॉन्वेंट स्कूल में बच्चों को पढ़ाना बन्द करें और गुरुकुलों में पढ़ाना शुरू करदें।

Saturday, March 3, 2018

जापान में होती है हिंदू देवी-देवताओं की पूजा, हिन्दुस्तान में कब महत्व समझेगें?

March 3, 2018

भारत में कुछ लोग पाश्चात संस्कृति की अंधानुकरण करने के कारण देवी-देवताओं का महत्व नही समझ रहे हैं और कुछ वोटबैंक के लिए दलितों को उकसा रहे हैं और बोल रहे हैं कि आप हिन्दू नही हो इसलिए आपको हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा नही करनी चाहिए, लेकिन वास्तव में देखें तो हमारे पुराणों में दलित शब्द है ही नही । अंग्रेजों द्वारा आपस में लड़ाने के लिए जाति-पाति बांटी गई जबकि भारतीय संस्कृति में वर्ण व्यवस्था जो है वो कर्म के अनुसार बनाई है, इसलिए किसी के बहकाव में आकर देवी-देवताओं की पूजा नही छोड़नी चाहिए क्योंकि विदेशों में देवी-देवताओं का महत्व समझकर उनकी पूजा की जा रही है और उसके लाभ भी प्राप्त कर रहे हैं ।
In Japan, worship of Hindu Goddess-gods,
when will you understand the importance of India?
जापान में हिंदू देवी देवताओं की पूजा की जाती है। जापान में कई हिंदू देवी-देवताओं को जैसे ब्रह्मा, गणेश, गरुड़, वायु, वरुण आदि की पूजा आज भी की जाती है। कुछ समय पहले नई देहली में फोटोग्राफ़र बेनॉय के बहल के फोटोग्राफ़्स की एक प्रदर्शनी हुई, जिससे जापानी देवी-देवताओं की झलक मिली।

बेनॉय के अनुसार हिंदी के कई शब्द जापानी भाषा में सुनाई देते हैं। ऐसा ही एक शब्द है ‘सेवा’ जिसका मतलब जापानी में भी वही है जो हिंदी में होता है। बेनॉय कहते हैं कि जापानी किसी भी प्रार्थना का अनुवाद नहीं करते। उनको लगता है कि ऐसा करने से इसकी शक्ति और प्रभाव कम हो जाएगा ।

लिम्का वर्ल्ड रिकॉर्ड

भारतीय सभ्यता के रंग जापान में देखने को मिलते हैं। सरस्वती के कई मंदिर भी जापान में देखने को मिलते हैं। संस्कृत में लिखी पांडुलिपियां कई जापानी घरों में मिल जाती है। बेनॉय का नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में ‘मोस्ट ट्रेवल्ड फोटोग्राफ़र’ के रूप में दर्ज है।

आधार ही संस्कृत

जापान की राजधानी टोक्यो में पांचवी शताब्दी की सिद्धम स्क्रिप्ट को आज भी देखा जा सकता है। इसे गोकोकुजी कहते हैं। बेनॉय का कहना है कि ये लिपि पांचवी शताब्दी से जापान में चल रही है और इसका नाम सिद्धम है। भारत में ऐसी कोई जगह नहीं, जहां ये पाई जाती हो ।

आज भी जापान की भाषा ‘काना’ में कई संस्कृत के शब्द सुनाई देते हैं । इतना ही नहीं काना का आधार ही संस्कृत है। बहल के अनुसार जापान की मुख्य दूध कंपनी का नाम सुजाता है। उस कंपनी के अधिकारी ने बताया कि ये उसी युवती का नाम है जिसने बुद्ध को निर्वाण से पहले खीर खिलाई थी।
स्त्रोत : बीबीसी

भातीय सभ्यता अपनाकर, हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा करके एवं संस्कृत व हिन्दी भाषा का प्रयोग करके जापान दुनिया मे टेक्नोलॉजी में नंबर एक पर है, आज उस देश के सामने कोई भी देश आंख नही दिखा सकता लेकिन भारत में ऐसी विडंबना है कि भारतवासी अपने ही हिन्दू देवी-देवताओं को भूल रहे है, कई तो देवी-देवताओं को गालियां तक दे रहे हैं । अपनी संस्कृति को भूलकर पाश्चात्य संस्कृति की ओर आकर्षित हो रहे हैं, अपनी महान संस्कृत एवं हिन्दी भाषा को भूलकर अंग्रेजी भाषा को अपना रहे हैं, कितनी विडंबना है, हमारी संस्कृति को भूलने के कारण ही आज हम पीछे रह गये और जापान हमारी संस्कृति को अपनाकर महान बन रहे हैं ।

दुनिया का सबसे प्राचीन हिन्दू धर्म अपनी उदारता, व्यापकता और सहिष्णुता की वजह से पूरी दुनिया के लोगों को ध्यान खींच रहा है। ऑस्ट्रेलिया और आयरलैंड जैसे देश में तो सबसे तेजी से बढ़ने वाला धर्म बन गया है।

एक तरफ विदेशी भी हिन्दू धर्म की महिमा जानकर हिन्दू धर्म और संस्कृति की तरफ आकर्षित हो रहे है, दूसरी ओर हिन्दू बाहुल देश भारत में ही ईसाई मिशनरियां और कुछ मुस्लिम समुदाय के लोग हिन्दू धर्म को मिटाकर अपना धर्म बढ़ाना चाहते हैं इसलिए लालच देकर एवं जबरन धर्मान्तरण,  लव जिहाद आदि करके हिन्दू धर्म को तोड़ रहे हैं ।

हिन्दू धर्म में रहने वाले भी कुछ लोग हिन्दू धर्म की महिमा समझते नही हैं और बोलते हैं कि सर्व धर्म समान । सर्व धर्म सम्मान तो हो सकता है पर सर्व धर्म समान नहीं हो सकते ।  महान सनातन हिन्दू धर्म को किसी धर्म के साथ जोड़ना मूर्खता है।

हिन्दू संस्कृति की आदर्श आचार संहिता ने समस्त वसुधा को आध्यात्मिक एवं भौतिक उन्नति से पूर्ण किया, जिसे हिन्दुत्व के नाम से जाना जाता है।

हिन्दू धर्म का यह पूरा वर्णन नही हैं इससे भी कई गुणा ज्यादा महिमा है क्योंकि हिन्दू धर्म सनातन धर्म है इसके बारे में संसार की कोई कलम पूरा वर्णन नही कर सकती । आखिर में हिन्दू धर्म का श्लोक लिखकर विराम देते हैं ।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत।
ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः

Friday, March 2, 2018

भयंकर स्थिति : भारत में संस्कृति रक्षक नही संस्कृति भक्षक बनना चाहेगा

March 2, 2018

देश की वर्तमान स्थिति जिस प्रकार से बन रही है उससे लग रहा है कि भारत में अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए कोई आगे नही आना चाहेगा लेकिन संस्कृति को विनाश की तरफ ले जाने वाले निमित जरूर बन जाएंगे ।

भारत में विकट स्थिति के बहुत सारे उदाहरण हैं लेकिन अभी दो ताजे उदाहरण आपको सामने हैं ।
पहला मामला है फ़िल्म अभिनेत्री श्रीदेवी जिसने अपना जीवन बॉलीवुड में बिताया, अनेक फिल्में बनाई, सदैव पाश्चात्य सभ्यता से चकाचोंध रही । वही श्रीदेवी दुबई में शादी समारोह में जाती है दारू पीती है और बाथरूम में डूबकर मर जाती है, उसकी हत्या की गई या स्वयं मरी ये अभी स्पष्ट नही हुआ है लेकिन अभीतक यही बात आ रही है कि दारू अधिक पीने से मर गई, उनका मरना दुःखद तो है लेकिन भारत में जिस प्रकार से मीडिया उनको पेश कर रही है और दिन-रात उनके बारे में खबरें दिखा रही है और बड़ी बात तो ये है कि उनको भारतीय तिरंगे से लपेटा गया जो कि इस सम्मान का अधिकारी देश के लिए मर मिटने वाले सैनिक हैं, राजकीय संम्मान के साथ अंतिम यात्रा निकाली गई  और कई नेताओं और हस्तियों ने दुःख व्यक्त किया ।

दूसरा मामला है कांची कोटिपीठ शंकराचार्य श्री जयेंद्र सरस्वती जी का, उन्होंने पूरा जीवन सनातन संस्कृति रक्षा, धर्मांतरण रोकने एवं समाज उत्थान कार्य में लगा दिया जिसके कारण सनातन संस्कृति की रक्षा हुई । लाखों हिन्दुओं का धर्मांतरण होता हुआ रुका, लाखों गरीबों को रोजी रोटी मिली और भी देश एवं समाज का भला हुआ ऐसे अनेक कार्य उनके द्वारा सम्पन्न हुए ।  लेकिन जब उनका शरीर शांत हुआ तो मीडिया को एक मिनट की भी फुर्सत नही थी कि वो ये खबर दिखाये । और न ही उनको कोई राजकीय संम्मान मिला और न ही नेता और किसी बड़ी हस्ती ने दुःख व्यक्त किया ।

एक बात गौर करने वाली है कि भारत में हिन्दुओं का धर्मांतरण कराने वाली मदर टेरेसा को जब वेटिकन में संत की उपाधि दी जाती है तब भारत के वोट बैंक के भूखे कई नेता उनके कार्यक्रम में वेटिकन सिटी में जाते हैं और हिन्दुस्तान के खबरिया दलाल उसका लाइव कवरेज करने वेटिकन पहुँच जाते हैं, मीडिया में भी लाइव कवरेज होता है, पर करोडो हिन्दुओं के आदर्श सनातन संस्कृति के पूजनीय शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती जी के निधन और समाधि का लाइव कवरेज तो छोड़ो, एक छोटी सी न्यूज़ भी देखने को नहीं मिली  । न ही कोई नेता पहुँचता है और न ही कोई शोक व्यक्त करता है । बड़ी बात तो तब थी जब विदेशी मदर टेरेसा मरती है तो भारत में 3 दिन शोक घोषित कर दिया जाता है लेकिन महान शंकराचार्य जी के लिए एक दिन भी जाहिर नहीं किया गया ।

 भारत में ही संस्कृति रक्षक पराये होते जा रहे हैं और संस्कृति बहिर्मुख का कैसे संम्मान होता है ये सबके सामने प्रत्यक्ष है। अब आने वाली पीढ़ी के लिए क्या उदाहरण प्रस्तुत कर रही है हिंदुत्ववादी सरकार !!


आपको ये भी जानकारी दे देते हैं कि जब केंद्र में कांग्रेस और तमिलनाडु में जयललिता का राज था तब 2004 में जयेंद्र सरस्वती पर झूठा आरोप लगाकर दिवाली की रात को षडयंत्र के तहत उन्हें गिरफ्तार किया था, उस समय पूरी मीडिया उनके खिलाफ 24 घंटे डिबेट चलाती थी और उनके नजदीक वाले भी उनको शंकराचार्य पद से इस्तीफा देने के लिए कहने लगे तब हिन्दू संत आसाराम बापू ने दिल्ली जंतर-मंतर पर लाखों भक्तों के साथ धरना दिया और गर्जना की उसके बाद उन पर अत्याचार बन्द हुआ और कुछ ही समय बाद उनको छोड़ दिया । लेकिन उसके बाद केंद्र में बैठी तत्कालीन सरकार ने हिन्दू संत आसाराम बापू के खिलाफ षडयंत्र शुरू किया उनके खिलाफ मीडिया ट्रायल शुरू कर दिया और उनके ऊपर झूठे कई आरोप लगाए जैसे कि तांत्रिक विद्या करते है, जमीन हड़प लेते हैं आदि आदि और न्यायालय से वे इन सभी आरोपों से बरी हो गए फिर षडयंत्र रच के एक लड़की को तैयार किया गया और रात को दो बजे दिल्ली में एफआईआर दर्ज करवाई गई और उन्हें जेल भेज दिया गया । न्यायालय में षड्यंत्र के तहत किये इस केस की पर्ते खुल रही हैं लेकिन अभीतक उनका समय जो जेल में गया उससे धर्मांतरण तेजी से बढ़ गया, गायों की हत्या बढ़ गई, विदेशी प्रोडक्ट बढ़ गए, दारू, चरस आदि नशे करने वाले और मांस खाने वालो की संख्या बढ़ गई, एलोपैथीक डॉक्टरों की आमदनी बढ़ गई, विदेशी कंपनियां कोका कोला, पेप्सी आदि की बिक्री बढ़ गई, लाखो गरीबों में जीवनुपयोगी सामग्री देना बंद हो गया। हिन्दुओं की अपने धर्म के प्रति जागरूकता कम हो गई आदि आदि अनेक नुकसान हो रहा है उसकी भरपाई कौन करेगा?

केवल शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती या हिन्दू आसाराम बापू के साथ ही ऐसा हुआ है ये बात नही है साध्वी प्रज्ञा, स्वामी असीमानंद, श्री नित्यानंद स्वामी, श्री केशवानंद महाराज, श्री नारायण साई, शंकराचार्य अमृतानंद आदि आदि अनेक साधु-संतों के साथ अत्याचार हुआ है और अभी भी हो रहा है, केवल हिन्दू साधु-संत की ही बात नही है कोई भी हिन्दू कार्यकर्ता आगे आकर हिन्दू संस्कृति की रक्षा करता है तो उसको प्रताड़ित किया ही जाता है जैसे कि आज भी बिना सबूत 4 सालों से जेल में बंद हैं श्री धनंजय देसाई, गौ रक्षक सतीश कुमार आदि जेल में बंद है, दारा सिंह ने भी धर्मांतरण रोकने का पर्यन्त किया तो उनको भी जेल में भेज दिया गया ।

भारतीय संस्कृति पर सदियों से कुठाराघात हो रहा है और उनकी रक्षा के लिए जो भी आगे आते है उनको देश विरोधी ताकतों द्वारा मीडिया द्वारा बदनाम करवाकर झुठे आरोप लगाकर जेल भिजवाया जाता है या उनकी हत्या कर दी जाती है।

भारत में अगर इसी तरीके से एक के बाद एक को टारगेट किया जायेगा और उनको खत्म कर दिया जाएगा तो फिर आगे आकर कोई रक्षा करने को तैयार नही होगा ओर यही देश विरोधी ताकते चाहती है कि भारतीय संस्कृति की रक्षा करने वाले मुख्य-मुख्य  लोगो को खत्म कर दो जिसके कारण हमारी विदेशी प्रोडक्ट खूब बिके और धर्मांतरण आसानी से कर सके और फिर से देश को गुलाम बना सके ।

भारतवासी अभी भी इन बातों को समझकर जाति-पाति में नही बंटकर एक होकर कार्य करेंगे किसी भी पड़ोसी हिन्दू पर अत्याचार हो रहा हो तो एकजुट होकर उसका विरोध करेंगे तो आसानी से इन देश विरोधी ताकतों को विफल कर पाएंगे और एकजुट होकर कार्य नही करेंगे और आपस में ही एक दूसरे का तमाशा देखेते रहेंगे । 

अब फैसला आपके हाथ में है आपको खत्म होना है या बचना है?

Thursday, March 1, 2018

सोशल मीडिया पर लोगो ने की अपील रासायनिक रंगों से से नही, वैदिक होली खेले

March 1, 2018
🚩होली का त्यौहार भारत के साथ कई अन्य देशों में भी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। #होली की लोकप्रियता का विकसित होता हुआ अंतर्राष्ट्रीय रूप भी आकार लेने लगा है।
सोशल मीडिया पर लोगो ने की अपील रासायनिक रंगों से से नही, वैदिक होली खेले

🚩होली रंगों का त्यौहार है, हँसी-खुशी का #त्यौहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते हैं । प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फिल्मी गानों का प्रचलन इस आधुनिक रूप से होली खेलना बहुत नुकसान करता है ।
🚩होली पर बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरें, फाग, धमार, चैती, ठुमरी आदि #वैदिक गानों से ही करनी चाहिए ।
🚩रासायनिक रंगों के कुप्रभावों की जानकारी होने के बाद बहुत से लोग स्वयं ही #प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं। चंदन, गुलाबजल, टेसू (पलाश) के फूलों से बना हुआ रंग तथा प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा को बनाए हुए हैं ।
🚩आज ट्वीटर पर भी हैशटैग #HappyVedicHoli को लेकर अनेक ट्वीट कर रहे थे।
🚩 आइये जानते है क्या कह रहे थे यूजर...
🚩 गार्गी लिखती है कि होली मे जहरीले रासायनिक रंगो से अपनी आँखो को, त्वचा व मुह को बचाकर पलाश के लाभदायक पुष्पो के रंग से अपनी त्वचा को रँगे
https://twitter.com/gargi088/status/969209533523357701
🚩 प्रियांशु ने लिखा कि रासायनिक रंगो से होली खेलना बहुत नुकसानदायक है व पलाश के फूलों के रंग से होली खेलना हितकारी है।
https://twitter.com/priyanshusoni69/status/842311614934196225
🚩 रेखा लिखती है कि पावन पर्व पर जहरीले रासायनिक रंगो से अपने स्वास्थ्य पर कुठाराघात न करें, बल्कि प्राकृतिक रंगों से होली खेलें| #VedicHoliHealthyHoli
https://twitter.com/BajajrekhaRb/status/841939295535521792
🚩 प्रेम चौधरी ने लिखा कि जहरीले रंगो के प्रयोग, शराब आदि पीने-पिलाने व कीचड़ आदि उछाल कर होली को  विकृत रूप न दे! अपनाएँ #VedicHoliHealthyHoli
https://twitter.com/premchaudhary_/status/969209215666606080
🚩 नेहा लिखती है कि आज के इतने प्रदूषित वातावरण और रासायनिक रंगों के दुष्प्रभाव के कारण जो लोग होली खेलने से बचते है उनको वैदिक रीति से होली खेलनी चाहिये। त्योहार जीवन में आनन्द के लिए होते हैं ।
https://twitter.com/Neha00436718/status/969208995822080000
🚩 नीलेश ने लिखा कि वैदिक होली खेल होगा पानी का सदुपयोग,
वहीँ केमिकल से बने रंगों से होगा पानी का दुरूपयोग।
https://twitter.com/nileshsshimpi/status/841507928012181504
🚩 मधु लिखती है कि वैदिक होली खेल होगा पानी का सदुपयोग, " मीडिया को जलन भी कम " क्यों की हिन्दू त्योहारों पर मीडिया को पर्यावरण  की बड़ी चिंता होती है !
https://twitter.com/ChaafekarMadhu/status/969208400386158592
🚩इस तरीके से हजारों यूजर बोल रहे थे कि हमको #आसारामजी #बापू ने बताया है कि केमिकल रंगों से घातक बीमारियाँ होती है और #पलाश आदि प्राकृतिक रूप से होली खलने से निरोगता, शांति बढ़ती है ।
🚩#स्वास्थ्यप्रदायक #होली
रासायनिक रंगों का तन-मन पर बड़ा दुष्प्रभाव होता है । काले रंग में लेड ऑक्साइड पड़ता है, वह किडनी को खराब करता है । लाल रंग में कॉपर सल्फेट पड़ता है, वह कैंसर की बीमारी देता है । बैंगनी रंग से दमा और एलर्जी की बीमारी होती है । सभी रासायनिक रंगों में कोई-न-कोई खतरनाक बीमारी को जन्म देने का दुष्प्रभाव है ।
🚩लेकिन पलाश की अपनी एक #सात्त्विकता है । #पलाश के फूलों का रंग रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ाता है । #गर्मी को पचाने की, सप्तरंगों व सप्तधातुओं को संतुलित करने की क्षमता पलाश में है । पलाश के फूलों से जो होली खेली जाती है, उसमें पानी की बचत भी होती है । रासायनिक रंगों को मिटाने के लिए कई बाल्टियाँ पानी लगता है । सूखा रंग, काला रंग या सिल्वर रंग लगायें तो उसको हटाने के लिए साबुन और पानी बहुत लगता है लेकिन पलाश के फूलों के रंग के लिए न कई बाल्टियाँ पानी लगता है न कई गिलास पानी लगता है । और #पलाश वृक्ष की गुणवत्ता सर्वोपरि है । पित्त और वायु मिलकर हृदयाघात (हार्ट-अटैक) का कारण बनता है लेकिन जिस पर पलाश के फूलों का रंग छिड़क देते हैं उसका पित्त शांत हो जाता है तो हार्ट-अटैक कहाँ से आयेगा ? वायुसंबंधी 80 प्रकार की बीमारियों को भगाने की शक्ति इस पलाश के रंग में है ।
🚩रासायनिक रंगो के नुकसान और प्राकृतिक रंग कैसे बनाये लिंक पर क्लिक करके देखे
💻https://youtu.be/DMVf3mo2Frs
https://goo.gl/A5jYna
🚩होली पर नाचना, कूदना-फाँदना चाहिए जिससे जमे हुए कफ की छोटी-मोटी गाँठें भी पिघल जायें और वे ट्यूमर कैंसर का रूप न ले और कोई दिमाग या कमर का ट्यूमर भी न हो । तुम्हारे शरीर में जो कुछ अस्त-व्यस्तता है, वह गर्मी से तथा नाचने, कूदने-फाँदने से ठीक हो जाती है ।
🚩पलाश के फूलों का रंग एक-दूसरे पर छिड़क के अपने चित्त को आनंदित व उल्लसित करना ।
🚩#धुलेंडी के दिन पहले से ही शरीर पर नारियल या सरसों का तेल अच्छी प्रकार लगा लेना चाहिए, जिससे यदि कोई त्वचा पर रासायनिक रंग डाले तो उसका दुष्प्रभाव न पड़े और वह आसानी से छूट जाय। (स्त्रोत : ऋषि प्रसाद )
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