Tuesday, September 24, 2019

विज्ञान चाहे कितनी भी तरक्की कर ले पर ईश्वर के सामने फेल है

24 अप्रैल 2019 

*🚩ईश्वर द्वारा प्रकृति की संरचना ही सर्वश्रेष्ठ संरचना हैं। हमें ईश्वर ने जो जिस रूप में दिया वहीं हमारे लिए सर्वोत्तम है। हम भोग-विलास, दिखावे और लालसा में भले ही प्राकृतिक चीजों से दूर चले गए पर आज मानव निर्मित चीजों के दुष्प्रभावों, दुष्परिणामों के कारण मनुष्य को वापिस प्राकृतिक चीजों की तरफ लौटना पड़ा रहा है क्योंकि वहीं सर्वश्रेष्ठ है।*

*🚩जानिए इस विषय में कुछ उदाहरण:*


*1.) पहले मनुष्य मिट्टी के बर्तन प्रयोग करता था। फिर वहां से भिन्न भिन्न धातुओं और स्टील और प्लास्टिक के बर्तनों तक पहुँच गया है। पर इनके प्रयोग से कैंसर होने का खतरा हो गया है इसलिए मनुष्य दोबारा मिट्टी के बर्तनों तक आ रहा है।*

*🚩2.) पहले इंसान अंगूठाछाप था क्योंकि उसे पढ़ना लिखना नहीं आता था। बाद में जब पढ़ना लिखना आया तो दस्तखत (Signature) करने का प्रचलन चला। आज विज्ञान जहां चरमसीमा पर पहुँच चुका है तो इंसान फिर से Thumb Scanning की तकनीकी के कारण अंगूठाछाप बन गया है।*

*🚩3.) पहले मनुष्य फटे हुए सादे कपड़े पहनता था। फिर साफ सुथरे और प्रेस किए कपड़े पहनने लगा। फिर फैशन के नाम पर अपनी पैंटें फाड़ने लगा। सूती वस्त्रों से टैरीलीन, टैरीकॉट पर पहुँचा इंसान फिर से वापस सूती वस्त्रों पर आ रहा है।*

*🚩4.) मनुष्य पहले पढ़ता ही नहीं था। जब ज्ञान हुआ तो गुरुकुलों में नैतिक और आध्यात्मिक ज्ञान ही लिया। अब विज्ञान चरमसीमा पर है। लोग MBBS, Engineering, MBA की पढ़ाई कर रहे हैं पर नैतिक और आध्यात्मिक ज्ञान और शांति नहीं है। आत्महत्या जैसा घोर पाप बढ़ कर रहे हैं, अपराध बढ़ गया है। समय वो आ गया है कि नैतिक और आध्यात्मिक ज्ञान भौतिक ज्ञान से जरूरी हो गया है।*

*🚩5.) खेती में पहले मनुष्य प्राकृतिक खाद प्रयोग करता था। बाद में यूरिया, कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करने लगा। इनके दुष्प्रभावों के कारण मनुष्य अब वापिस आर्गेनिक खेती की तरफ बढ़ रहा है।*

*🚩6.) पहले मनुष्य कुदरती फल, खाद्य पदार्थ ही खाता था। उस क़ुदरती भोजन से मनुष्य प्रोसेसफ़ूड (Canned Food & packed juices) की तरफ बढ़ा। इससे तरह तरह की बीमारियां होने लगी। अब इन बीमारियों से बचने के लिए मनुष्य दोबारा क़ुदरती भोजन की तरफ आ रहा है।*

*🚩7.) पहले मनुष्य सादी वस्तुएं प्रयोग करता था। फिर पुरानी और सादा चीज़ें इस्तेमाल ना करके ब्रांडेड (Branded) चीजें प्रयोग करने लगा। नई चीजों से जी भर गया तो पुरानी चीजें ही Antique Piece  कहकर रखने लगा।*

*🚩8.) पहले मनुष्य आयुर्वेदिक पद्दति से ईलाज करता था। फिर एलोपैथी का प्रचलन हुआ, एंटीबायोटिक का जमाना आया। एलोपैथी और एंटीबायोटिक के दुष्प्रभावों के कारण मनुष्य वापिस आयुर्वेद की तरफ बढ़ रहा है।*

*🚩9.) पहले बच्चे मिट्टी खाते थे। जैसे जैसे सभ्यता का विकास हुआ, मनुष्य बच्चों को इंफेक्शन से डर से मिट्टी में खेलने से रोकने लगा। बच्चों को घर में बंद करके फिसड्डी बना दिया। उसी मनुष्य ने अब Immunity बढ़ाने के नाम पर बच्चों को फिर से मिट्टी में खिलाना शुरू कर दिया है।*

*🚩10.) पहले मनुष्य जंगल में रहा, गावों में रहा। फिर विकास की दौड़ में शहर की तरफ भागा। वहां पर्यावरण को प्रदूषित किया और अब वापिस साफ हवा और स्वास्थ्य लाभ के लिए जंगल, गांव और हिल-स्टेशनों की तरफ जा रहा है।*

*🚩11.) जंगल, गांव और गौशालाओं में रहने वाला मनुष्य चकाचौंध से प्रभावित होकर शहर भागा, डिस्को पब भागा। अब मनुष्य दोबारा मन की शांति के लिए शहर से जँगल, गाँव व गौशालाओं की ओर आ रहा है।*

*🚩12) भारतीय (हिंदू) संस्कृति महान थी उसने अनुसार जीवन जीने से व्यक्ति स्वस्थ्य, सुखी एवं सम्मानित जीवन जीता था लेकिन टीवी, फिल्मे और मीडिया के दुष्प्रभाव के कारण पाश्चात्य संस्कृति में चला गया लेकिन वहाँ दुःख, चिंता, बीमारियां बढ़ने लगी तो भारतीय संस्कृति की तरफ लौटना शुरू कर दिया।*

*🚩इससे ये निष्कर्ष निकलता है कि तकनीकी ने हमें जो दिया, उससे बेहतर तो भगवान ने हमें पहले ही दे रखा था। वास्तव में विज्ञान की बजाय ईश्वर की संरचना ही हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ है। इससे सिद्ध होता है कि हमारे लिए ईश्वर से बड़ा कोई हितैषी नहीं है।*

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Monday, September 23, 2019

जानिए ईसाई मिशनरियों द्वारा कैसे किया जाता है धर्मान्तरण?

23 अप्रैल 2019 

*🚩केरल में बाढ़ का पानी उतरने के बाद ईसाई मिशनरी विशेष रूप से हरकत में आ गई थी। उनका उद्देश्य पीड़ितों की सेवा करना नहीं अपितु ईसा मसीह के लिए नई फसल तैयार करना हैं। पहले भी सुनामी आपदा के समय राहत के बदले धर्म परिवर्तन का प्रलोभन देते हुए ईसाई प्रचारक देखे गए थे। क्या धर्म प्रचार का उद्देश्य प्रलोभन देकर धर्मान्तरण करना है? क्या बिना धर्म परिवर्तन के पीड़ित मनुष्यों को सहायता नहीं की जा सकती? यह खुला प्रश्न सभी ईसाईयों से है। हमारे देश के संभवत शायद ही कोई चिंतक ऐसे हुए हो जिन्होंने प्रलोभन द्वारा धर्मान्तरण करने की निंदा न की हो। महान चिंतक एवं समाज सुधारक स्वामी दयानंद का एक ईसाई पादरी से शास्त्रार्थ हो रहा था। स्वामी जी ने पादरी से कहा की हिन्दुओं का धर्मांतरण करने के तीन तरीके है। पहला जैसा मुसलमानों के राज में गर्दन पर तलवार रखकर जोर जबरदस्ती से बनाया जाता था। दूसरा बाढ़, भूकम्प, प्लेग आदि प्राकृतिक आपदा जिसमें हज़ारों लोग निराश्रित होकर ईसाईयों द्वारा संचालित अनाथाश्रम एवं विधवाश्रम आदि में लोभ-प्रलोभन के चलते भर्ती हो जाते थे और इस कारण से आप लोग प्राकृतिक आपदाओं के देश पर बार बार आने की अपने ईश्वर से प्रार्थना करते है और तीसरा बाइबिल की शिक्षाओं के जोर शोर से प्रचार-प्रसार करके। मेरे विचार से इन तीनों में सबसे उचित अंतिम तरीका मानता हूँ। स्वामी दयानंद की स्पष्टवादिता सुनकर पादरी के मुख से कोई शब्द न निकला। स्वामी जी ने कुछ ही पंक्तियों में धर्मान्तरण के पीछे की विकृत मानसिकता को उजागर कर दिया।


*🚩राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ईसाई धर्मान्तरण के सबसे बड़े आलोचको में से एक थे। अपनी आत्मकथा में महात्मा गांधी लिखते है "उन दिनों ईसाई मिशनरी हाई स्कूल के पास नुक्कड़ पर खड़े हो हिन्दुओं तथा देवी देवताओं पर गलियां उड़ेलते हुए अपने मत का प्रचार करते थे। यह भी सुना है की एक नया कन्वर्ट (मतांतरित) अपने पूर्वजों के धर्म को, उनके रहन-सहन को तथा उनके गलियां देने लगता है। इन सबसे मुझमें ईसाइयत के प्रति नापसंदगी पैदा हो गई।" इतना ही नहीं गांधी जी से मई, 1935 में एक ईसाई मिशनरी नर्स ने पूछा कि क्या आप मिशनरियों के भारत आगमन पर रोक लगाना चाहते है तो जवाब में गांधी जी ने कहा था,' अगर सत्ता मेरे हाथ में हो और मैं कानून बना सकूं तो मैं मतांतरण का यह सारा धंधा ही बंद करा दूँ। मिशनरियों के प्रवेश से उन हिन्दू परिवारों में जहाँ मिशनरी पैठे है, वेशभूषा, रीतिरिवाज एवं खानपान तक में अंतर आ गया है।*

*🚩समाज सुधारक एवं देशभक्त लाला लाजपत राय द्वारा प्राकृतिक आपदाओं में अनाथ बच्चों एवं विधवा स्त्रियों को मिशनरी द्वारा धर्मान्तरित करने का पुरजोर विरोध किया गया जिसके कारण यह मामला अदालत तक पहुंच गया। ईसाई मिशनरी द्वारा किये गए कोर्ट केस में लाला जी की विजय हुई एवं एक आयोग के माध्यम से लाला जी ने यह प्रस्ताव पास करवाया की जब तक कोई भी स्थानीय संस्था निराश्रितों को आश्रय देने से मना न कर दे तब तक ईसाई मिशनरी उन्हें अपना नहीं सकती।*

*🚩समाज सुधारक डॉ अम्बेडकर को ईसाई समाज द्वारा अनेक प्रलोभन ईसाई मत अपनाने के लिए दिए गए मगर यह जमीनी हकीकत से परिचित थे की ईसाई मत ग्रहण कर लेने से भी दलित समाज अपने मुलभुत अधिकारों से वंचित ही रहेगा। डॉ आंबेडकर का चिंतन कितना व्यवहारिक था यह आज देखने को मिलता है।''जनवरी 1988 में अपनी वार्षिक बैठक में तमिलनाडु के बिशपों ने इस बात पर ध्यान दिया कि धर्मांतरण के बाद भी अनुसूचित जाति के ईसाई परंपरागत अछूत प्रथा से उत्पन्न सामाजिक व शैक्षिक और आर्थिक अति पिछड़ेपन का शिकार बने हुए हैं। फरवरी 1988 में जारी एक भावपूर्ण पत्र में तमिलनाडु के कैथलिक बिशपों ने स्वीकार किया 'जातिगत विभेद और उनके परिणामस्वरूप होने वाला अन्याय और हिंसा ईसाई सामाजिक जीवन और व्यवहार में अब भी जारी है। हम इस स्थिति को जानते हैं और गहरी पीड़ा के साथ इसे स्वीकार करते हैं।' भारतीय चर्च अब यह स्वीकार करता है कि एक करोड़ 90 लाख भारतीय ईसाइयों का लगभग 60 प्रतिशत भाग भेदभावपूर्ण व्यवहार का शिकार है। उसके साथ दूसरे दर्जे के ईसाई जैसा अथवा उससे भी बुरा व्यवहार किया जाता है। दक्षिण में अनुसूचित जातियों से ईसाई बनने वालों को अपनी बस्तियों तथा गिरिजाघर दोनों जगह अलग रखा जाता है। उनकी 'चेरी' या बस्ती मुख्य बस्ती से कुछ दूरी पर होती है और दूसरों को उपलब्ध नागरिक सुविधओं से वंचित रखी जाती है। चर्च में उन्हें दाहिनी ओर अलग कर दिया जाता है। उपासना (सर्विस) के समय उन्हें पवित्र पाठ पढऩे की अथवा पादरी की सहायता करने की अनुमति नहीं होती। बपतिस्मा, दृढि़करण अथवा विवाह संस्कार के समय उनकी बारी सबसे बाद में आती है। नीची जातियों से ईसाई बनने वालों के विवाह और अंतिम संस्कार के जुलूस मुख्य बस्ती के मार्गों से नहीं गुजर सकते। अनुसूचित जातियों से ईसाई बनने वालों के कब्रिस्तान अलग हैं। उनके मृतकों के लिए गिरजाघर की घंटियां नहीं बजतीं, न ही अंतिम प्रार्थना के लिए पादरी मृतक के घर जाता है।*
*🚩अंतिम संस्कार के लिए शव को गिरजाघर के भीतर नहीं ले जाया जा सकता। स्पष्ट है कि 'उच्च जाति' और 'निम्न जाति' के ईसाइयों के बीच अंतर्विवाह नहीं होते और अंतर्भोज भी नगण्य हैं। उनके बीच झड़पें आम हैं। नीची जाति के ईसाई अपनी स्थिति सुधारने के लिए संघर्ष छेड़ रहे हैं, गिरजाघर अनुकूल प्रतिक्रिया भी कर रहा है लेकिन अब तक कोई सार्थक बदलाव नहीं आया है। ऊंची जाति के ईसाइयों में भी जातिगत मूल याद किए जाते हैं और प्रछन्न रूप से ही सही लेकिन सामाजिक संबंधोंं में उनका रंग दिखाई देता है।*

*🚩महान विचारक वीर सावरकर धर्मान्तरण को राष्ट्रान्तरण मानते थे। आप कहते थे "यदि कोई व्यक्ति धर्मान्तरण करके ईसाई या मुसलमान बन जाता है तो फिर उसकी आस्था भारत में न रहकर उस देश के तीर्थ स्थलों में हो जाती है जहाँ के धर्म में वह आस्था रखता है, इसलिए धर्मान्तरण यानी राष्ट्रान्तरण है।*

*🚩इस प्रकार से प्राय: सभी देशभक्त नेता ईसाई धर्मान्तरण के विरोधी रहे है एवं उसे राष्ट्र एवं समाज के लिए हानिकारक मानते है। - डॉ विवेक आर्य*

*देश मे ईसाई मिशनरियों द्वारा हो रहे धर्मांतरण को रोकना होगा नही तो बहुत बड़ी हानि होगी।*

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Sunday, September 22, 2019

क्या सोनाक्षी सिन्हा ही धर्म के बारे में नहीं जानती हैं ?

22 अप्रैल 2019 

कौन बनेगा करोड़पति में प्रश्न पूछा गया कि हनुमानजी संजीवनी बूटी किसके लिए लेकर आये थे इस प्रश्न का सहीं उत्तर सोनाक्षी सिन्हा नहीं दे पाईं, उसके बाद सोशल मीडिया पर उसका खूब मजाक उड़ाया गया और आलोचना की गई ।मजाक और आलोचना इसलिए किया गया कि धर्म और शास्त्र के बारे में सोनाक्षी को जानकारी नहीं थी।


सोनाक्षी सिन्हा की आलोचना की गई यह सहीं है पर क्या आज यह स्थिति हमारे घर में नहीं है ? हमारे बच्चे क्या धर्म के बारे में सबकुछ जानते हैं ? सोनाक्षी सिन्हा के इस अज्ञान में, आज के भारत की नई पीढ़ी का अक्स देखा जा सकता है!*

सोनाक्षी पर तो हँस लिया पर अपने ही बच्चे कान्वेंट स्कूल में जा रहे हैं हमारी संतानें भी सोनाक्षी ही बन रही हैं।*

जरा अपनी संतानों से पूछ लो, जटायु कौन हैं, मंदोदरी कौन हैं,  अगस्त्य कौन हैं, शिखण्डी कौन हैं, अम्बा कौन हैं, शकुंतला कौन हैं, विश्वामित्र कौन हैं, तारा, अहिल्या कौन हैं, मामा शल्य किसके मामा थे, पाण्डवों ने कौन से पाँच गाँव माँगे थे अगर इसका तीस प्रतिशत भी सहीं जवाब मिलता है तो आपके बच्चे सहीं दिशा में हैं, पचास से ऊपर मतलब धर्म की शिक्षा अच्छी चल रही है, 80 से ऊपर मतलब बच्चे का खुद का भी झुकाव हैं इन बातों में (और ये झुकाव आपका ही बनाया होता है, वो वही दुनिया देखेंगे जो आप दिखायेंगे)*

जैसे ही बच्चा रोना शुरू किया, ले बेटे मोबाईल देख करके अपने पालक होने के कर्त्तव्य से पीछा छुड़ाने वाले भी सोनाक्षी तरह हँसने लायक हो गये हैं।*

ले बेटे मोबाईल देख करने के बजाये उसको बोलो कि इधर आजा बच्चे आज प्रह्लाद की कहानी सुनाऊँगा, आज गुरुभक्त आरुणि की, आज रानी दुर्गावती, रानी चेन्नम्मा, वीर शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह, श्री रामजी, श्री कृष्ण के अद्भुत लीला, साहस और बलिदान की कहानी सुनेंगे।*

यदि ऐसा नहीं करते हो तो सोनाक्षी पर हँसने के बजाये अपने भविष्य पर रो लेना क्योंकि आपसे पैदा हुई सन्तान आपकी नहीं रहेगी, किसी और सभ्यता की गुलाम हो जाएगी।*

आज का एक बड़ा तबका, राम एवं रामकथा से कोसों दूर है!*
*कितने परिवारों में माता पिता या अभिभावक बच्चों को हमारे पूर्वजों की कथाएँ सुनाते हैं? राम एवं कृष्ण की कथाएँ कहना सुनना सुनाना जिस शिक्षित समाज में आज भी पुरातनपंथी और पिछड़ेपन का द्योतक हो, वहां सोनाक्षी सिन्हा जैसा उत्तर ही मिलेगा!*

भारत में आज भी ऐसे पढ़े लिखे युवाओं की कमी नही, जो अयोध्या का नाम आते ही, विवाद में न पड़ते हुए कहते हैं*
*"अयोध्या में मंदिर नहीं, अस्पताल बनना चाहिए" फिर, हमारी पीढ़ी की अपने पुरखों के प्रति उदासीनता, अपने धर्म प्रतीकों के प्रति उपहास भाव से सींची नई पीढ़ी से ऐसे उत्तरों को सुनने में अचरज क्यों?*

अपने बच्चों को मशीन की तरह एक प्रोडक्ट के रूप में निर्मित कर रही पीढ़ी को समझना होगा कि, विद्यालयों के शैक्षणिक कोर्स का ज्ञान हममें संस्कार संस्कृति नही गढ़ते!*

आज धर्म के संस्कार नही मिलने के कारण ही बच्चें बड़े होकर मां-बाप को वृद्धाश्रम भेज देते है, लव जिहाद में फस जाते है, धर्म परिवर्तन कर लेते हैं, आत्महत्या कर लेते है, बीमारी की चपेट में आ जाते हैं, प्राचीन समय मे बच्चें गुरुकुलों में पढ़ते थे तो उनका बौद्धिक, मानसिक और शारिरिक का अदभुत विकास होता था जिससे वे हर क्षेत्र में आगे रहते थे लेकिन आज बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में भजेते है, पाठ्यक्रम में मुग़ल अंग्रेजो को पढ़ाया जाता है, सिनेमा, सीरियलो ओर मीडिया द्वारा हिन्दू धर्म के खिलाफ बताया जा रहा है फिर अपने बच्चे कैसे आगे प्रगति करेगे? सोनाक्षी सिन्हा की राह पर ही तो चल रहे है।*

इसलिए अपने बच्चों को धर्म की शिक्षा दीजिये जिससे समाज और देश सुदृढ़ बने।*


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Wednesday, September 18, 2019

सुप्रीम कोर्ट : समान नागरिक संहिता अभीतक क्यों लागू नही किया?

18 अप्रैल 2019 

🚩 *“समान नागरिक संहिता” ऐसी होनी चाहिये जिसका मुख्य आधार केवल भारतीय नागरिक होना चाहिये और कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म, जाति व सम्प्रदाय का हो सभी को सहज स्वीकार हो। जबकी विडम्बना यह है कि एक समान कानून की मांग को साम्प्रदायिकता का चोला पहना कर हिन्दू कानूनों को अल्पसंख्यकों पर थोपने के रुप में प्रस्तुत किया जाने का कुप्रचार किया जा रहा है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि 1947 में हुए धर्माधारित विभाजन के पश्चात भी हम आज लगभग 71 वर्ष बाद भी उस विभाजनकारी व समाजघाती सोच को समाप्त न कर सकें बल्कि उन समस्त कारणों को अल्पसंख्यकवाद के मोह में फंस कर प्रोत्साहित ही करते आ रहे है। हमारे मौलिक व संवैधानिक अधिकारो व साथ में पर्सनल लॉ की मान्यताए कई बार विषम परिस्थितियां खड़ी कर देती है, तभी तो उच्चतम न्यायालय “समान नागरिक संहिता” बनाने के लिए सरकार से बार-बार आग्रह कर रहा है।*

🚩 *समान नागरिक संहिता अर्थात देश के हर धर्म-समुदाय के नागरिक के लिए एक समान क़ानून। ये मुद्दा है जो हमेशा से भारतीय जनता पार्टी के मूल एजेंडे में रहा है। चरमपंथियों तथा कथित लिबरलों को छोड़ दें तो देश की ज्यादातर जनता भी इस कानून की पक्षधर है कि जब भारत एक सेक्युलर राष्ट्र है तब देश के सभी नागरिकों के लिए समान क़ानून क्यों नहीं है? सामान नागरिक संहिता कब लागू होगी, इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन इससे पहले माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर ऐसी टिप्पणी की है, जिसे सुन चरमपंथी चौंक गये हैं।*

🚩 *खबर के मुताबिक़, सुप्रीम कोर्ट ने 13 सितंबर को देश के नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता (UCC) तैयार किए जाने पर जोर दिया। इसके साथ ही उसने अफसोस जताया कि उसके प्रोत्साहन के बाद भी एक भी बार इस मकसद को हासिल करने की कोई कोशिश नहीं की गई। न्यायालय ने कहा कि संविधान निर्माताओं को आशा और उम्मीद थी कि राज्य पूरे भारतीय सीमा क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित कराने की कोशिश करेगा, लेकिन अभी तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है।*

🚩 *सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि गोवा एक बेहतरीन उदाहरण है जहां समान नागरिक संहिता है और धर्म की परवाह किए बिना सब पर लागू है सिवाय कुछ सीमित अधिकारों की रक्षा करते हुए। गोवा के मामले का जिक्र करते हुए कहा, “जिन मुस्लिम पुरुषों की शादियां गोवा में पंजीकृत हैं, वे बहुविवाह नहीं कर सकते। इसके अलावा इस्लाम के अनुयायियों के लिए भी मौखिक तलाक का कोई प्रावधान नहीं है."न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा कि यह गौर करना दिलचस्प है कि राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों से जुड़े भाग चार में संविधान के अनुच्छेद 44 में निर्माताओं ने उम्मीद की थी कि राज्य पूरे भारत में समान नागरिक संहिता के लिए प्रयास करेगा लेकिन आज तक इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की गई है।*

🚩 *सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हिंदू कानून तो 1956 में वजूद में आया, लेकिन देश के सभी नागरिकों पर समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया। पीठ ने यह भी कहा, 1985 में शाह बानो मामला, 1995 में सरला मुद्गल व अन्य बनाम भारत सरकार मामला और 2003 में जॉन वेल्लामैटम बनाम भारत संघ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता की हिमायत की थी, लेकिन अफ़सोस अब तक इसे लेकर कोई प्रयास नहीं किया गया।*- सुदर्शन न्यूज़

🚩 *भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत सरकार का ये कर्तव्य है कि पूरे देश में Uniform Civil Code लागू करें, मतलब सभी नागरिक कानून के सामने समान हो और सबको एक जैसे अधिकार मिले ।*

🚩 *पर वास्तविकता कुछ और ही है । आज़ादी के 71 साल के बाद भी आज तक Uniform Civil Code लागू नहीं हुआ है । अगर ये अनुच्छेद 44 मौलिक अधिकारों में डाल दिया होता तो इसको लागू करने के लिए आम आदमी अदालत का दरवाजा खटखटा सकता था । पर इस अनुच्छेद को नेहरु ने जान बुझकर नीति निर्देशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) में डाल दिया ताकि कोई अदालत में जाकर इसे लागू कराने के लिये फरियाद ना करें ।*

🚩 *वास्तव में ये अंग्रेज़ों की "फूट डालो और राज करो" की नीति का हिस्सा था । इसलिए Uniform Civil Code को मौलिक अधिकार नहीं बनाया ।*

🚩 *यह अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछले 30- 35 वर्षो में 5 -6 बार उच्चतम न्यायालय ने समाज में घृणा, वैमनस्यता व असमानता दूर करने के लिए समान कानून को लागू करना आवश्यक माना है फिर भी अभी तक कोई सार्थक पहल नही हो पायी । लगभग 15-20 वर्ष पूर्व में किये गए एक सर्वे के अनुसार भी 84 % जनता इस कानून के समर्थन में थी । इस सर्वे में अधिकांश मुस्लिम माहिलाओं व पुरुषो ने भी भाग लिया था । संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी सन 2000 में समान नागरिक व्यवस्था के लिये भारत सरकार को परामर्श दिया था। क्या यह राष्ट्रीय विकास के लिए अनिवार्य नहीं ? क्या “सबका साथ व सबका विकास ” के लिए एक समान कानून व्यवस्था बनें तो इसमें आपत्ति कैसी ?*

🚩 *विश्व में किसी भी देश में धर्म के आधार पर अलग अलग कानून नहीं होते सभी नागरिकों के लिए एक सामान व्यवस्था व कानून होते है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है जहां अल्पसंख्यक समुदायों के लिए पर्सनल लॉ बनें हुए है। जबकि हमारा संविधान अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, लिंग, क्षेत्र व भाषा आदि के आधार पर समाज में भेदभाव नहीं करता और एक समान व्यवस्था सुनिश्चित करता है। परंतु संविधान के अनुच्छेद 26 से लेकर 31 तक से कुछ ऐसे व्यवधान है जिससे हिंदुओं के सांस्कृतिक -शैक्षिक-धार्मिक संस्थानों व धार्मिक ट्रस्टो को विवाद की स्थिति में शासन द्वारा अधिग्रहण किया जाता आ रहा है । जबकि अल्पसंख्यकों के संस्थानों आदि में विवाद होने पर शासन कोई हस्तक्षेप नही करता….यह विशेषाधिकार क्यों ? इसके अतिरिक्त एक और विचित्र व्यवस्था संविधान में की गई कि अल्पसंख्यको को अपनी धार्मिक शिक्षाओं को पढ़ने की पूर्ण स्वतंत्रता रहेगी । जबकि संविधान सभा ने बहुसंख्यक हिन्दूओं के लिए यह धारणा मान ली कि वह तो अपनी धर्म शिक्षाओं को पढ़ाते ही रहेंगे। अतः हिन्दू धर्म शिक्षाओं को पढ़ाने को संविधान में लिखित रुप में प्रस्तुत नही किये जाने का दुष्परिणाम आज तक हिन्दुओं को भुगतना पड़ रहा है।*

🚩 *“राष्ट्र सर्वोपरि” की मान्यता मानने वाले सभी यह चाहते है कि एक समान व्यवस्था से राष्ट्र स्वस्थ व समृद्ध होगा और भविष्य में अनेक संभावित समस्याओं से बचा जा सकेगा। यह भी कहना उचित ही होगा कि भविष्य में असंतुलित जनसंख्या अनुपात के संकट से भी बचने के कारण राष्ट्र का धर्मनिरपेक्ष स्वरुप व लोकतांन्त्रिक व्यवस्था भी सुरक्षित रहेगी और जिहादियों का बढ़ता दुःसाहस भी कम होगा ।*

🚩 *अब सरकार का दायित्व है कि इसको लाने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति के साथ संविधान की मूल आत्मा व सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के आधार पर एक प्रारुप तैयार करके राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक परिचर्चा के माध्यम से इस कानून का निर्माण करवायें। निःसंदेह आज देश की एकता, अखंडता, सामाजिक व साम्प्रदायिक समरसता के लिए “समान नागरिक संहिता” को अपना कर विकास के रथ को गति देनी होगी।*

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विदेश के लोग आते है भारत अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने के लिए

17 सितंबर 2019
http://azaadbharat.org
🚩हिन्दू धर्म में एक अत्यंत सुरभित पुष्प है कृतज्ञता की भावना, जो कि बालक में अपने माता-पिता के प्रति स्पष्ट परिलक्षित होती है। हिन्दू धर्म का व्यक्ति अपने जीवित माता-पिता की सेवा तो करता ही है, उनके देहावसान के बाद भी उनके कल्याण की भावना करता है एवं उनके अधूरे शुभ कार्यों को पूर्ण करने का प्रयत्न करता है।

🚩‘श्राद्ध’ पितृऋण चुकाने के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है। श्राद्धविधि में किए जानेवाले मंत्रोच्चारण में पितरों को गति देने की सूक्ष्म शक्ति समाई हुई होती है। श्राद्ध में पितरों को तर्पण करने से वे संतुष्ट होते हैं। श्राद्धविधि करने से पितरों को मुक्ति मिलती है और हमारा जीवन भी सुसह्य हो जाता है।
🚩अपने पुर्वजों के लिए हिन्दू धर्म में किया जानेवाला ये विधी विदेशी लोगों को भी ज्ञात है और शायद यही कारण है कि, कई विदेशी लोग अपने पुर्वजों को मुक्ति दिलाने की यह विधि करने के लिए भारत आते है एवं पूरे श्रद्धा से यह विधि करते हैं । पिछले साल यह विधि करने के लिए रूस के नताशा सप्रबनोभआ, सरगे और एकत्रिना ने धर्मनगरी गया आकर अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया था।
🚩गया में पिंडदान किया रुसी नागरिकों ने:
इन लोगों ने ऐतिहासिक विष्णुपद मंदिर, फल्गु के देवघाट, प्रेतशिला और रामशिला वेदी पर पिंडदान किया और पूर्वजों के लिए स्वर्गलोक की कामना की। इन लोगों ने विष्णुपद मंदिर में पूजा अर्चना की। मीडिया से बात करते हुए इन लोगों ने कहा कि, सनातन धर्म के बारे में पढ़ा था जिसमें पिंडदान को काफी महत्वपूर्ण माना गया है और इस परंपरा को भारतीय वेशभूषा में संपन्न करने के बाद उनकी आकांक्षा आज पूरी हो गयी है !
🚩बता दें कि वर्ष 2017 में मोक्ष स्थली गया में पितरों की मुक्ति के महापर्व पितृपक्ष मेला के दौरान देवघाट पर अमेरिका, रूस, जर्मनी और स्पेन के 20 विदेशी नागरिकों ने अपने पितरों की मुक्ति की कामना को लेकर पिंडदान व तर्पण किया था। इनमें से एक जर्मनी की इवगेनिया ने कहा था कि, भारत धर्म और अध्यात्म की धरती है। गया आकर मुझे आंतरिक शांति की अनुभूति हो रही है। मैं यहां अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करने आई हूं।
🚩इन विदेशियों को हिन्दू धर्म के अनुसार आचरण करते देख, हिन्दू धर्म की महानता हमारे ध्यान में आती है। माता-पिता तथा अन्य निकट संबंधियों की मृत्युपरांत की यात्रा सुखमय एवं क्लेशरहित हो तथा उन्हें सद्गति मिले, इस हेतु किया जानेवाला संस्कार है ‘श्राद्ध’। श्राद्धविधि करने से पितरों की कष्ट से मुक्ति हो जाती है और हमारा जीवन भी सुसह्य हो जाता है। परंतु दुर्भाग्यवश आज हिन्दुआें को धर्म मे बताए गए एेसे विधी करना पिछडापन लगता है। उनके मॉडर्न जिवनशैली को श्राद्ध करने जैसी कृति अंधश्रद्धा लगती है।
🚩हिन्दू समाज की यह दु:स्थिती धर्मशिक्षा का महत्त्व दर्शाती है। आज हिन्दूआें को धर्मशिक्षा न मिलने के कारण ही उनका इस प्रकार अध:पतन हो रहा है। आज एैसी स्थिती है कि, विदेशों से आकर श्रद्धालु हिन्दू धर्म तथा अध्यात्म के बारे में जानकारी प्राप्त कर हिन्दू धर्म के अनुसार आचरण करने लगे है। वही हिन्दू धर्म के उगमस्थान तथा पुण्यभूमी भारतवर्ष के कर्इ हिन्दूआें को ही आज धर्माचरण करना पिछड़ेपन जैसे लगता है।
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🚩मृत्यु के बाद जीवात्मा को उत्तम, मध्यम एवं कनिष्ठ कर्मानुसार स्वर्ग नरक में स्थान मिलता है। पाप-पुण्य क्षीण होने पर वह पुनः मृत्युलोक (पृथ्वी) में आता है। स्वर्ग में जाना यह पितृयान मार्ग है एवं जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त होना यह देवयान मार्ग है।
🚩पितृयान मार्ग से जाने वाले जीव पितृलोक से होकर चन्द्रलोक में जाते हैं। चंद्रलोक में अमृतान्न का सेवन करके निर्वाह करते हैं। यह अमृतान्न कृष्ण पक्ष में चंद्र की कलाओं के साथ क्षीण होता रहता है। अतः कृष्ण पक्ष में वंशजों को उनके लिए आहार पहुँचाना चाहिए, इसीलिए श्राद्ध एवं पिण्डदान की व्यवस्था की गयी है। शास्त्रों में आता है कि अमावस के दिन तो पितृतर्पण अवश्य करना चाहिए।
*🚩भगवान श्रीरामचन्द्रजी भी श्राद्ध करते थे।
जिन्होंने हमें पाला-पोसा, बड़ा किया, पढ़ाया-लिखाया, हममें भक्ति, ज्ञान एवं धर्म के संस्कारों का सिंचन किया उनका श्रद्धापूर्वक स्मरण करके उन्हें तर्पण-श्राद्ध से प्रसन्न करने के दिन ही हैं श्राद्धपक्ष। इस दिनों में पितृऋण से मुक्त होने के लिए हमे श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।*
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