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Wednesday, February 23, 2022

नशा करने के कितने नुकसान और छोड़ने से कितने फायदे होते हैं- जान लीजिये...

26 जून 2021

azaadbharat.org


विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2016 में कहा था- ‘‘दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र (11 देशों, जिसमें भारत शामिल है) में करीब 24.6 करोड़ लोग धूम्रपान करते हैं और 29 करोड़ से थोड़े कम तंबाकू का धुआंरहित स्वरूप में सेवन करते हैं।



उन्होंने कहा, ‘‘तंबाकू से हर साल क्षेत्र में 13 लाख लोगों की मौत हो जाती है, जो 150 मौत प्रति घंटे के बराबर है।’’

WHO के मुताबिक तंबाकू सेवन और धूम्रपान से दुनिया में हर 6 सेकेंड में एक व्यक्ति की मौत होती है।


बीसवीं सदी के अंत तक सिगरेट पीने के कारण 6 करोड़ 20 लाख लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे थे।


विकसित देशों में हर छठी मौत सिगरेट के कारण होती है। महिलाओं में सिगरेट पीने के बढ़ते चलन के कारण यह आँकड़ा और बढ़ा है।


तम्बाकू से होनेवाले दुष्परिणाम-


निकोटीन, टार और कार्बन-मोनोऑक्साइड जैसे हानिकारक केमिकल से युक्त तंबाकू जितना आपके फेफड़ों और चेहरे को प्रभावित करता है  उतना ही हानिकारक आपके नाजुक दिल के लिए भी होता है।


तबाकू का सेवन करनेवाले के मुँह से बदबू तो आती है, लेकिन उसके साथ ही उसको मुंह और गले में भयानक कैंसर की भी संभावना होती है। तंबाकू में मौजूद निकोटीन पूरे शरीर में रक्त की पूर्ति करनेवाली महाधमनी को प्रभावित करता है। यह फेफड़ों को भी काफी हद तक प्रभावित करता है जिससे श्वास संबंधी समस्याएं आम हो जाती हैं।



धम्रपान से बच्चों पर भयंकर असर...


जिन घरों में धूम्रपान आम होता है, उन घरों के बच्चे न चाहते हुए भी जन्म से ही 'धूम्रपान' की ज्यादतियों के शिकार हो जाते हैं।  धूम्रपान का धुआँ बच्चों में निमोनिया या पल्मोनरी ब्रोंकाइटिस अर्थात साँस के साथ उठनेवाली खाँसी की समस्या पैदा कर सकता है। बच्चों के मध्यकर्ण में अधिक पानी भर सकता है, उन्हें सुनने की अथवा वाचा की समस्या पैदा हो सकती है।


धूम्रपान के धुएँ में पलने वाले बच्चों के फेफड़े कम क्षमता से काम करते हैं। इसी वजह से उनकी रोगप्रतिरोधक प्रणाली भी कमजोर होती है। बच्चों का सामान्य विकास अवरुद्ध हो जाता है। उनका वजन और ऊँचाई दूसरों के मुकाबले कम होती है। जिन्होंने जीवन में कभी भी धूम्रपान नहीं किया हो उन्हें पैसिव स्मोकिंग के कारण फेफड़ों के कैंसर होने का 20-30 प्रतिशत जोखिम होता है।


दारू से नुकसान-


डॉ. टी.एल. निकल्स लिखते हैं- "जीवन के लिए किसी भी प्रकार और किसी भी मात्रा में अल्कोहल की आवश्यकता नहीं है। दारू से कोई भी लाभ होना असंभव है। दारू से नशा उत्पन्न होता है लेकिन साथ ही साथ अनेक रोग भी पैदा होते हैं। जो लोग सयाने हैं और सोच समझ सकते हैं, वे लोग मादक पदार्थों से दूर रहते हैं। भगवान ने मनुष्य को बुद्धि दी है, इससे बुद्धिपूर्वक सोचकर उसे दारू से दूर रहना चाहिए।"


दारू पीनेवालों की स्त्रियों की कल्पना करो। उनको कितना दुःख सहन करना पड़ता है। शराबी लोग अपनी पत्नी के साथ क्रूरतापूर्ण बर्ताव करते हैं। दारू पीनेवाला मनुष्य मिटकर राक्षस बन जाता है। वह राक्षस भी शक्ति एवं तेज से रहित होता है। उसके बच्चे भी कई प्रकार से निराशा महसूस करते हैं। सारा परिवार पूर्णतया परेशान होता है। दारू पीनेवालों की इज्जत समाज में कम होती है। ये लोग योग तथा भक्ति के अच्छे मार्ग पर नहीं चल सकते। आदमी ज्यों-ज्यों अधिक दारू पीता है त्यों-त्यों अधिकाधिक कमजोर बनता है। 


दारू पीने के अनेकों नुकसान को लेकर 6 अक्टूबर 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवा पीढ़ी में शराब पीने की बढ़ती समस्या पर चिंता जताते हुए कहा था कि यदि इस बुराई को नहीं रोका गया तो अगले 25 साल में समाज तबाह हो जाएगा।


दारू के शौकीन लोग कहते हैं कि दारू पीने से शरीर में शक्ति, स्फूर्ति और उत्तेजना आती है। परन्तु उनका यह तर्क बिल्कुल असंगत है। थोड़ी देर के लिए कुछ उत्तेजना आती है लेकिन अन्त में दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं।


जीव विज्ञान के ज्ञाताओं का कहना है कि शराबियों के रक्त में अल्कोहल मिल जाता है अतः उनके बच्चों को आँख का कैन्सर होने की संभावना है। दस पीढ़ी तक की कोई भी संतान इसका शिकार हो सकती है। शराबी अपनी खाना-खराबी तो करता ही है, दस पीढ़ियों के लिए भी विनाश को आमंत्रित करता है।


वयसन छोड़ने के अनेक फायदे...


1. नशा बंद करने के 12 मिनट के भीतर ही आपकी उच्च हृदय गति (हाई बी.पी) और रक्त चाप में कमी (लो बी.पी) दिखने लगेगी। 12 घंटे बाद अपने खून में मौजूद कार्बन मोनोऑक्साइड का स्तर घटकर सामान्य पर पहुंच जाएगा। वहीं दो से 12 हफ्तों में आपके शरीर के भीतर खून के प्रवाह और फेफड़ों की क्षमता बढ़ जाएगी।


2. नशा छोड़े हुए एक साल बीतते-बीतते आप में दिल से जुड़ी बीमारियां होने का खतरा धूम्रपान करनेवालों की तुलना में आधा तक रह जाएगा। वहीं पांच साल तक पहुंचने पर मस्तिष्काघात का खतरा नॉन के स्तर पर पहुंच जाएगा।


3. दस साल तक अपने-आपको व्यसन से दूर रखने पर आपमें फेफड़ों का कैंसर होने का खतरा धूम्रपान करनेवाले की तुलना में आधे पर पहुंच जाएगा। वहीं मुंह, गले, मूत्राशय, गर्भाशय और अग्नाशय में कैंसर का खतरा भी कम हो जाएगा।


4. नशा छोड़ने पर आपकी जीवन-प्रत्याशा में भी इजाफा होगा। अगर आप 30 वर्ष की उम्र से पहले ही धूम्रपान की लत से तौबा कर लेते हैं तो धूम्रपान करनेवालों की तुलना में आपकी जीवन प्रत्याशा करीब 10 साल तक बढ़ जाएगी, लेकिन धूम्रपान छोड़ने में देर करने से आपकी जिंदगी भी छोटी होती चली जाएगी।


5. धूम्रपान छोड़ने से आप में नपुंसकता की आशंका कम होती है। इसके अलावा महिलाओं में गर्भधारण में कठिनाई, गर्भपात, समय से पहले जन्म या जन्म के समय बच्चे का वजन बेहद कम होने जैसी समस्याएं भी कम होती है।


6. आपके व्यसन से तौबा करने पर आपके बच्चों में भी सेकंड हैंड स्मोक से होनेवाली श्वास संबंधी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है।


7. धूम्रपान छोड़ना आपकी जेब के लिए भी फायदेमंद है। मान लें- अगर आप औसतन प्रतिदिन 10 सिगरेट पीते हैं और एक सिगरेट की कीमत 10 रुपये है, तो आप सालभर में ही 36,500 रुपये बस धूम्रपान में ही फूंक डालते हैं। इन पैसों से आप कुछ तो बेहतर काम कर ही सकते हैं।


वयसन छोड़ने के उपाय-


अजवाइन साफ कर इसे नींबू के रस और काले नमक में दो दिन तक भींगने के लिए छोड़ दें, फिर इसे सुखा लें और इसके बाद इसको मुंह में घंटों रखकर तंबाकू को खाने जैसी अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं।

अगर आपको तंबाकू खाने की तलब काफी ज्यादा है तो आप बारीक सौंफ के साथ मिश्री के दाने मिलाकर धीरे-धीरे चूस सकते हैं।


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Saturday, February 12, 2022

कम्युनिस्टों की जहरीली कलम देश का कर रही है नुकसान

11 मई 2021

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पश्चिमी बंगाल मे हिंदुओं (विशेष रूप से दलित हिन्दू) का अमानुषिक उत्पीड़न 2 मई की रात से लगातार जारी है। सम्पूर्ण मीडिया इसपर चुप है। राज्य सरकार अपराधियों का साथ दे रही है तो केन्द्र सरकार चुप है। बड़ी संख्या में बंगाल से भाग कर असम में शरण लिए लोगों की खबरे आ रही हैं। परंतु मीडिया और सभी राजनैतिक दल इस पर चुप हैं। 



परसिद्ध अमेरिकी लेखक हावर्ड फास्ट ने अमेरिका की कम्युनिस्ट पार्टी में 16 वर्ष काम किया था। वह लिखते हैं कि पार्टी से सहानुभूति रखने वाले बाहरी बुद्धिजीवियों में प्राय: पार्टी सदस्यों से भी अधिक अंधविश्वास दिखता है। कम्युनिज्म के सिद्धांत-व्यवहार के ज्ञान या अनुभव के बदले वे अपनी कल्पना और प्रवृत्ति से अपनी राय बना लेते हैं। यह बात दुनिया भर के कम्युनिस्ट समर्थकों के लिए सच है।


चोर तबरेज आलम की पिटाई के कारण मरने पर रविश कुमार 33 घंटे चिल्लाया और पालघर के सन्यासियों के क्रूर संहार पर 33 सेकंड। बंगाल के नरसंहार और सामूहिक बलात्कार पर पूरी तरह चुप। 


भारत में इसी तरह का एक उदाहरण है- अरुंधती राय, जिसने कुछ समय से नक्सली कम्युनिस्टों के समर्थन का झंडा उठा रखा है। कुछ समय पहले इसने एक लेख “वाकिंग विद द कामरेड्स” लिखा। लेख का अंतिम निष्कर्ष यह है कि सन् 1947 से ही भारत एक औपनिवेशिक शक्ति है, जिसने दूसरों पर सैनिक आक्रमण करके उनकी जमीन हथियाई। इसी तरह भारत के तमाम आदिवासी क्षेत्र स्वाभाविक रूप से नक्सलवादियों के हैं, जिनपर इंडियन स्टेट ने सैनिक बल से अवैध कब्जा किया हुआ है। इस साम्राज्यवादी युद्धखोर ‘अपर कास्ट हिंदू स्टेट’ ने मुस्लिमों, ईसाईयों, सिखों, कम्युनिस्टों, दलितों, आदिवासियों और गरीबों के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है।


महाश्वेता देवी उच्चतम कोटि की लेखिका थीं, वामपंथीं थीं, नक्सलियों की हमदर्द थीं, इन देशद्रोहियों के मानवाधिकार का पुरजोर समर्थन करती थीं, अपनी एकपक्षीय काल्पनिक कहानियों में देश के प्रहरियों को अत्याचारी और बलात्कारी साबित करती थीं, सैकड़ों बेगुनाह सुरक्षाकर्मियों के नक्सलियों द्वारा मारे जाने पर होंठ सी लेती थीं, जंगलों में राष्ट्रभक्त आदिवासियों की नक्सलवादियों द्वारा कंगारू कोर्ट लगाकर निर्मम हत्या पर इनकी दोनों आंखों में मोतियाबिंद पककर उतर जाता था, जातिवादी नक्सली कमांडरों द्वारा लगातार किये जा रहे महिला नक्सलियों के यौन शोषण पर इनकी लेखनी को लकवा मार देता था। 


नक्सलियों के मारे जाने को सुरक्षा बलों की हिंसा बता इसका विरोध करती थीं और फटाफट-फटाफट इसपर लेख , कहानियां लिख डालती थीं, लेकिन नक्सलियों द्वारा की जा रही जवानों की हत्याओं पर इनका 'सिंगल लाइनर' आ जाता था, "मैं हिंसा के पक्ष में नहीं हूं।" नक्सली हिंसा और अपराध के विरोध में कभी कुछ नहीं लिखा। लिखतीं तो यह पोस्ट भी निरर्थक होती। सुरक्षा बलों का मानवाधिकार इनके लिये बेमानी था।


कभी नक्सली हत्या के विरूद्ध नहीं लिखा। नक्सलवाद में मौजूद जातिवाद और आदिवासी नक्सल महिलाओं के यौन शोषण और उनकी जघन्य हत्याओं से आंखें फेर लीं। निर्दोष नागरिकों और सुरक्षादल के जवानों की हत्या पर उनका साहित्यिक दिल कभी भी नहीं पसीजा। 


लगभग सौ साल पहले रूसी कम्युनिस्टों को सार्वजनिक लेखन-भाषण की तकनीक सिखाते हुए लेनिन ने कहा था कि जो भी तुम्हारा विरोधी या प्रतिद्वंद्वी हो, पहले उस पर ‘प्रमाणित दोषी का लेबल चिपका दो. उस पर मुकदमा हम बाद में चलाएंगे.’ तबसे सारी दुनिया के कम्युनिस्टों ने इस आसान, पर घातक तकनीक का जमकर उपयोग किया है। अपने अंधविश्वास, संगठन बल और दुनिया को बदल डालने के रोमांटिक उत्साह से उनमें ऐसा नशा रहा है कि प्राय: किसी पर प्रमाणित दोषी का बिल्ला चिपकाने और हर तरह की गालियां देने के बाद वे मुकदमा चलाने की जरूरत भी नहीं महसूस करते!


इसी मानसिकता से लेनिन-स्तालिन-माओवादी सत्ताओं ने दुनिया भर में अब तक दस करोड़ से अधिक निर्दोष लोगों की हत्याएं कीं। भारत के माओवादी उनसे भिन्न नहीं रहे हैं। जिस हद तक उनका प्रभाव क्षेत्र बना है, वहां वे भी उसी प्रकार निर्मम हत्याएं करते रहे हैं। अरुंधती ने भी नोट किया है कि नक्सलियों ने गलती से निर्दोषों की भी हत्याएं की हैं। किंतु ध्यान दें, यहां निर्दोष का मतलब- माओवादी-लेनिनवादी समझ से निर्दोष, न कि हमारी-आपकी अथवा भारतीय संविधान या कानून की दृष्टि से। दूसरे शब्दों में, जिसे माओवादियों और उनके अरुंधती जैसे अंध-समर्थकों ने ‘दोषी’ बता दिया, उसे तरह-तरह की यंत्रणा देकर मार डालना बिलकुल सही।


कछ साल पहले हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के केंन्द्रीय विश्वविद्यालय के अंग्रेजी और विदेशी भाषा विभाग ने महाश्वेता देवी की लघु कथा 'द्रौपदी' पर आधारित नाटक का मंचन किया। इस कथा में द्रौपदी नाम की आदिवासी महिला की सुरक्षादलों के हाथों मुठभेड़ें मारे जाने का एकतरफा वर्णन है। नाटक में वर्दीधारी सुरक्षा दलों द्वारा किये जा रहे अत्याचारों और बलात्कार को दिखाया जा रहा था। ध्यान दें कि जब सारा देश उरी में हुये सेना के जवानों के बलिदान से दुखी था, आक्रोशित था, पाकिस्तान को सबक सिखाने को तत्पर था, इस निंदक नाटक का मंचन जनता और सैन्य दलों के मनोबल को तोड़ने का सोचा समझा षड़यंत्र था। स्थानीय नागरिकों द्वारा गठित 'सैनिक सम्मान संघर्ष समिति' नेे इस नाट्य-मंचन का विरोध किया और पुलिस को सूचितकर इसे बंद करवाया। https://bit.ly/3oeCVuk


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