Friday, September 27, 2019

चिन्मयानंद और आसाराम बापू पर एक ही शहर की दो लड़कियों ने क्यों लगाया आरोप ?

26 अप्रैल 2019 

उत्तरप्रदेश के शाहजहांपुर में बरेली रोड़ पर स्थित मुमुक्षु आश्रम से एक ही परिसर में पांच शिक्षण संस्थान संचालित होते हैं। पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद सभी शिक्षण संस्थाओं के प्रमुख भी हैं। स्वामी चिन्मयानंद की संस्था में प्राथमिक कक्षा में पढ़ने वाली लड़की ने ही हिंदू संत आसाराम बापू पर रेप का आरोप लगाया है बाद में भले वो गुरुकुल में पढ़ने गई पर पहले वो शाहजहांपुर में पढ़ती थी और इनकी ही कॉलेज में पढ़ने वाली दूसरी लड़की ने चिन्मयानंद पर रेप का आरोप लगाया है।

अब दिलचस्प बात यह है कि चिन्मयानंद पर आरोप लगाने वाली लड़की को गिरफ़्तार किया गया और उसके पहले उसके दोस्त संजय और सोनू को गिरफ्तार किया गया क्योंकि उनके द्वारा स्वामी को ब्लैकमेल करके 5 करोड़ लेने वाला वीडियो वारयल हो गया । स्वामी पर आरोप लगाने वाली लड़की के दोस्तों ने स्वीकार किया कि पैसे लेने की प्लानिंग में लड़की ही प्रमुख है, वो चिन्मयानंद की मालिश करने जाती थी और उसने 43 बार वीडियो भी बनाया।

इस पूरे प्रकरण की जांच कर रही SIT की जांच रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि आरोप लगानेवाली छात्रा और चिन्‍मयानंद के बीच जनवरी 2019 से अगस्‍त महीने के बीच 200 बार फोन पर बातचीत हुई है। उधर, इन्‍हीं 8 महीनों के दौरान छात्रा और उसके साथी संजय के बीच 4200 से ज्‍यादा बार फोन पर बात हुई है ।

खबर के मुताबिक छात्रा ने जो वीडियो बनाये हैं उनमें रेप का जिक्र नहीं है और स्वामी ने भी कहा है कि रेप नही किया है अश्लील बातें की उसके लिए मैं शर्मिंदा हूँ । वीडियो देखकर पुलिस ने भी स्वामी पर रेप का आरोप दर्ज नही किया है । 

अब आते है हिंदू संत आसाराम बापू पर उनके ऊपर आरोप लगाने वाली लड़की भी शाहजहांपुर की ही है, पहले शाहजहांपुर पढ़ती थी । बाद में छिंदवाड़ा पढ़ने गई और उसने घटना जोधपुर की बताकर घटना के 5 दिन बाद एफआईआर दिल्ली में रात को 2:30 बजे दर्ज करवाई, अब आप सोच सकते हैं कि पुलिस दूसरे पुलिस स्टेशन की हद लगती है तो भी हमारी FIR दर्ज नही करती और ये शाहजहांपुर की है, घटना जोधपुर की है तो फिर दिल्ली पुलिस ने कैसे FIR दर्ज कर ली?

बापू आसारामजी के फंसाने के कई पुख्ता सबूत भी सामने आये हैं...

जैसे :-

1. तथाकथित घटना के 5 दिन बाद और रात 2:30 बजे FIR दर्ज की गई।

2. हेल्पलाइन रजिस्टर के कई पन्ने संदिग्ध तरीके से फाड़ें गए।

3. 164 के बयान होने के बाद FIR न्यायालय में पेश की गई । 

4. FIR लिखते समय की गई वीडियो रिकॉर्डिंग गायब कर दी गई।

5. ओरिजिनल FIR को बदल दिया गया, FIR और FIR की कार्बन कॉपी में अंतर पाया गया ।

6. मेडिकल में भी बापू को क्लीनचिट मिली ।

8. उम्र संबंधी अलग-अलग सर्टिफिकेट में लड़की की अलग-अलग उम्र पाई गई ।

9. लड़की की कॉल डिटेल से स्पष्ट हुआ कि घटना की रात लड़की किसी संदिग्ध व्यक्ति से फोन द्वारा संपर्क में थी ।

10. तथाकथित घटना के समय बापू आसारामजी मँगनी कार्यक्रम में व्यस्त थे, लड़की कुटिया में गई ही नहीं ।

अधिवक्ता सुराणा ने भी कोर्ट में खुलासा किया था कि लड़की के माँ-बाप ने जयपुर में भी एक वकील को झूठा मुकदमा दर्ज करवाने के लिए मोटी रकम देने का ऑफर दिया था । जिसकी पुष्टि खुद उस वकील ने न्यायालय में अपने बयान में की । 

आपको बता दें कि बापू आशारामजी के अहमदाबाद आश्रम में एक Fax आया था जिसमें 50 करोड़ की फिरौती की मांग की गई थी और न देने पर धमकी दी गई थी कि अगर बापू ने 50 करोड़ नही दिए तो झूठी लड़कियां तैयार करके झूठे केस में फंसा देंगे और कभी बाहर नहीं आ पाओगे पर कोर्ट ने इनके ऊपर कोई एक्शन नहीं लिया।


जब स्वामी चिन्मयानंद पर आरोप लगाने वाली लड़की को गिरफ्तार कर सकते हैं तो फिर संत आसाराम बापू पर आरोप लगानेवाली लड़की की भी जांच होनी चाहिए और उनके अकाउंट चेक होने चाहिए कि फंडिग कहाँ से आई क्योंकि बापू आसारामजी की निर्दोषता के पुख्ता सबूत सामने आये हैं ।

डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने भी कई बार खुलासा किया है कि बापू आसारामजी को धर्मपरिवर्तन पर रोक लगाने और लाखों हिन्दुओं की घरवापसी कराने के कारण षडयंत्र के तहत जेल भिजवाया गया है ।

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जाने सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध क्यों करना चाहिए, नहीं करने से क्या होगी हानि ?

27 सितंबर 2019

*🚩 हिन्दू धर्म में एक अत्यंत सुरभित पुष्प है कृतज्ञता की भावना, जो कि बालक में अपने माता-पिता के प्रति स्पष्ट परिलक्षित होती है । हिन्दू धर्म का व्यक्ति अपने जीवित माता-पिता की सेवा तो करता ही है, उनके देहावसान के बाद भी उनके कल्याण की भावना करता है एवं उनके अधूरे शुभ कार्यों को पूर्ण करने का प्रयत्न करता है । 'श्राद्ध-विधि' इसी भावना पर आधारित है । इस साल सर्वपितृ अमावस्या 28 सितंबर को है ।*

*🚩पुराणों में आता है कि आश्विन(गुजरात-महाराष्ट्र के मुताबिक भाद्रपद) कृष्ण पक्ष की अमावस (पितृमोक्ष अमावस) के दिन सूर्य एवं चन्द्र की युति होती है । सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है । इस दिन हमारे पितर यमलोक से अपना निवास छोड़कर सूक्ष्म रूप से मृत्युलोक (पृथ्वीलोक) में अपने वंशजों के निवास स्थान में रहते हैं । अतः उस दिन उनके लिए विभिन्न श्राद्ध करने से वे तृप्त होते हैं ।*

*🚩राजा रोहिताश्व ने मार्कण्डेयजी से प्रार्थना की : ‘‘भगवन् ! मैं श्राद्धकल्प का यथार्थरूप से श्रवण करना चाहता हूँ ।*

*🚩मार्कण्डेयजी ने कहा : ‘‘राजन् ! इसी विषय में आनर्त-नरेश ने भर्तृयज्ञ से पूछा था । तब भर्तृयज्ञ ने कहा था : ‘राजन् ! विद्वान पुरुष को अमावस्या  के दिन श्राद्ध अवश्य करना चाहिए । क्षुधा से क्षीण हुए पितर श्राद्धान्न की आशा से अमावस्या तिथि आने की प्रतीक्षा करते रहते हैं । जो अमावस्या को जल या शाक से भी श्राद्ध करता है, उसके पितर तृप्त होते हैं और उसके समस्त पातकों का नाश हो जाता है ।*

*🚩आनर्त-नरेश बोले : ‘ब्रह्मन् ! मरे हुए जीव तो अपने कर्मानुसार शुभाशुभ गति को प्राप्त होते हैं, फिर श्राद्धकाल में वे अपने पुत्र के घर कैसे पहुँच पाते हैं ?*

*🚩भर्तृयज्ञ : ‘राजन् ! जो लोग यहाँ मरते हैं उनमें से कितने ही इस लोक में जन्म लेते हैं, कितने ही पुण्यात्मा स्वर्गलोक में स्थित होते हैं और कितने ही पापात्मा जीव यमलोक के निवासी हो जाते हैं । कुछ जीव भोगानुकूल शरीर धारण करके अपने किये हुए शुभ या अशुभ कर्म का उपभोग करते हैं ।*

*राजन् ! यमलोक या स्वर्गलोक में रहनेवाले पितरों को भी तब तक भूख-प्यास अधिक होती है, जब तक कि वे माता या पिता से तीन पीढ़ी के अंतर्गत रहते हैं । जब तक वे मातामह, प्रमातामह या वृद्धप्रमातामह और पिता, पितामह या प्रपितामह पद पर रहते हैं, तब तक श्राद्धभाग लेने के लिए उनमें भूख-प्यास की अधिकता होती है ।*

*🚩 पितृलोक या देवलोक के पितर श्राद्धकाल में सूक्ष्म शरीर से श्राद्धीय ब्राह्मणों के शरीर में स्थित होकर श्राद्धभाग से तृप्त होते हैं, परंतु जो पितर कहीं शुभाशुभ भोग हेतु स्थित हैं या जन्म ले चुके हैं, उनका भाग दिव्य पितर लेते हैं और जीव जहाँ जिस शरीर में होता है, वहाँ तदनुकूल भोगों की प्राप्ति कराकर उसे तृप्ति पहुँचाते हैं ।*

*🚩ये दिव्य पितर नित्य और सर्वज्ञ होते हैं । पितरों के उद्देश्य से शक्ति के अनुसार सदा ही अन्न और जल का दान करते रहना चाहिए । जो नीच मानव पितरों के लिए अन्न और जल न देकर आप ही भोजन करता है या जल पीता है, वह पितरों का द्रोही है । उसके पितर स्वर्ग में अन्न और जल नहीं पाते हैं । श्राद्ध द्वारा तृप्त किये हुए पितर मनुष्य को मनोवांछित भोग प्रदान करते हैं ।*

*🚩आनर्त-नरेश : ‘ब्रह्मन् ! श्राद्ध के लिए और भी तो नाना प्रकार के पवित्रतम काल हैं, फिर अमावस्या को ही विशेषरूप से श्राद्ध करने की बात क्यों कही गयी है ?*

*🚩भर्तृयज्ञ : ‘राजन् ! यह सत्य है कि श्राद्ध के योग्य और भी बहुत-से समय हैं । मन्वादि तिथि, युगादि तिथि, संक्रांतिकाल, व्यतीपात, चंद्रग्रहण तथा सूर्यग्रहण - इन सभी समयों में पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध करना चाहिए । पुण्य-तीर्थ, पुण्य-मंदिर, श्राद्धयोग्य ब्राह्मण तथा श्राद्धयोग्य उत्तम पदार्थ प्राप्त होने पर बुद्धिमान पुरुषों को बिना पर्व के भी श्राद्ध करना चाहिए । अमावस्या को विशेषरूप से श्राद्ध करने का आदेश दिया गया है, इसका कारण है कि सूर्य की सहस्रों किरणों में जो सबसे प्रमुख है उसका नाम ''अमा'' है । उस "अमा'' नामक प्रधान किरण के तेज से ही सूर्यदेव तीनों लोकों को प्रकाशित करते हैं । उसी "अमा" में तिथि विशेष को चंद्रदेव  निवास  करते  हैं,  इसलिए  उसका  नाम अमावस्या है । यही कारण है कि अमावस्या प्रत्येक धर्मकार्य के लिए अक्षय फल देनेवाली बतायी गयी है । श्राद्धकर्म में तो इसका विशेष महत्त्व है ही ।*

*🚩श्राद्ध की महिमा बताते हुए ब्रह्माजी ने कहा है : ‘यदि मनुष्य पिता, पितामह और प्रपितामह के उद्देश्य से तथा मातामह,  प्रमातामह और वृद्धप्रमातामह के उद्देश्य से श्राद्ध-तर्पण करेंगे तो उतने से ही उनके पिता और माता से लेकर मुझ तक सभी पितर तृप्त हो जायेंगे ।*

*🚩जिस अन्न से मनुष्य अपने पितरों की तुष्टि के लिए श्रेष्ठ ब्राह्मणों को तृप्त करेगा और उसीसे भक्तिपूर्वक पितरों के निमित्त पिंडदान भी देगा, उससे पितरों को सनातन तृप्ति प्राप्त होगी ।*

*🚩पितृपक्ष में शाक के द्वारा भी जो पितरों का श्राद्ध नहीं करेगा, वह धनहीन चाण्डाल होगा । ऐसे व्यक्ति से जो बैठना, सोना, खाना, पीना, छूना-छुआना अथवा वार्तालाप आदि व्यवहार करेंगे, वे भी महापापी माने जाएंगे । उनके यहाँ संतान की वृद्धि नहीं होगी । किसी प्रकार भी उन्हें सुख और धन-धान्य की प्राप्ति नहीं होगी ।*

*🚩यदि श्राद्ध करने की क्षमता, शक्ति, रुपया-पैसा नहीं है तो श्राद्ध के दिन पानी का लोटा भरकर रखें फिर भगवदगीता के सातवें अध्याय का पाठ करें और 1 माला द्वादश मंत्र "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" और एक माला "ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा" की करें और लोटे में भरे हुए पानी से सूर्यं भगवान को अर्घ्य दे फिर 11.36  से 12.24 के बीच के समय (कुतप वेला) में गाय को चारा खिला दें । चारा खरीदने का भी पैसा नहीं है, ऐसी कोई समस्या है तो उस समय दोनों भुजाएँ ऊँची कर लें, आँखें बंद करके सूर्यनारायण का ध्यान करें : ‘हमारे पिता को, दादा को, फलाने को आप तृप्त करें, उन्हें आप सुख दें, आप समर्थ हैं । मेरे पास धन नहीं है, सामग्री नहीं है, विधि का ज्ञान नहीं है, घर में कोई करने-करानेवाला नहीं है, मैं असमर्थ हूँ लेकिन आपके लिए मेरा सद्भाव है, श्रद्धा है । इससे भी आप तृप्त हो सकते हैं । इससे आपको मंगलमय लाभ होगा ।*

*🚩श्राद्ध कैसे करें, लिंक क्लिक करके देखिये*

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Tuesday, September 24, 2019

विज्ञान चाहे कितनी भी तरक्की कर ले पर ईश्वर के सामने फेल है

24 अप्रैल 2019 

*🚩ईश्वर द्वारा प्रकृति की संरचना ही सर्वश्रेष्ठ संरचना हैं। हमें ईश्वर ने जो जिस रूप में दिया वहीं हमारे लिए सर्वोत्तम है। हम भोग-विलास, दिखावे और लालसा में भले ही प्राकृतिक चीजों से दूर चले गए पर आज मानव निर्मित चीजों के दुष्प्रभावों, दुष्परिणामों के कारण मनुष्य को वापिस प्राकृतिक चीजों की तरफ लौटना पड़ा रहा है क्योंकि वहीं सर्वश्रेष्ठ है।*

*🚩जानिए इस विषय में कुछ उदाहरण:*


*1.) पहले मनुष्य मिट्टी के बर्तन प्रयोग करता था। फिर वहां से भिन्न भिन्न धातुओं और स्टील और प्लास्टिक के बर्तनों तक पहुँच गया है। पर इनके प्रयोग से कैंसर होने का खतरा हो गया है इसलिए मनुष्य दोबारा मिट्टी के बर्तनों तक आ रहा है।*

*🚩2.) पहले इंसान अंगूठाछाप था क्योंकि उसे पढ़ना लिखना नहीं आता था। बाद में जब पढ़ना लिखना आया तो दस्तखत (Signature) करने का प्रचलन चला। आज विज्ञान जहां चरमसीमा पर पहुँच चुका है तो इंसान फिर से Thumb Scanning की तकनीकी के कारण अंगूठाछाप बन गया है।*

*🚩3.) पहले मनुष्य फटे हुए सादे कपड़े पहनता था। फिर साफ सुथरे और प्रेस किए कपड़े पहनने लगा। फिर फैशन के नाम पर अपनी पैंटें फाड़ने लगा। सूती वस्त्रों से टैरीलीन, टैरीकॉट पर पहुँचा इंसान फिर से वापस सूती वस्त्रों पर आ रहा है।*

*🚩4.) मनुष्य पहले पढ़ता ही नहीं था। जब ज्ञान हुआ तो गुरुकुलों में नैतिक और आध्यात्मिक ज्ञान ही लिया। अब विज्ञान चरमसीमा पर है। लोग MBBS, Engineering, MBA की पढ़ाई कर रहे हैं पर नैतिक और आध्यात्मिक ज्ञान और शांति नहीं है। आत्महत्या जैसा घोर पाप बढ़ कर रहे हैं, अपराध बढ़ गया है। समय वो आ गया है कि नैतिक और आध्यात्मिक ज्ञान भौतिक ज्ञान से जरूरी हो गया है।*

*🚩5.) खेती में पहले मनुष्य प्राकृतिक खाद प्रयोग करता था। बाद में यूरिया, कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करने लगा। इनके दुष्प्रभावों के कारण मनुष्य अब वापिस आर्गेनिक खेती की तरफ बढ़ रहा है।*

*🚩6.) पहले मनुष्य कुदरती फल, खाद्य पदार्थ ही खाता था। उस क़ुदरती भोजन से मनुष्य प्रोसेसफ़ूड (Canned Food & packed juices) की तरफ बढ़ा। इससे तरह तरह की बीमारियां होने लगी। अब इन बीमारियों से बचने के लिए मनुष्य दोबारा क़ुदरती भोजन की तरफ आ रहा है।*

*🚩7.) पहले मनुष्य सादी वस्तुएं प्रयोग करता था। फिर पुरानी और सादा चीज़ें इस्तेमाल ना करके ब्रांडेड (Branded) चीजें प्रयोग करने लगा। नई चीजों से जी भर गया तो पुरानी चीजें ही Antique Piece  कहकर रखने लगा।*

*🚩8.) पहले मनुष्य आयुर्वेदिक पद्दति से ईलाज करता था। फिर एलोपैथी का प्रचलन हुआ, एंटीबायोटिक का जमाना आया। एलोपैथी और एंटीबायोटिक के दुष्प्रभावों के कारण मनुष्य वापिस आयुर्वेद की तरफ बढ़ रहा है।*

*🚩9.) पहले बच्चे मिट्टी खाते थे। जैसे जैसे सभ्यता का विकास हुआ, मनुष्य बच्चों को इंफेक्शन से डर से मिट्टी में खेलने से रोकने लगा। बच्चों को घर में बंद करके फिसड्डी बना दिया। उसी मनुष्य ने अब Immunity बढ़ाने के नाम पर बच्चों को फिर से मिट्टी में खिलाना शुरू कर दिया है।*

*🚩10.) पहले मनुष्य जंगल में रहा, गावों में रहा। फिर विकास की दौड़ में शहर की तरफ भागा। वहां पर्यावरण को प्रदूषित किया और अब वापिस साफ हवा और स्वास्थ्य लाभ के लिए जंगल, गांव और हिल-स्टेशनों की तरफ जा रहा है।*

*🚩11.) जंगल, गांव और गौशालाओं में रहने वाला मनुष्य चकाचौंध से प्रभावित होकर शहर भागा, डिस्को पब भागा। अब मनुष्य दोबारा मन की शांति के लिए शहर से जँगल, गाँव व गौशालाओं की ओर आ रहा है।*

*🚩12) भारतीय (हिंदू) संस्कृति महान थी उसने अनुसार जीवन जीने से व्यक्ति स्वस्थ्य, सुखी एवं सम्मानित जीवन जीता था लेकिन टीवी, फिल्मे और मीडिया के दुष्प्रभाव के कारण पाश्चात्य संस्कृति में चला गया लेकिन वहाँ दुःख, चिंता, बीमारियां बढ़ने लगी तो भारतीय संस्कृति की तरफ लौटना शुरू कर दिया।*

*🚩इससे ये निष्कर्ष निकलता है कि तकनीकी ने हमें जो दिया, उससे बेहतर तो भगवान ने हमें पहले ही दे रखा था। वास्तव में विज्ञान की बजाय ईश्वर की संरचना ही हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ है। इससे सिद्ध होता है कि हमारे लिए ईश्वर से बड़ा कोई हितैषी नहीं है।*

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Monday, September 23, 2019

जानिए ईसाई मिशनरियों द्वारा कैसे किया जाता है धर्मान्तरण?

23 अप्रैल 2019 

*🚩केरल में बाढ़ का पानी उतरने के बाद ईसाई मिशनरी विशेष रूप से हरकत में आ गई थी। उनका उद्देश्य पीड़ितों की सेवा करना नहीं अपितु ईसा मसीह के लिए नई फसल तैयार करना हैं। पहले भी सुनामी आपदा के समय राहत के बदले धर्म परिवर्तन का प्रलोभन देते हुए ईसाई प्रचारक देखे गए थे। क्या धर्म प्रचार का उद्देश्य प्रलोभन देकर धर्मान्तरण करना है? क्या बिना धर्म परिवर्तन के पीड़ित मनुष्यों को सहायता नहीं की जा सकती? यह खुला प्रश्न सभी ईसाईयों से है। हमारे देश के संभवत शायद ही कोई चिंतक ऐसे हुए हो जिन्होंने प्रलोभन द्वारा धर्मान्तरण करने की निंदा न की हो। महान चिंतक एवं समाज सुधारक स्वामी दयानंद का एक ईसाई पादरी से शास्त्रार्थ हो रहा था। स्वामी जी ने पादरी से कहा की हिन्दुओं का धर्मांतरण करने के तीन तरीके है। पहला जैसा मुसलमानों के राज में गर्दन पर तलवार रखकर जोर जबरदस्ती से बनाया जाता था। दूसरा बाढ़, भूकम्प, प्लेग आदि प्राकृतिक आपदा जिसमें हज़ारों लोग निराश्रित होकर ईसाईयों द्वारा संचालित अनाथाश्रम एवं विधवाश्रम आदि में लोभ-प्रलोभन के चलते भर्ती हो जाते थे और इस कारण से आप लोग प्राकृतिक आपदाओं के देश पर बार बार आने की अपने ईश्वर से प्रार्थना करते है और तीसरा बाइबिल की शिक्षाओं के जोर शोर से प्रचार-प्रसार करके। मेरे विचार से इन तीनों में सबसे उचित अंतिम तरीका मानता हूँ। स्वामी दयानंद की स्पष्टवादिता सुनकर पादरी के मुख से कोई शब्द न निकला। स्वामी जी ने कुछ ही पंक्तियों में धर्मान्तरण के पीछे की विकृत मानसिकता को उजागर कर दिया।


*🚩राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ईसाई धर्मान्तरण के सबसे बड़े आलोचको में से एक थे। अपनी आत्मकथा में महात्मा गांधी लिखते है "उन दिनों ईसाई मिशनरी हाई स्कूल के पास नुक्कड़ पर खड़े हो हिन्दुओं तथा देवी देवताओं पर गलियां उड़ेलते हुए अपने मत का प्रचार करते थे। यह भी सुना है की एक नया कन्वर्ट (मतांतरित) अपने पूर्वजों के धर्म को, उनके रहन-सहन को तथा उनके गलियां देने लगता है। इन सबसे मुझमें ईसाइयत के प्रति नापसंदगी पैदा हो गई।" इतना ही नहीं गांधी जी से मई, 1935 में एक ईसाई मिशनरी नर्स ने पूछा कि क्या आप मिशनरियों के भारत आगमन पर रोक लगाना चाहते है तो जवाब में गांधी जी ने कहा था,' अगर सत्ता मेरे हाथ में हो और मैं कानून बना सकूं तो मैं मतांतरण का यह सारा धंधा ही बंद करा दूँ। मिशनरियों के प्रवेश से उन हिन्दू परिवारों में जहाँ मिशनरी पैठे है, वेशभूषा, रीतिरिवाज एवं खानपान तक में अंतर आ गया है।*

*🚩समाज सुधारक एवं देशभक्त लाला लाजपत राय द्वारा प्राकृतिक आपदाओं में अनाथ बच्चों एवं विधवा स्त्रियों को मिशनरी द्वारा धर्मान्तरित करने का पुरजोर विरोध किया गया जिसके कारण यह मामला अदालत तक पहुंच गया। ईसाई मिशनरी द्वारा किये गए कोर्ट केस में लाला जी की विजय हुई एवं एक आयोग के माध्यम से लाला जी ने यह प्रस्ताव पास करवाया की जब तक कोई भी स्थानीय संस्था निराश्रितों को आश्रय देने से मना न कर दे तब तक ईसाई मिशनरी उन्हें अपना नहीं सकती।*

*🚩समाज सुधारक डॉ अम्बेडकर को ईसाई समाज द्वारा अनेक प्रलोभन ईसाई मत अपनाने के लिए दिए गए मगर यह जमीनी हकीकत से परिचित थे की ईसाई मत ग्रहण कर लेने से भी दलित समाज अपने मुलभुत अधिकारों से वंचित ही रहेगा। डॉ आंबेडकर का चिंतन कितना व्यवहारिक था यह आज देखने को मिलता है।''जनवरी 1988 में अपनी वार्षिक बैठक में तमिलनाडु के बिशपों ने इस बात पर ध्यान दिया कि धर्मांतरण के बाद भी अनुसूचित जाति के ईसाई परंपरागत अछूत प्रथा से उत्पन्न सामाजिक व शैक्षिक और आर्थिक अति पिछड़ेपन का शिकार बने हुए हैं। फरवरी 1988 में जारी एक भावपूर्ण पत्र में तमिलनाडु के कैथलिक बिशपों ने स्वीकार किया 'जातिगत विभेद और उनके परिणामस्वरूप होने वाला अन्याय और हिंसा ईसाई सामाजिक जीवन और व्यवहार में अब भी जारी है। हम इस स्थिति को जानते हैं और गहरी पीड़ा के साथ इसे स्वीकार करते हैं।' भारतीय चर्च अब यह स्वीकार करता है कि एक करोड़ 90 लाख भारतीय ईसाइयों का लगभग 60 प्रतिशत भाग भेदभावपूर्ण व्यवहार का शिकार है। उसके साथ दूसरे दर्जे के ईसाई जैसा अथवा उससे भी बुरा व्यवहार किया जाता है। दक्षिण में अनुसूचित जातियों से ईसाई बनने वालों को अपनी बस्तियों तथा गिरिजाघर दोनों जगह अलग रखा जाता है। उनकी 'चेरी' या बस्ती मुख्य बस्ती से कुछ दूरी पर होती है और दूसरों को उपलब्ध नागरिक सुविधओं से वंचित रखी जाती है। चर्च में उन्हें दाहिनी ओर अलग कर दिया जाता है। उपासना (सर्विस) के समय उन्हें पवित्र पाठ पढऩे की अथवा पादरी की सहायता करने की अनुमति नहीं होती। बपतिस्मा, दृढि़करण अथवा विवाह संस्कार के समय उनकी बारी सबसे बाद में आती है। नीची जातियों से ईसाई बनने वालों के विवाह और अंतिम संस्कार के जुलूस मुख्य बस्ती के मार्गों से नहीं गुजर सकते। अनुसूचित जातियों से ईसाई बनने वालों के कब्रिस्तान अलग हैं। उनके मृतकों के लिए गिरजाघर की घंटियां नहीं बजतीं, न ही अंतिम प्रार्थना के लिए पादरी मृतक के घर जाता है।*
*🚩अंतिम संस्कार के लिए शव को गिरजाघर के भीतर नहीं ले जाया जा सकता। स्पष्ट है कि 'उच्च जाति' और 'निम्न जाति' के ईसाइयों के बीच अंतर्विवाह नहीं होते और अंतर्भोज भी नगण्य हैं। उनके बीच झड़पें आम हैं। नीची जाति के ईसाई अपनी स्थिति सुधारने के लिए संघर्ष छेड़ रहे हैं, गिरजाघर अनुकूल प्रतिक्रिया भी कर रहा है लेकिन अब तक कोई सार्थक बदलाव नहीं आया है। ऊंची जाति के ईसाइयों में भी जातिगत मूल याद किए जाते हैं और प्रछन्न रूप से ही सही लेकिन सामाजिक संबंधोंं में उनका रंग दिखाई देता है।*

*🚩महान विचारक वीर सावरकर धर्मान्तरण को राष्ट्रान्तरण मानते थे। आप कहते थे "यदि कोई व्यक्ति धर्मान्तरण करके ईसाई या मुसलमान बन जाता है तो फिर उसकी आस्था भारत में न रहकर उस देश के तीर्थ स्थलों में हो जाती है जहाँ के धर्म में वह आस्था रखता है, इसलिए धर्मान्तरण यानी राष्ट्रान्तरण है।*

*🚩इस प्रकार से प्राय: सभी देशभक्त नेता ईसाई धर्मान्तरण के विरोधी रहे है एवं उसे राष्ट्र एवं समाज के लिए हानिकारक मानते है। - डॉ विवेक आर्य*

*देश मे ईसाई मिशनरियों द्वारा हो रहे धर्मांतरण को रोकना होगा नही तो बहुत बड़ी हानि होगी।*

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Sunday, September 22, 2019

क्या सोनाक्षी सिन्हा ही धर्म के बारे में नहीं जानती हैं ?

22 अप्रैल 2019 

कौन बनेगा करोड़पति में प्रश्न पूछा गया कि हनुमानजी संजीवनी बूटी किसके लिए लेकर आये थे इस प्रश्न का सहीं उत्तर सोनाक्षी सिन्हा नहीं दे पाईं, उसके बाद सोशल मीडिया पर उसका खूब मजाक उड़ाया गया और आलोचना की गई ।मजाक और आलोचना इसलिए किया गया कि धर्म और शास्त्र के बारे में सोनाक्षी को जानकारी नहीं थी।


सोनाक्षी सिन्हा की आलोचना की गई यह सहीं है पर क्या आज यह स्थिति हमारे घर में नहीं है ? हमारे बच्चे क्या धर्म के बारे में सबकुछ जानते हैं ? सोनाक्षी सिन्हा के इस अज्ञान में, आज के भारत की नई पीढ़ी का अक्स देखा जा सकता है!*

सोनाक्षी पर तो हँस लिया पर अपने ही बच्चे कान्वेंट स्कूल में जा रहे हैं हमारी संतानें भी सोनाक्षी ही बन रही हैं।*

जरा अपनी संतानों से पूछ लो, जटायु कौन हैं, मंदोदरी कौन हैं,  अगस्त्य कौन हैं, शिखण्डी कौन हैं, अम्बा कौन हैं, शकुंतला कौन हैं, विश्वामित्र कौन हैं, तारा, अहिल्या कौन हैं, मामा शल्य किसके मामा थे, पाण्डवों ने कौन से पाँच गाँव माँगे थे अगर इसका तीस प्रतिशत भी सहीं जवाब मिलता है तो आपके बच्चे सहीं दिशा में हैं, पचास से ऊपर मतलब धर्म की शिक्षा अच्छी चल रही है, 80 से ऊपर मतलब बच्चे का खुद का भी झुकाव हैं इन बातों में (और ये झुकाव आपका ही बनाया होता है, वो वही दुनिया देखेंगे जो आप दिखायेंगे)*

जैसे ही बच्चा रोना शुरू किया, ले बेटे मोबाईल देख करके अपने पालक होने के कर्त्तव्य से पीछा छुड़ाने वाले भी सोनाक्षी तरह हँसने लायक हो गये हैं।*

ले बेटे मोबाईल देख करने के बजाये उसको बोलो कि इधर आजा बच्चे आज प्रह्लाद की कहानी सुनाऊँगा, आज गुरुभक्त आरुणि की, आज रानी दुर्गावती, रानी चेन्नम्मा, वीर शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह, श्री रामजी, श्री कृष्ण के अद्भुत लीला, साहस और बलिदान की कहानी सुनेंगे।*

यदि ऐसा नहीं करते हो तो सोनाक्षी पर हँसने के बजाये अपने भविष्य पर रो लेना क्योंकि आपसे पैदा हुई सन्तान आपकी नहीं रहेगी, किसी और सभ्यता की गुलाम हो जाएगी।*

आज का एक बड़ा तबका, राम एवं रामकथा से कोसों दूर है!*
*कितने परिवारों में माता पिता या अभिभावक बच्चों को हमारे पूर्वजों की कथाएँ सुनाते हैं? राम एवं कृष्ण की कथाएँ कहना सुनना सुनाना जिस शिक्षित समाज में आज भी पुरातनपंथी और पिछड़ेपन का द्योतक हो, वहां सोनाक्षी सिन्हा जैसा उत्तर ही मिलेगा!*

भारत में आज भी ऐसे पढ़े लिखे युवाओं की कमी नही, जो अयोध्या का नाम आते ही, विवाद में न पड़ते हुए कहते हैं*
*"अयोध्या में मंदिर नहीं, अस्पताल बनना चाहिए" फिर, हमारी पीढ़ी की अपने पुरखों के प्रति उदासीनता, अपने धर्म प्रतीकों के प्रति उपहास भाव से सींची नई पीढ़ी से ऐसे उत्तरों को सुनने में अचरज क्यों?*

अपने बच्चों को मशीन की तरह एक प्रोडक्ट के रूप में निर्मित कर रही पीढ़ी को समझना होगा कि, विद्यालयों के शैक्षणिक कोर्स का ज्ञान हममें संस्कार संस्कृति नही गढ़ते!*

आज धर्म के संस्कार नही मिलने के कारण ही बच्चें बड़े होकर मां-बाप को वृद्धाश्रम भेज देते है, लव जिहाद में फस जाते है, धर्म परिवर्तन कर लेते हैं, आत्महत्या कर लेते है, बीमारी की चपेट में आ जाते हैं, प्राचीन समय मे बच्चें गुरुकुलों में पढ़ते थे तो उनका बौद्धिक, मानसिक और शारिरिक का अदभुत विकास होता था जिससे वे हर क्षेत्र में आगे रहते थे लेकिन आज बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में भजेते है, पाठ्यक्रम में मुग़ल अंग्रेजो को पढ़ाया जाता है, सिनेमा, सीरियलो ओर मीडिया द्वारा हिन्दू धर्म के खिलाफ बताया जा रहा है फिर अपने बच्चे कैसे आगे प्रगति करेगे? सोनाक्षी सिन्हा की राह पर ही तो चल रहे है।*

इसलिए अपने बच्चों को धर्म की शिक्षा दीजिये जिससे समाज और देश सुदृढ़ बने।*


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