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Tuesday, December 1, 2020

भगवान विष्णु का मंदिर पाकिस्तान में 1300 साल पुराना मिला

 1 दिसंबर 2020


विश्व मे प्रथम धर्म एकमात्र सनातन धर्म ही था, जब ब्रह्माजी ने सृष्टि का उद्गम किया तब केवल सनातन धर्म ही था जिसको आज हिंदू धर्म के नाम से बोला जाता है।  2020 साल पुराने ईसाई मत और 1500 साल पुराने इस्लाम मजहब ने सनातन धर्म को तोड़ने के लिए अनेक प्रयत्न कियें लेकिन आज भी हिंदू धर्म के मदिरों के अवशेष मिल रहा है।




आपको बता दें कि पाकिस्तान और इटली के पुरातत्व विशेषज्ञों (Archaeological Experts) को खुदाई के दौरान उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान के स्वात शहर स्थित पहाड़ों के नज़दीक लगभग 1300 साल पुराना हिन्दू मंदिर मिला है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ पुरातत्वविदों को उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान के बारिकोट घुंडई में खुदाई के दौरान यह मंदिर मिला। खैबर पख्तूनखवा, पुरातात्विक विभाग के फज़ल खालिक ने बताया कि यह मंदिर भगवान विष्णु का है।

 विशेषज्ञों ने बताया कि संभावित तौर पर इस मंदिर का निर्माण ‘हिन्दू-शाही’ काल के दौरान लगभग 1300 साल पहले कराया गया था। हिन्दू-शाही साम्राज्य ने काबुल घाटी (पूर्वी अफगानिस्तान) और गंधार (आज का पाकिस्तान) तथा वर्तमान के उत्तर पश्चिमी भारत पर शासन किया था। अनुमानित तौर पर इन्होंने ही 850 से 1026 CE के बीच हिन्दू मंदिर का निर्माण कराया था।

खुदाई के दौरान पुरातत्वविदों को मंदिर के नज़दीक छावनी और पहरा देने वाले स्तंभ (वॉच टावर) के भी अवशेष मिले। इसके अलावा उन्हें खुदाई के स्थान से जलाशय (water tank) भी मिला, जिसका उपयोग हिन्दू समुदाय के लोग मंदिर जाने से पहले नहाने के लिए करते थे। खालिक ने यह भी बताया कि स्वात शहर हज़ारों साल पुराना पुरातात्विक स्थल है और इतने समय में पहली बार हिन्दू-शाही शासन काल के निशान मिले हैं। स्वात में अनेक बौद्ध मंदिर और पूजा के तमाम स्थल भी मौजूद हैं। इटालियन पुरातात्विक अभियान के मुखिया डॉक्टर लूका ने कहा कि स्वात शहर में गंधार सभ्यता के दौर का यह पहला मंदिर है।

हाल ही में खोजी गई बुद्ध प्रतिमा को कट्टरपंथियों ने तोड़ दिया था।

जुलाई 2020 में ही खोजी गई बुद्ध की प्रतिमा को स्थानीय श्रमिकों और मौलवी ने तोड़ कर टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे। पश्तून बाहुल्य खैबर पख्तूनखवा प्रांत के मर्दान शहर में एक घर की नींव की खुदाई के दौरान प्रतिमा के अवशेष बरामद हुए थे। इस घटना का वीडियो भी सामने आया था जिसमें मौलवी और श्रमिक बुद्ध की प्रतिमा को हथौड़े से खंडित करते हुए नज़र आ रहे थे। बौद्ध धर्म (जिसे वह इस्लाम विरोधी भी मानते हैं) के विरुद्ध अपना रोष जताते हुए मौके पर मौजूद सभी लोग बुद्ध की विशालकाय प्रतिमा को नष्ट करते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार स्थानीय मौलवी की तरफ से दिए गए आदेश के बाद बुद्ध की प्रतिमा के साथ तोड़फोड़ की गई थी और उसने प्रतिमा को इस्लाम विरोधी भी बताया था। मौलवी ने इस घटना के ठीक पहले कहा था, “अगर यह प्रतिमा नष्ट नहीं की जाती है तो तुम्हारे निकाह का वजूद समाप्त हो जाएगा और तुम अपने मज़हब के प्रति आस्तिक नहीं रह जाओगे।” इसके बाद ही लोगों ने बुद्ध की मूर्ति के साथ तोड़फोड़ की थी जो कि मिलने के वक्त अच्छी स्थिति में थी।

जुलाई 2020 में ही इस तरह की एक और घटना हुई थी, जिसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गिलगित बाल्टिस्तान स्थित चिलास क्षेत्र में बौद्ध शिला बरामद की गई थी। इस शिला को भी कट्टरपंथी इस्लामियों ने नष्ट करने का पूरा प्रयास किया था, उस पर पाकिस्तान का झंडा बना दिया था और नारे तक लिख दिए थे। मीडिया रिपोर्ट के के मुताबिक़ यह मामला सुर्ख़ियों में तब आया जब वहाँ के स्थानीय लोगों ने सोशल मीडिया पर इस घटना की तस्वीरें साझा की। जिस शिला पर कट्टरपंथियों ने इस्लामी नारे लिखे थे, लगभग 800 AD की थी।

आपको बता दें कि वियतनाम में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को एक संरक्षण परियोजना की खुदाई के दौरान 9वीं शताब्दी का शिवलिंग मिला है।

आपने जाना कि हिंदू वियतनाम में भी थे, वहाँ शिवलिंग मिलने पर कुछ हिंदू खुश भी होंगे लेकिन हिंदू केवल वियतनाम में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व मे फैले थे, हिंदू जाती मे बँटते गए और आज सिर्फ भारत में ही हैं और उसमे भी 8 राज्यों में तो अल्पसंख्यक बन चुके हैं। हरियाणा के मेवात में करीब 50 से अधिक गांव हिन्दू विहीन बन गए हैं, हिंदू साधु-संतों ही हत्या कर दी जा रही है अथवा जेल भेज दिया जाता है, हिंदू मंदिरों के पैसे चर्च, मस्जिद आदि अन्य जगह उपयोग किये जा रहे हैं। हिंदुनिष्ठ लोगो की हत्या की जा रही है, फिल्मों, मीडिया, वेब सीरीज आदि द्वारा हिंदुओ को गलत तरीके से दिखाया जा रहा है, भीम आर्मी वाले हिंदुओं को ही आपस में तोड़ रहे हैं अर्थात हिंदू बाहुल्य देश मे भी हिन्दू सुरक्षित नहीं हैं।

अभी भी जाति-पाती में बंटे रहें तो फिर कौन बचायेगा? इसलिए अभी भी समय है, एक हो जाइए और एकता के सूत्र में बंधकर भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करना चाहिए।

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Sunday, November 8, 2020

मद्रास हाईकोर्ट : मंदिर की जमीन का केवल धार्मिक कार्यों में उपयोग होना चाहिए

08 नवंबर 2020


वर्तमान में देश भर में 4 लाख से अधिक मंदिरों पर सरकारी कब्जा है। एक भी चर्च या मस्जिद पर नहीं। कम से कम 15 राज्य सरकारें उन लाखों मंदिरों पर नियंत्रण रखती हैं। मंदिरों के प्रशासक नियुक्त करती है। वे जैसे ठीक समझें व्यवस्था चलाते हैं। राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार अलग। इस बीच, जैसा सरकारी विभागों में प्रायः होता है, मंदिरों के कोष और संपत्ति के मनमाने उपयोग, दुरूपयोग के समाचार आते रहते हैं।




आपको बता दें कि मद्रास उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि राज्य सरकार धार्मिक कार्यों के अलावा किसी भी अन्य उद्देश्य के लिए मंदिर की भूमि का उपयोग नहीं कर सकती है। तमिलनाडु में दो मंदिरों की भूमि को अलग करने के संबंध में भक्तों द्वारा की गई शिकायतों का जवाब देते हुए मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि मंदिर की भूमि का उपयोग केवल मंदिर के लाभकारी उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।

उच्च न्यायालय ने यह भी माना कि तमिलनाडु में मंदिर न केवल प्राचीन संस्कृति की पहचान का स्रोत हैं बल्कि यह कला, विज्ञान और मूर्तिकला के क्षेत्र में प्रतिभा के गौरव और ज्ञान का प्रमाण भी है।

अदालत ने हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग को निर्देश दिया कि वह समय-समय पर रिपोर्ट दर्ज करने के लिए एक अधिकारी की नियुक्ति कर सभी मंदिर भूमि की पहचान और अतिक्रमणकारियों से उनकी सुरक्षा करे।

हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग तमिलनाडु सरकार के विभागों में से एक है जो राज्य के भीतर मंदिर प्रशासन के प्रबंधन और विनियमन के लिए जिम्मेदार है।

बता दें यह मामला नीलकंरई के पास श्री शक्ति मुथम्मन मंदिर और सलेम में कोट्टई मरियम्मन मंदिर की भूमि के अतिक्रमण से संबंधित है। अदालत ने मंदिर के भूमि के अतिक्रमण के खिलाफ भक्तों द्वारा दायर कई याचिकाओं के जवाब में अपने आदेशों की घोषणा की।

गौरतलब है कि यह याचिका राज्य के मत्स्य विभाग द्वारा श्री शक्ति मुथम्मन मंदिर से संबंधित कुछ भूमि पर एक आधुनिक मछली बाजार, मछली भोजनालय और कार्यालय भवन विकसित करने के बाद दायर की गई थी। विभाग ने भक्तों द्वारा की गई आपत्तियों की अवहेलना की थी।

इसी तरह, अरुलमिघु कोट्टई मरियम्मन थिरुकोइल से संबंधित कुछ जमीन बिना किसी लिखा पढ़ी के क्षेत्रीय परिवहन विभाग को हस्तांतरित कर दी गई। साथ ही पुल बनाने के लिए मंदिर की कुछ जमीनों को राजमार्ग विभाग ने भी अपने कब्जे में ले लिया था।

धार्मिक संस्थानों को ठीक से बनाए रखा जाना चाहिए : मद्रास HC

न्यायमूर्ति आर महादेवन ने अपने आदेश में निर्देश दिया कि धार्मिक संस्थानों, विशेष रूप से मंदिरों की संपत्तियों का रखरखाव ठीक से किया जाना चाहिए। अदालत ने तमिलनाडु सरकार को फटकार लगाते हुए कहा, एचआर एंड सीई डिपार्टमेंट, जो मंदिर की संपत्तियों का संरक्षक है, ने मंदिर की संपत्तियों का रखरखाव ठीक से नहीं किया, यह विषय इस विभाग के दायरे में आता है। इस तरह का रवैया बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

न्यायाधीशों ने मंदिर की भूमि से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया, उन्होंने मत्स्य विभाग को भी बुलाया, जिसने एचआर और सीई विभाग के साथ एक समझौते के तहत नीलकंरई के पास एक इमारत का निर्माण किया है, जिसके लिए किराया एकत्र किया जाएगा।

इसके अलावा न्यायमूर्ति आर महादेवन ने एचआर एंड सीई डिपार्टमेंट के आयुक्त को सभी अतिक्रमणों को वापस से हटाने और भूमि पुनः प्राप्त करने के लिए कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “एचआर और सीई विभाग भूमि की सुरक्षा के लिए एक दीवार लगाकर निर्माण शुरू करने के लिए कदम उठाएगा। मंदिर संबंधी उद्देश्यों को छोड़कर भूमि का उपयोग किसी अन्य उद्देश्य के लिए नहीं किया जाएगा। एचआर और सीई विभाग के कमिश्नर द्वारा प्राधिकृत अधिकारी मंदिरों और इसके गुणों के वित्तीय पहलुओं के संबंध में एक उचित रजिस्टर बनाए रखेगा और नियमित अंतराल पर संबंधित प्राधिकरण के समक्ष उसे दाखिल करेगा।”

किसी चर्च अथवा मस्जिद को सरकार कभी नहीं छूती। क्या इस से बड़ा धार्मिक अन्याय और संविधान में मौजूद ‘नागरिक समानता’ का मजाक संभव है? जो दलीलें हिन्दू मंदिरों पर सरकारी कब्जा रखने के पक्ष में दी जाती हैं, वह सब मस्जिदों, चर्चों पर भी लागू हैं। किन्तु केवल हिन्दू मंदिरों पर कब्जा है, शेष सभी समुदाय अपने-अपने धर्म-स्थान स्वयं चलाने के लिए पूर्ण स्वतंत्र हैं। हिंदू मंदिरों को भी सरकारी नियंत्रण मुक्त करना चाहिए ऐसी जनता की मांग हैं।

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Tuesday, October 20, 2020

मंदिरों पर राजकीय कब्जा क्यों? हिन्दू आज भी जजिया भर रहे हैं (भाग-2)

 

20 अक्टूबर 2020

 
पारंपरिक भारत में किसी हिन्दू राजा ने मंदिरों पर अपना अधिकार, या नियंत्रण नहीं जताया था, न कभी टैक्स वसूला था। भारतीय परंपरा में राजा को धर्म या धार्मिक कार्यों में हस्तक्षेप करने का कभी कोई उदाहरण नहीं मिलता। वें तो सहायता व दान देते थे, न कि लेते थे जो स्वतंत्र भारत की राजसत्ता कर रही है। यह जबरदस्ती मुगल काल के अवशेष हैं जब मंदिरों को तरह-तरह के राजकीय अत्याचार या नियंत्रण को झेलना पड़ता था। फिर अंग्रेज शासकों ने 1817 ई. में उसी तरह के कुछ नियंत्रण बनाए। उस का लाभ क्रिश्चियन मिशनरियों ने उठाया, जिन की धर्मांतरण योजनाओं को मंदिरों को कमजोर करने से कुछ मदद मिली। हालाँकि बाद में, 1863 ई. तक यहाँ अंग्रेज शासकों ने कई मंदिर हिन्दू न्यासियों को वापस भी सौंप दिए। क्योंकि उसे कुछ कारणों से इंग्लैंड में पसंद नहीं किया गया।




लेकिन फिर 1925 ई. में अंग्रेज शासकों ने भारत में धार्मिक संस्थानों पर नियंत्रण करने का कानून बनाया। लेकिन क्रिश्चियनों और मुसलमानों द्वारा तीव्र विरोध के कारण 1927 ई. में वह कानून संशोधित किया गया, और उन्हें उस कानून से छूट दे दी गई। इस प्रकार, केवल हिन्दू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण रखने का कानून रहा। प्रायः दक्षिण भारत में, क्योंकि विशाल, समृद्ध, संपन्न मंदिर वहीं थे। उत्तर भारत तो पिछले इस्लामी शासकों की बदौलत लगभग मंदिर-विहीन हो चुका था। यह भी ध्यातव्य है कि ‘फूट डालो, राज करो’ की नीति का उपाय करते हुए जहाँ 1925 ई. में हिन्दुओं को मंदिरों के संचालन से वंचित किया गया, सिखों को विशेष शक्ति-संपन्न बनाया गया। उसी साल अंग्रेजों ने सिख गुरुद्वारा एक्ट बनाकर गुरुद्वारों का संचालन एक विशेष समूह को सौंप दिया। यह बहुत बड़ा निर्णय साबित हुआ, जिस से सिखों के एक पंथ को विशिष्ट, एकाधिकारी शक्ति प्राप्त हो गई। उस से पहले गुरुद्वारे तरह-तरह के पंथों द्वारा चलते थे।

फिर, 1935 ई. में एक और कानून बनाकर अंग्रेज सरकार ने किसी भी मंदिर को चुन कर अपने नियंत्रण में लेने का प्रावधान किया। इस तरह, अंग्रेजों ने अपने-अपने धर्म-संस्थान संचालन के लिए क्रिश्चियनों-मुसलमानों, हिन्दुओं, और सिखों के लिए तीन तरह के कानून बना दिए। ताकि अपने हितों के लिए वे सहज ही अलग-अलग महसूस करें। दुर्भाग्यवश, स्वतंत्र भारत की देशी सरकार ने भी शुरू में ही (1951 ई.) हिन्दू धार्मिक संस्थानों को अपने नियंत्रण में रख सकने का कानून बनाया। उद्देश्य यह बताया गया ताकि उस की ‘सुचारू व्यवस्था’ की जा सके। यह किसी ने नहीं पूछा कि वही व्यवस्था मस्जिद या चर्च की होनी क्यों अनावश्यक है? यह व्यवस्था कैसी रही है, यह इसी से समझा जा सकता है कि 1986-2005 ई. के बीच बीस वर्षों में तमिलनाडु में मंदिरों की हजारों एकड़ जमीन ‘चली’ गई। अन्य हजारों एकड़ पर भी अवैध अतिक्रमण हो चुका है! यह सरकारी कब्जे की सुचाऱू व्यवस्था का एक नमूना है।

दूसरा नमूना यह कि अनेक मंदिरों से अनेकानेक बहुमूल्य मूर्तियाँ चोरी होती रही हैं, जो अनमोल होने के साथ-साथ देश की सांस्कृतिक विरासत भी है। किन्तु आज तक किसी को उस का जिम्मेदार नहीं ठहराया गया। किसी भी गैर-सरकारी नियंत्रण में ऐसा होना असंभव है कि इतनी बड़ी चोरियों पर किसी की जिम्मेदारी न बने। न किसी को दंड मिले! तीसरे, कई प्रतिष्ठित मंदिरों की पारंपरिक पुरोहित व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई है। सरकारी अमलों ने उस की परवाह नहीं की, या उस में हस्तक्षेप कर जाने-अनजाने बिगाड़ा। कई मामलों की तरह कांग्रेस के ‘स्यूडो सेक्यूलरिज्म’ और भाजपा के ‘रीयल सेक्यूलरिज्म’ में इस बिन्दु पर भी कोई अंतर नहीं है। राजस्थान में भाजपा राज में मंदिरों की कुछ संपत्ति पर भी कब्जा किया गया था। हरियाणा में भी समाचार हैं कि हिसार जिले के दो महत्वपूर्ण मंदिरों को कब्जे में लेने पर सत्ताधारी सोच रहे हैं।

आश्चर्य की बात यह भी है कि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में एटॉर्नी जेनरल वेणुगोपाल ने भी कहा था कि मंदिरों के संचालन में राज्य का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। उन्होंने संकेत किया कि एक पंथ-निरपेक्ष राज्य प्रणाली में सरकार द्वारा मंदिरों पर नियंत्रण रखना उपयुक्त नहीं है। यह सब कहे जाने के बाद से साल भर से भी ज्यादा बीत चुका। मगर चूँकि मामला हिन्दू धर्म-समाज का है, इसीलिए इस पर हर प्रकार के सत्ताधारियों की उदासीनता एक सी है। कोर्ट में पिटीशन या कार्यपालिका को निवेदन, सब ठंडे बस्ते में पड़े रहते हैं।

प्रश्न हैः भारतीय राज्यसत्ता हिन्दुओं को अपने मंदिरों, धार्मिक संस्थाओं के संचालन करने के अधिकार से जब चाहे क्यों वंचित करती है? जबकि मुस्लिमों, ईसाइयों की संस्थाओं पर कभी हाथ नहीं डालती। यह हिन्दू-विरोधी धार्मिक भेद-भाव नहीं तो और क्या है? केरल से लेकर तिरूपति, काशी, बोधगया और जम्मू तक, संपूर्ण भारत के अधिकांश प्रसिद्ध हिन्दू मंदिरों पर राजकीय कब्जा कर लिया गया है। इन में हिन्दू जनता द्वारा चढ़ाए गए सालाना अरबों रूपयों का मनमाना उपयोग किया जाता है।

जिस प्रकार, चर्च, मस्जिद और दरगाह अपनी आय का अपने-अपने धार्मिक विश्वास और समुदाय को आगे बढ़ाने के लिए उपयोग करते हैं – वह अधिकार हिन्दुओं से छिना हुआ है! कई मंदिरों की आय दूसरे धर्म-समुदायों के क्रियाकलापों को बढ़ावा देने के लिए उपयोग की जाती है। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक से हिन्दू मंदिरों की आय से मुसलमानों की हज सब्सिडी देने की बात कई बार जाहिर हुई है।

यह किस प्रकार का सेक्यूलरिज्म है? यह तो स्थाई रूप से हिन्दू-विरोधी धार्मिक भेद-भाव है, जो सहज न्याय के अलावा भारतीय संविधान के भी विरुद्ध है। सामान्य मानवीय समानता के विरुद्ध तो है ही। यह अन्याय राजसत्ता के बल से हिन्दू जनता पर थोपा गया है। इस पर कोई राजनीतिक दल आवाज नहीं उठाता।

कुछ लोग तर्क करते हैं कि हिन्दू मंदिरों, धार्मिक न्यासों पर राजकीय नियंत्रण संविधान-सम्मत है। संविधान की धारा 31A के अंतर्गत धार्मिक संस्थाओं, न्यासों की संपत्ति का अधिग्रहण हो सकता है। काशी विश्वनाथ मंदिर के श्री आदिविश्वेश्वर बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (1997) के निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “किसी मंदिर के प्रबंध का अधिकार किसी रिलीजन का अभिन्न अंग नहीं है।” अतः यदि हमारे देश में राज्य ने अनेकानेक मंदिरों का अधिग्रहण कर उस का संचालन अपने हाथ में ले लिया, तो यह ठीक ही है।

वस्तुतः आपत्ति की बात यह है कि संविधान की धारा 31(ए) का प्रयोग केवल हिन्दू मंदिरों, न्यासों पर हुआ है। किसी चर्च, मस्जिद या दरगाह की संपत्तियाँ कितने भी घोटाले, विवाद, हिंसा या गड़बड़ी की शिकार हों, उन पर राज्याधिकारी हाथ नहीं डालते। जबकि संविधान की धारा 26 से लेकर 31 तक, कहीं किसी रिलीजन का नाम लेकर छूट या विशेषाधिकार नहीं दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों में भी ‘किसी धार्मिक संस्था’ या ‘ए रिलीजन’ की बात की गई है। मगर व्यवहारतः केवल हिन्दू मंदिरों, न्यासों पर राज्य की वक्र-दृष्टि उठती रही है। चाहे बहाना सही-गलत कुछ हो।

इस प्रकार, स्वतंत्र भारत में केवल हिन्दू समुदाय है जिसे अपने धार्मिक-शैक्षिक-सांस्कृतिक संस्थान चलाने का वह अधिकार नहीं, जो अन्य को है। यह अन्याय हिन्दू समुदाय को अपने धर्म और धार्मिक संस्थाओं का, अपने धन से अपने धार्मिक कार्यों, विश्वासों का प्रचार-प्रसार करने से वंचित करता है। उलटे, हिन्दुओं द्वारा श्रद्धापूर्वक चढ़ाए गए धन का हिन्दू धर्म के शत्रु मतवादों को मदद करने में दुरुपयोग करता है। यह हमारी राज्यसत्ता द्वारा और न्यायपालिका के सहयोग से होता रहा है – इस अन्याय को कौन खत्म करेगा? (जारी...) - डॉ. शंकर शरण

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Sunday, September 6, 2020

श्रीकृष्ण के मंदिर में पाकिस्तान ने गिराए थे 156 बम, कर न सकें बाल भी बांका।

06 सितंबर 2020


भारत का गौरवशाली इतिहास तो हमें पढ़ाया ही नहीं जाता है बस केवल मुग़लों और अंग्रेजों के इतिहास पढ़ाकर भारतवासियों का ब्रेनवॉश किया जा रहा है। गलत इतिहास पढ़ाने के कारण आज आईपीएस और आईएएस जैसे बुद्धिमान अधिकारी भी उसको ही सच मानने लगते हैं पर भारत का गौरवशाली इतिहास भूल गए। हमारा भारत सोने की चिड़िया था, आज के वैज्ञानिक जो खोज कर रहे हैं वो हमारे ऋषि मुनि पहले से ही कर चुके हैं।




भारत के राजा विक्रमादित्य का राज अरब देश तक फैला था और उसके पहले भी ऐसे कई राजा थे जिनका पूरी दुनिया में राज था, उनको एकछत्र सम्राट बोलते थे और सनातन धर्म जब से सृष्टि का उद्गम हुआ तब से है यह सब बाते हमें नही पढ़ाई जा रही हैं जिसके कारण हम लोग वास्तविक इतिहास नहीं जानते हैं जिसके कारण अंग्रेजों और मुग़लो को महान समझने लगते हैं।

एक आपको ऐसा इतिहास बता रहे हैं जिसमे पाकिस्तान की सारी हेकड़ी निकल गई थी।

आपको बता दें कि पश्चिम भारत के महत्वपूर्ण तीर्थस्थल और चार धामों में से एक द्वारकाधीश (गुजरात) मंदिर पर 7 सितंबर, 1965 को पाकिस्तान की नेवी ने जमकर बम बरसाए थे। मंदिर पर 156 बम फेंके गए थे, लेकिन फिर भी ये बम मंदिर का बाल-बांका न कर सकें। मंदिर पर 156 बम फेंके जाने की बात खुद पाकिस्तान के रेडियो में प्रसारित की गई थी। रेडियो में पाक नेवी के सैनिकों ने हर्षोल्लास के साथ कहा था... ‘मिशन द्वारका कामयाब, हमने द्वारका का नाश कर दिया। हमने कुछ ही मिनटों के अंदर मंदिर पर 156 बम फेंक कर मंदिर को तबाह कर दिया’। हालांकि यह पाक नैवी की गलतफहमी मात्र थी। दरअसल, जब नैवी ने सब-मरीन से मंदिर पर बम बरसाने शुरू किए, उस समय भगवान श्री कृष्ण की कृपा से समुद्र किनारे विशाल पत्थरों की ओट थी। हमले के समय ओट और ऊंची हो चुकी थी, जिसके चलते बम मंदिर तक पहुंच ही नहीं सकें और पानी में डिफ्यूज हो गए थे।

बंटवारे के बाद सन् 1965 में भारत-पाक के बीच हुआ यह दूसरा युद्ध था। इस जंग में पाकिस्तान ने तीनों मोर्चों पर जंग लड़ी थी, जिसमें तीनों जगह उसे मुंह की खानी पड़ी थी। द्वारका मंदिर पर हमला कमोडोर एस एम अनवर के नेतृत्व में पाकिस्तानी नेवी के एक बेड़े ने किया था।

इस युद्ध में पाकिस्तानी सेना ने भारतीय एयरबेस पर घुसपैठ और इन्हें तबाह करने के लिए कई गोपनीय ऑपरेशन भी चलाए थे। 7 सितंबर 1965 को स्पेशल सर्विसेज ग्रुप के कमांडो पैराशूट के जरिए भारतीय इलाकों में भी घुस आए थे। पाकिस्तानी आर्मी के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल मुहम्मद मुसा के मुताबिक करीब 135 कमांडो भारत के तीन एयरबेस (हलवारा, पठानकोट और आदमपुर) पर उतारे गए। हालांकि पाकिस्तानी सेना को इस दुस्साहस की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी और उसके केवल 22 कमांडो ही अपने देश लौट सके थे। 93 पाकिस्तानी सैनिकों को बंदी बना लिया गया। इनमें एक ऑपरेशन के कमांडर मेजर खालिद बट्ट भी शामिल थे।

ऐसे कई मंदिरों का इतिहास था कि मुगल नष्ट नहीं कर सकें थे और मुग़लो व अंग्रेजो ने भारत को 2000 साल तक गुलाम रखा, मार काट की, धर्मपरिवर्तन करवाया, बंटवारा करवाया, संपत्ति लूटकर ले गए फिर भी पूरे विश्व में सबसे ज्यादा सुख शांति भारत में है और आज भी सनातन धर्म व भारतीय संस्कृति जगमगा रही है यही असली भारत की पहचान है।

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Sunday, August 23, 2020

राम जन्मभूमि मुक्ति संघर्ष से सबक लेना चाहिए कि आखिर मंदिरों का विध्वंस क्यों होता रहा ?

23 अगस्त 2020


अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के शुभारंभ का उत्सव मनाते हुए हमें यह भी विचार करना चाहिए कि आखिर मंदिरों का विध्वंस क्यों होता रहा? सही उत्तर पाए बिना मंदिरों की सुरक्षा संदिग्ध बनी रहेगी। आज भी पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नाइजीरिया आदि देशों में मंदिरों, चर्चों के विध्वंस की घटनाएं घट रही हैं। पाकिस्तानी क्षेत्र में 1947 के बाद से सैकड़ों मंदिरों का विध्वंस हुआ।



कश्मीर में असंख्य मंदिर तोड़े गए, मंदिरों का विध्वंस कम्युनिज्म ने भी बड़े पैमाने पर किया।

बीते कुछ दशकों में कश्मीर में भी असंख्य मंदिर तोड़े गए। यह सब एक ही समस्या की विभिन्न अभिव्यक्तियां हैं। नोट करें कि चर्चों, मंदिरों का ध्वंस कम्युनिज्म ने भी बड़े पैमाने पर किया। चीन और तिब्बत में हजारों बौद्ध मठ-मंदिरों को तोड़ा गया। स्टालिन युग में रूस और पूर्वी यूरोप में असंख्य चर्चों को ध्वस्त कर वहां स्वीमिंग पूल आदि बना डाले गए थे। इसका कारण मतवादी दुराग्रह ही था। इसीलिए कम्युनिज्म के खात्मे पर उन्हीं स्थानों पर फिर चर्च बनाए गए।

इस्लामी हमलावरों ने जो काम सदियों पहले किया वही तालिबान, आइएस कर रहे हैं।

इस्लामी हमलावरों द्वारा भी दुनिया भर में चर्च, मंदिर आदि तोड़ने का कारण उनका यह मतवाद है कि इस्लाम के सिवा किसी मत को रहने नहीं देना है। इसीलिए गजनवी औरंगजेब जैसे तमाम हमलावरों एवं शासकों ने जो सदियों पहले किया वही तालिबान, जैसे मुहम्मद, आइएस आदि अभी भी कर रहे हैं। इसके पीछे मतांधता ही है। इसकी अनदेखी करने के दुष्परिणामों का अनुमान कठिन नहीं है। अभी तुर्की में इसी की झलक मिली।

ओटोमन सुल्तान मुहम्मद ने 1453 में हागिया सोफिया चर्च को जबरन मस्जिद में बदला।

चूंकि ईसाई देशों ने हागिया सोफिया को पुन: चर्च बनाने की फिक्र न की इसलिए उसे फिर मस्जिद में बदल डाला गया। इस्लाम के जन्म से भी पहले बना यह चर्च लगभग एक हजार साल तक विश्व का महत्वपूर्ण चर्च था। ओटोमन सुल्तान मुहम्मद ने 1453 में हागिया सोफिया को जबरन मस्जिद में बदला। महान तुर्क नेता मुस्तफा कमाल पाशा ने इस्लामी खलीफत खत्म करने के बाद 1935 में उसे संग्रहालय बना दिया। उसी को अभी फिर मस्जिद कर दिया गया। विस्मरण और स्मरण समानता से हो तभी विश्व में विभिन्न धर्मावलंबी साथ रह सकते हैं। किसी मतवाद को विशेषाधिकार देने पर ऐसे विध्वंस रुकने के बजाय बढ़ेंगे। यही समस्या की मूल गुत्थी है। इसे न छूने से ही भारत में मंदिरों की मुक्ति का प्रश्न लटका रह गया।

गांधी जी ने इस्लामी मतवाद पर चुप रहने की घातक परंपरा बनाई। इसलिए उसके कार्यों को रोकना कठिन हो गया। रूस में तोड़े गए चर्चों की पुर्नस्थापना इसीलिए हुई कि उससे पहले कम्युनिस्ट मतवाद पर प्रश्न उठाकर उसे पराजित किया गया। तुर्की में पाशा ने भी खलीफत, शरीयत खत्म करके ही हागिया सोफिया को संग्रहालय बनाया। इसलिए अन्य हिंदू मंदिरों की मुक्ति मुस्लिमों को राष्ट्रवाद या हिंदू भावनाओं को आदर देने जैसी बातों से नहीं हो सकती। ऐसी बचकानी दलीलें सदैव निष्प्रभावी रहेंगी।

वैश्विक साम्राज्य की चाह रखने वाले मतवादों को बचकानेपन से नहीं झुकाया जा सकता।

विश्व इतिहास से समझना चाहिए कि वैश्विक साम्राज्य की चाह रखने वाले मतवादों को बचकानेपन से नहीं झुकाया जा सकता। मानवीय समानता का यह नियम सामने रखना होगा कि दूसरों के विरुद्ध वह काम न करो जो तुम अपने विरुद्ध दूसरों से नहीं चाहते। इस समानता और सत्यनिष्ठा में ही उपाय है। राजनीतिक इस्लाम के एकमात्र सत्य होने के दावे को कसौटी पर कसकर उसकी असलियत दिखानी होगी।

अगर इस्लामी दावा असत्य है तो मुसलमानों को भी उसे छोड़कर सत्य अपनाना चाहिए।

अगर इस्लामी दावा और विशेषत: उसका मूल राजनीतिक भाग असत्य है तो मुसलमानों को भी उसे छोड़कर सत्य अपनाना चाहिए। यही समान और सत्यनिष्ठ समाधान है। आज नहीं तो कल बहस इसी पर आएगी। इस्लामी संगठन तो सदैव अपने बिंदु पर टिके रहे हैं। आश्चर्यजनक रूप से दूसरे ही इससे बचते हैं। मुस्लिम ब्रदरहुड, इस्लामिक स्टेट, तालिबानी, तब्लीगी आदि तमाम संगठन, शासक और उलेमा इस्लाम की सत्यता के दावे पर ही अपने सारे काम करते हैं। उनकी मार झेलने वाले उस दावे को चुनौती देना छोड़ बाकी सब कुछ करते रहे।

रामजन्मभूमि मंदिर: मुस्लिम पक्ष बार-बार पैंतरा बदलता रहा, हिंदुओं को स्थान न देने पर अड़ा रहा।

युद्ध, बमबारी, उदारतापूर्वक धन देना, अपीलें करना आदि, मगर जिस एक टेक पर राजनीतिक इस्लाम खड़ा है उसे खारिज नहीं करते। तब समाधान हो तो कैसे? हमें रामजन्मभूमि मंदिर के मुक्ति संघर्ष से शिक्षा लेनी चाहिए। मुस्लिम पक्ष बार-बार पैंतरा बदलता रहा, लेकिन हिंदुओं को वह स्थान न देने पर अड़ा रहा, जबकि उसका मुसलमानों के लिए कोई महत्व न था। इसकी तुलना में हिंदुओं के लिए रामजन्मभूमि और अयोध्या सदियों से पवित्र महान तीर्थों में अग्रगण्य है। इसे कुछ कथित सेक्युलर, लिबरल स्वीकार करने से अभी भी बच रहे हैं।

असल लड़ाई संपत्ति की नहीं, वरन साम्राज्यवादी मतवाद बनाम सत्य की है।

अनुभव बताता है कि अन्य हिंदू श्रद्धास्थलों की मुक्ति के लिए फिर वैसा अभियान चलाने के बजाय मूल बिंदु पर आना होगा। असल लड़ाई संपत्ति की नहीं, वरन साम्राज्यवादी मतवाद बनाम सत्य की है। समस्या यह नहीं कि कुछ मुसलमान दूसरों के तीर्थों पर कब्जा रखना चाहते हैं। समस्या वह मतवादी विश्वास है जो उन्हें इसके लिए प्रेरित करता है। जब तमाम इस्लामी संगठन दूसरों को मुसलमान बनाना अपना अधिकार समझते हैं तो उन्हें अधर्म से हटाकर सन्मार्ग पर लाना दूसरों का अधिकार है। इस्लाम को एकमात्र सत्य कहने का उत्तर उसे असत्य साबित करना है। मुसलमानों को राजनीतिक इस्लाम की गलती दिखाना एक शांतिपूर्ण कार्य है। कमाल पाशा ने ठीक यही किया था। उन्होंने इस्लामी मतवाद को पुराना एवं मृत कहकर तुर्की से निकाल बाहर किया था। यह प्रक्रिया अभी भी चल रही है।

वैचारिक चुनौती से ही चर्च की और कम्युनिज्म की तानाशाही पराजित हुई।

दुनिया भर में इस्लाम छोड़ने वाले मुसलमान यानी मुलहिद बढ़ रहे हैं। यह कम्युनिस्ट मतवाद और चर्च मतवाद के साथ पहले हो चुका है। वैचारिक चुनौती से ही मध्ययुग में चर्च की और हाल में कम्युनिज्म की तानाशाही पराजित हुई। कोई युद्ध नहीं हुआ। इस्लामी मतवाद के साथ यह और आसान है, क्योंकि आधुनिक सूचना संसाधनों के युग में सत्य-असत्य की परख करना सबके हाथ में हैं।

दुनिया में मुस्लिम आबादी का बाह्य विस्तार भले हो रहा हो, किंतु भीतर से सांस्कृतिक रिक्तता बढ़ रही है।

अब इस्लाम और शेष विश्व के इतिहास, दर्शन, साहित्य में योगदान को कोई मुस्लिम स्वयं परख सकता है। दुनिया में मुस्लिम आबादी, संस्थानों का बाह्य विस्तार भले हो रहा हो, किंतु भीतर से सांस्कृतिक रिक्तता बढ़ रही है। इमामों, अयातुल्लाओं की सेंसरशिप इंटरनेट ने बेकार कर दी है। विश्व के महान विद्वानों ने इस्लाम की समीक्षाएं की हैं। उनमें मुस्लिम भी हैं। अब वह इंटरनेट की बदौलत सुदूर गांवों तक सहज उपलब्ध है। उसे जानना और मुस्लिमों को जानने के लिए कहना चाहिए। अभी तक ऐसा न करने से ही कट्टरपंथियों ने मुसलमानों को अपनी मुट्ठी में कैद रखा है। यह कैद टूटनी चाहिए। - लेखक राजनीतिशास्त्र प्रोफेसर शंकर शरण

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Friday, May 1, 2020

तमिलनाडु सरकार का आदेश : मस्जिदों को 5450 टन फ्री चावल, मंदिर दे 10 करोड़ !

01 मई 2020

🚩हिंदुओं के मंदिर और उनकी सम्पदाओं को नियंत्रित करने के उद्देश से सन 1951 में एक कायदा बना – “The Hindu Religious and Charitable Endowment Act 1951” इस कायदे के अंतर्गत राज्य सरकारों को मंदिरों की मालमत्ता का पूर्ण नियंत्रण प्राप्त है, जिसके अंतर्गत वे मंदिरों की जमीन, धन आदि मुल्यमान सामग्री को कभी भी कैसे भी बेच सकते हैं और जैसे भी चाहे उसका उपयोग कर सकते हैं। मंदिरों के पैसे से सरकारे हिंदुओं का ही दमन कर रही हैं।

🚩तमिलनाडु सरकार ने 47 मंदिरों को CM राहत कोष में 10 करोड़ रुपए देने का आदेश दिया है। इसके विपरीत राज्य सरकार ने 16 अप्रैल को रमजान के महीने में प्रदेश की 2,895 मस्जिदों को 5,450 टन मुफ्त चावल वितर‌ित करने आदेश दिया था, ताकि रोजेदारों को परेशानी ना हो। वास्तव में मदिरों को ऐसा आदेश देने के पीछे तमिलनाडु सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति जिम्मेदार है।
ऐसे समय में, जब मंदिर प्रशासन को सरकार के चंगुल से मुक्त कराने के लिए संघर्ष तेज हो रहा है, तमिलनाडु सरकार के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग (HR and CE) ने 47 मंदिरों को गरीबों की देखभाल करने के लिए निर्धारित राशि के अलावा CM राहत कोष में 10 करोड़ रुपए अतिरिक्त देने का निर्देश दिया है।

🚩भाजपा ने लगाईं मंदिरों में भोजन करवाने की स्वीकृति की गुहार

🚩भाजपा की तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष एल मुरुगन ने शनिवार को अन्नाद्रमुक सरकार से गरीबों और साधुओं को भोजन कराने के लिए राज्य में हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के रखरखाव वाले मंदिरों में अन्नदान (भूखों को भोजन परोसना) फिर से शुरू करने का आग्रह किया। मुरुगन ने कहा कि सरकार ने मुस्लिम समुदाय के लोगों की दलीलों का सम्मान किया है और रमज़ान के खाने के लिए मुफ्त चावल आवंटित किया है। तमिलनाडु सरकार के इस निर्देश की आलोचना की मुख्य वजह यह भी है कि इस प्रकार का निर्देश इसाई और मुस्लिम संस्थानों को नहीं दिया गया है, जिन्हें सालाना सरकारी अनुदान प्राप्त होते रहते हैं। इससे पहले मद्रास हाईकोर्ट ने रमजान के महीने में मस्जिदों में मुफ्त चावल वित‌रित करने के तमिलनाडु सरकार के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया था। इसके लिए पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के उस बयान को नजीर बनाया जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि सरकार किसी भी समुदाय को तीर्थयात्रा के लिए मदद देने के विचार के ‌विरोध में नहीं है। उदाहरण के लिए सरकार द्वारा कुंभ का खर्च वहन करने और भारतीय नागरिकों को मानसरोवर तीर्थ यात्रा में मदद का जिक्र किया था। हालाँकि पीठ ने यह जिक्र नहीं किया कि कोरोना के दौरान बंद मंदिर ऐसी स्थिति में सरकार के फैसले का क्या करें?

HR और CE के नियंत्रण में हैं राज्य के 47 मंदिर

🚩HR और CE के प्रधान सचिव के पनिंद्र रेड्डी ने मदुरै, पलानी, थिरुचेंदुर, तिरुतनी, तिरुवन्नमलई, रामेश्वरम, मयलापुर सहित 47 मंदिरों में उनके अधीन काम करने वाले सभी अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे लॉकडाउन के कारण गरीबों को भोजन खिलाने की दिशा में सरप्लस फंड से 35 लाख रुपए का योगदान दें। अन्य मंदिरों को 15 लाख रुपए से 25 लाख रूपए तक की राशि देने के लिए निर्देशित किया गया है। सभी 47 मंदिरों को दस करोड़ के अधिशेष कोष को सीएम कोरोना रिलीफ फंड में स्थानांतरित करना है। उल्लेखनीय है कि HR और CE तमिलनाडु में 36,612 मंदिरों का प्रबंधन करते हैं। ये संपन्न मंदिर अपने अधिशेष कोष से संरक्षण/ नवीकरण/बहाली करते हैं। लाखों पुजारी पूर्ण रूप से श्रद्दालुओं के दान पर निर्भर रहते हैं। कोरोना महामारी और देशव्यापी बंद के कारण अब वे असहाय हो चुके हैं और भुखमरी का सामना कर रहे हैं। इस पर तमिलनाडु राज्य सरकार ने उनकी मदद करने के बजाए अपनी तुष्टिकरण की राजनीति को साधने के लिए हिंदू मंदिरों की संपत्ति को निशाना बनाया है।

🚩मुस्लिमों में रमजान के पर्व की शुरुआत में ही, तमिलनाडु राज्य सरकार ने मुसलमानों को एक बड़ा लाभ देने की घोषणा की थी। दिवंगत सीएम जयललिता ने मुस्लिमों के दिलों और वोटों को जीतने के लिए इसे शुरू किया था। तमिलनाडु सरकार ने घोषणा की थी कि इस साल दलिया तैयार करने के लिए 2,895 मस्जिदों को 5,450 टन चावल दिया जाएगा, जो कि साधारण गणना के अनुसार 2,1,80,00,000 रुपए निकल आती है।

मुस्लिमों की तरह हिन्दुओं को नहीं मिलता है त्योहारों में कुछ भी

🚩जबकि इसी प्रकार की कोई मदद या योजना चित्रा और अनादि महीनों के दौरान हिंदुओं के ग्राम देवताओं को प्रसाद तैयार करने के लिए नहीं दी जाती हैं। सभी लोग इस बात को जानते हैं कि लॉकडाउन के कारण मंदिरों में उत्सव रद्द कर दिए गए हैं लेकिन ऐसा लगता है कि हिंदू मंदिर के पैसे की कीमत पर मुसलमानों का तुष्टिकरण सरकार के लिए महत्वपूर्ण है। वर्तमान तमिलनाडु सरकार की नीति से लगता है कि वह हिंदू मंदिरों को पूरी तरह से निचोड़ने का प्रयत्न कर रही है। तमिलनाडु सरकार हिंदुओं के मंदिरों से हंडी संग्रह, प्रसाद, विभिन्न दर्शन टिकट, विशेष कार्यक्रम शुल्क, आदि के माध्यम से प्रतिवर्ष 3000 करोड़ रुपए से अधिक वसूल करती है, जबकि केवल 4-6 करोड़ रुपए रखरखाव के लिए दिए जाते हैं। बाकी 2,995 करोड़ रुपए सरकार के पास रहते हैं।

🚩वहीं, श्रीविल्लिपुथुर वैष्णवित मठ प्रमुख सदगोपा रामानुज जियार ने तमिलनाडु सरकार से मंदिर के पैसे को पुजारी और सेवकों को देने के लिए खर्च करने का आग्रह किया है। पुथिया तमीजगम के प्रमुख डॉ. कृष्णस्वामी ने सीएम से मंदिरों से प्राप्त 10 करोड़ रुपए की राशि वापस करने की अपील की है।

🚩केंद्र सरकार को चाहिए कि इसमे बदलाव करें, मंदिरों के पैसे किसी भी धर्म को नही देने चाहिए और राज्य सरकार का नियंत्रण उसपर से हट जाना चाहिए।

🚩राज्य सरकार को चाहिए की मंदिरों के पैसे का उपयोग सिर्फ हिंदू संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए ही करना चाहिए जैसे कि वैदिक गुरुकुल, आर्युवेदिक हॉस्पिटल, मंदिर निर्माण, हिंदू धर्म ग्रँथ, मीडिया में हिंदू धर्म के प्रचार प्रसार, गरीब हिंदुओं की सहायता, अन्नक्षेत्र, साधु-संतों को पगार आदि के लिए उपयोग करना चाहिए अगर ऐसा नही कर सकते है तो सरकार को अपना नियंत्रण हटा देना चाहिए खुद हिंदू अपने मंदिर संभाल लेंगे।

🚩हिंदू भी जिस मंदिर में अपना दान देते हैं उनके संचालकों से हिंदू धर्म के लिए पैसे उपयोग करने के लिए बताएं।

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