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Friday, February 11, 2022

कोरोना महामारी से भयभीत नहीं होना है, बल्कि ये उपाय करने होंगे...

27 अप्रैल 2021

azaadbharat.org


भारत में एक कालखंड में आयुर्वेद के साथ ही भारतीय ज्ञान-परंपरा की बहुत उपेक्षा की गई; परंतु भारतीय समाज में आज भी धर्माचरण से जुड़ीं कुछ पारंपरिक आदतें और पद्धतियां देखने को मिलती हैं। यदि सनातन हिन्दू धर्म द्वारा निर्देशित पद्धतियों के अनुसार तनिक भी आचरण करने से लाभ मिलता हो, तो संपूर्ण जीवनशैली को ही धर्माधिष्ठित बनाने का प्रयास किया जाए, तो उससे कितना लाभ मिलेगा?



हिन्दू धर्म में वातावरण शुद्धि हेतु अग्निहोत्र बताया गया है। इस अग्निहोत्र में परमाणु विकिरण के संकट को भी टालने का सामर्थ्य है। हिन्दू धर्म द्वारा बताई गई सभी बातें अनुभवजन्य हैं। उनका श्रद्धापूर्वक आचरण करनेवालों को उसका फल तो मिलता ही है। आजतक करोड़ों लोगों ने इसकी अनुभूति की है। भारतीय संस्कृति का प्रसार करने की, साथ ही विश्‍व को उसका महत्त्व विशद करने का यह एक अवसर भर है। कोरोना को एक हितकारी संकट मानकर भारत को इसका लाभ उठाना चाहिए।


विकट स्थिति में क्या करें?


ऐसी स्थिति में साधना ही तारणहार 


अनेक भविष्यदृष्टा संतों ने आगामी काल में अनेक प्राकृतिक, साथ ही मनुष्यनिर्मित आपत्तियों का पहाड़ टूटने की भविष्यवाणी की है। ‘कोरोना’ का संक्रमण इसीकी एक झलक है। इस संकटकाल का आरंभ होते ही सभी उपलब्ध तंत्रों के वेंटिलेटर पर जाने की स्थिति बनी है। इसलिए आगे भी जब इससे अधिक संकट आएंगे, तब क्या स्थिति होगी- इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। किसे स्वीकार हो अथवा न हो; परंतु इस संकटकाल से पार होने हेतु केवल साधना ही तारणहार सिद्ध होगी, यह निश्‍चित है ! आजकल समाज में दिखाई देनेवाले संक्रामक रोग, महंगाई, युद्धजन्य स्थिति, बढ़ता अपराधीकरण- इनके तात्कालिक कारण प्रत्येक बार मिलेंगे ही; परंतु ‘कालचक्र’ ही इन सभी समस्याओं का वास्तविक मूल और उत्तर भी है ! स्थिर रहकर स्थिति का सामना करना संभव कर पाने हेतु, साथ ही मन की स्थिरता को अखंडित बनाए रखने हेतु साधना ही महत्त्वपूर्ण होती है। साधना का बल हो, तो उससे व्यक्ति का आत्मिक बल तो बढ़ता ही है; किंतु उसके साथ-साथ ईश्‍वर अथवा गुरु के प्रति श्रद्धा किसी भी संकट का सामना करने का बल प्रदान कर व्यक्ति को निर्भय बनाती है। हिन्दुओं के पुराणों में दी गई कथाएं भी यही संदेश देती हैं। हिरण्यकशिपु द्वारा भक्त प्रह्लाद को बिना किसी कारण उबलते तेल में डाला जाना, ऊंची पहाड़ी से फेंका जाना तो प्रह्लाद के लिए भयावह स्थिति ही थी; परंतु भक्त प्रह्लाद के ईश्‍वरस्मरण में संलिप्त रहने से उन्हें इस संकट का दंश नहीं झेलना पड़ा। अतः इसी प्रकार से हमारे लिए भी ईश्‍वरभक्ति बढ़ाना ही सभी समस्याओं का समाधान है।


कोरोना काल में अपनी इम्युनिटी कैसे स्ट्रॉंग करें?


1. साइट्रिक एसिड का लेवल maintain रखें। इसके लिए मौसमी, संतरा, नींबू, आंवला, कच्चे टमाटर का सेवन प्रतिदिन करें। प्वॉइंट 2 ग्राम साइट्रिक एसिड आपके शरीर में प्रतिदिन जाना चाहिए।


2.) घर से बाहर जाने से पहले और घर पर वापिस आने के बाद गर्म पानी में हल्दी, अजवाइन डालकर 8 से 10 मिनट तक भाप (स्टीम) लें।


3.) बाजारू ठंडे पेय पदार्थों का सेवन न करें। फ्रिज का पानी न पिएं। room temperature के अनुकूल पानी पियें। गर्म पानी में नींबू, अदरक व कच्ची हल्दी कूटकर डालें (अगर कच्ची हल्दी न हो तो आधा चम्मच हल्दी पाउडर लें)- ये पानी दिन में 2 बार सुबह-शाम पियें।


4.) दो से तीन दिन तक 2 कली लहसुन, छोटा अदरक का टुकड़ा दिन में 2 बार चबाचबा कर उसका रस लें।


5.) कच्ची हल्दी का टुकड़ा दिन में दो बार चबाचबा कर खाएं।


6.)  दिन में एक बार नींबू का रस नाक में 4 से 5 बूंद जरूर डालें।


7.) अगर साँस लेने में दिक्कत आ रही है तो हल्दी, अजवाइन और कपूर गर्म पानी में डालकर दिन में 1 से सवा घण्टे के अंतराल से भाप (स्टीम) लेते रहें।


आयुर्वेद अपनाएं स्वस्थ रहें...


देशी गाय के गोबर के कंडे पर घी, कपूर आदि डालकर धूप करें जिससे वातावरण की शुद्धि होगी और हानिकारक बैक्टीरिया पनप नहीं पाएंगे।


तुलसी, नीम और गिलोय आदि का काढा भी जरूर पियें जिससे रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ेगी और कोरोना जैसे वायरस आप पर जल्दी से हमला नहीं कर पाएंगे।


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कोरोना वायरस खत्म करने का एक अमोघ साधन...

23 अप्रैल 2021

azaadbharat.org


कोरोना वायरस का प्रकोप हुआ है तबसे मीडिया, सोशल मीडिया में उसीकी खबरें चलाई जाती है। लेकिन क्या कोरोना वायरस से भी अनंतगुना शक्तिशाली ईश्वर नहीं है? कोरोना से सावधानी रखनी जरूरी है लेकिन 24 घन्टे वही खबर दिखाकर लोगों को भयभीत किया जाता है उसकी जगह सृष्टिकर्ता ईश्वर की खबरें दिखाई जाएं और ईश्वर के नाम का गुणगान किया जाए, प्रार्थनाएं की जायें तो बहुत लाभ होगा और कोरोना रूपी राक्षस का भी नाश होगा।



भगवान सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान हैं, समस्त प्राणियों के हृदय में विराजमान आत्मा हैं। उनकी लीला अमोघ है। उनकी शक्ति और उनका पराक्रम अनन्त है।


🚩महर्षि व्यासजी ने 'श्रीमद्भागवत' के माहात्म्य तथा  प्रथम स्कंध के प्रथम अध्याय के प्रारम्भ में मंगलाचरण के रुप में भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति इस प्रकार से की हैः


सच्चिदानंदरूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे।

तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः।।


'सच्चिदानंद भगवान श्रीकृष्ण को हम नमस्कार करते हैं, जो जगत की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय के हेतु तथा आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक – इन तीनों प्रकार के तापों का नाश करने वाले हैं।'

(श्रीमद्भागवत मा. 1.1)


★ भगवान की प्रार्थना में कितना बल है ये जान लीजिए...


वह परमात्मा कैसा समर्थ है! वह ‘कर्तुं अकर्तुं अन्यथाकर्तुं समर्थः’ है। असम्भव भी उसके लिए सम्भव है।


1970 की एक घटना अमेरिका के विज्ञान जगत में चिरस्मरणीय रहेगी।

अमेरिका ने 11 अप्रैल, 1970 को अपोलो-13 नामक अंतिरक्षयान चन्द्रमा पर भेजा। दो दिन बाद वह चन्द्रमा पर पहुँचा और जैसे ही कार्यरत हुआ कि उसके प्रथम युनिट ऑडीसी (सी.एस.एम.) के ऑक्सीजन की टंकी में विद्युत तार में स्पार्किंग होने के कारण अचानक विस्फोट हुआ जिससे युनिट में ऑक्सीजन खत्म हो गयी और विद्युत आपूर्ति बंद हो गयी।


उस युनिट में तीन अंतरिक्षयात्री थेः जेम्स ए. लोवेल, जॉन एल. स्वीगर्ट और फ्रेड वोलेस हेईज। इन अंतरिक्षयात्रियों ने विस्फोट होने पर सी.एस.एम. युनिट की सब प्रणालियाँ बंद कर दीं एवं वे तीनों उस युनिट को छोड़कर एक्वेरियस (एल.एम.) युनिट में चले गये।


अब असीम अंतरिक्ष में केवल एल.एम. युनिट ही उनके लिए लाइफ बोट के समान था। परंतु बाहर की प्रचंड गर्मी से रक्षा करने के लिए उस युनिट में गर्मी रक्षा कवच नहीं था। अतः पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रविष्ट होकर पुनः पृथ्वी पर वापस लौटने में उसका उपयोग कर सकना सम्भव नहीं था।

पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के अनुसार पृथ्वी पर वापस लौटने में अभी चार दिन बाकी थे। इतना लम्बा समय चले उतना ऑक्सीजन एवं पानी का संग्रह नहीं बचा था। इसके अतिरिक्त इस युनिट के अंदर बर्फ की तरह जमा दे ऐसा ठंडा वातावरण एवं अत्यधिक कार्बन डाईऑक्साइड था। जीवन बचने की कोई गुंजाइश नहीं थी।

अंतरिक्षयात्री पृथ्वी के नियंत्रणकक्ष के निरंतर सम्पर्क में थे। उन्होंने कहाः “अंतरिक्षयान में धमाका हुआ है… अब हम गये…”

लाखों मील ऊँचाई पर अंतरिक्ष में मानवीय सहायता पहुँचाना सम्भव नहीं था। अंतरिक्षयान गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से भी ऊपर था। इस विकट परिस्थिति में सब निःसहाय हो गये। कोई मानवीय ताकत अंतरिक्षयात्रियों को सहायता पहुँचा सके- यह सम्भव नहीं था।

नीचे नियंत्रण कक्ष से कहा गयाः

“अब हम तो कुछ नहीं कर सकते। हम केवल प्रार्थना कर सकते हैं। जिसके हाथों में यह सारी सृष्टि है उस ईश्वर से हम केवल प्रार्थना कर सकते हैं... May God help you! We too shall pray to God. God will help you.” और देशवासियों ने भी प्रार्थना की।

युवान अंतरिक्षयात्रियों ने हिम्मत की। उन्होंने ईश्वर के भरोसे पर एक साहस किया। चंद्र पर अवरोहण करने के लिए एल.एम. युनिट के जिस इन्जन का उपयोग करना था उस इन्जन की गति एवं दिशा बदलकर एवं स्वयं गर्मी-रक्षक कवचरहित उस एल.एम. युनिट में बैठकर अपोलो – 13 को पृथ्वी की ओर मोड़ दिया। …और आश्चर्य ! तमाम जीवनघातक जोखिमों से पार होकर अंतरिक्षयान ने सही सलामत 17 अप्रैल, 1970 के दिन प्रशान्त महासागर में सफल अवरोहण किया।


उन अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने बाद में वर्णन करते हुए कहाः “अंतरिक्ष में लाखों मील दूर से एवं एल.एम. जैसे गर्मी-रक्षक कवच से रहित युनिट में बैठकर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रवेश करना और प्रचण्ड गर्मी से बच जाना, हम तीनों का जीवित रहना असम्भव था… किसी भी मनुष्य का जीवित रहना असम्भव था। यह तो आप सबकी प्रार्थना ने काम किया है एवं अदृश्य सत्ता ने ही हमें जीवनदान दिया है।”

सष्टि में चाहे कितनी भी उथल-पुथल मच जाय लेकिन जब अदृश्य सत्ता किसी की रक्षा करना चाहती है तो वातावरण में कैसी भी व्यवस्था करके उसकी रक्षा कर देती है। ऐसे तो कई उदाहरण हैं।


★ प्रार्थना का प्रभाव


सन् 1956 में मद्रास इलाके में अकाल पड़ा। पीने का पानी मिलना भी दुर्लभ हो गया।


वहाँ का तालाब 'रेड स्टोन लेक' भी सूख गया। लोग त्राहिमाम् पुकार उठे। उस समय के मुख्यमंत्री श्री राजगोपालाचारी ने धार्मिक जनता से अपील की कि 'सभी लोग दरिया के किनारे एकत्रित होकर प्रार्थना करें।' सभी समुद्र तट पर एकत्रित हुए। किसी ने जप किया तो किसी ने गीता का पाठ, किसी ने रामायण की चौपाइयाँ गुंजायी तो किसी ने अपनी भावना के अनुसार अपने इष्टदेव से प्रार्थना की। मुख्यमंत्री ने सच्चे हृदय से, गदगद कंठ से वरुणदेव, इन्द्रदेव और सबमें बसे हुए आदिनारायण विष्णुदेव की प्रार्थना की। लोग प्रार्थना करके शाम को घर पहुँचे। वर्षा का मौसम तो कब का बीत चुका था। बारिश का कोई नामोनिशान नहीं दिखाई दे रहा था। 'आकाश मे बादल तो रोज आते और चले जाते हैं।'– ऐसा सोचते-सोचते सब लोग सो गये। रात को दो बजे मूसलाधार बरसात ऐसी बरसी, ऐसी बरसी कि 'रेड स्टोन लेक' पानी से छलक उठा। बारिश तो चलती ही रही। यहाँ तक कि मद्रास सरकार को शहर की सड़कों पर नावें चलानी पड़ीं।


दढ़ विश्वास, शुद्ध भाव, भगवन्नाम, भगवत्प्रार्थना छोटे-से-छोटे व्यक्ति को भी उन्नत करने में सक्षम है।


आज से हमें कोरोना रूपी राक्षस से सावधान रहना है पर भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। हम सर्वसमर्थ ईश्वर का नाम लेंगे, उनकी चर्चा, उनका ध्यान और उनकी प्रार्थना करेंगे तो कोरोना तो दूर होगा, साथ में हमारी चिंताएं, विध्न-बाधायें दूर होंगी और देश में सुंदर वातावरण बनेगा। मीडिया के बंधुओं से भी अपील है कि टीआरपी के लिए कोरोना की अधिक खबरें नहीं चलाकर ईश्वर के सामर्थ्यवाली खबरें चलाकर देश में सुखमय वातावरण बनाने में सहयोग देना चाहिए।


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