Sunday, June 7, 2020

ईसाई धर्मगुरु बिशप अंडरवर्ल्ड माफिया, हत्या, यौन शोषण में संलिप्त था, मीडिया चुप है!

07 जून 2020

🚩विश्व में हजारों ईसाई धर्मगुरु छोटे बच्चें-बच्चियों और महिलाओं का यौन शोषण कर रहे हैं, कुछ तो मानव तस्करी, हत्या, भ्रष्टाचार, अंडरवर्ल्ड आदि में संलिप्त पाए गए हैं, इस पर उनके मुख्य पोप ने माफी भी मांगी है पर सबसे बड़ी बात तो यह है कि इतना होने पर भी मीडिया उन दुष्कर्मी पादरियों के बारे में बोलने में पहरेज करता है। मीडिया को तो सिर्फ हिंदू धर्म से ही नफरत है इसलिए वो सिर्फ पवित्र हिंदू साधु-संतों को ही बदनाम करता है क्योंकि हिंदू साधु-संत हिंदू संस्कृति के प्रति लोगों को जगरूक करते हैं, धर्मान्तरण पर रोक लगवाते हैं, समाज को व्यसनमुक्त और सदाचारी बनाते हैं जिसके कारण राष्ट्र एवं संस्कृति विरोधी ताकतें कुछ मीडिया को फंडिंग करती हैं जिससे पादरियों के दुष्कर्म छुपाते हैं और हिंदू धर्मगुरुओं को बदनाम करते हैं।

🚩आपको बता दें कि बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व जज माइकल एफ सल्धाना ने मैसूर के बिशप के. ए. विलियम पर आतंक का साम्राज्य चलाने का बड़ा आरोप लगाया है। साथ ही उसके वरिष्ठ पीटर मचाडो पर उसके कृत्यों को ढकने और हत्या जैसे अपराधों का भी बचाव करने का आरोप लगाया है।

🚩रिटायर्ड जस्टिस ने 29 मई 2020 को दोनों बिशप को भेजे गए लीगल नोटिस में कहा कि विलियम की अंडरवर्ल्ड माफियाओ से साँठगाँठ है और वो स्थानीय पुलिस का भी सुरक्षा के लिए उपयोग करता है।

🚩उन्होंने कहा कि इस व्यक्ति को पिछले कई सालों से हटने को कहा जा रहा है, लेकिन उसके कारण दूसरों को ही कैथोलिक चर्च को छोड़ना पड़ रहा है। उन्होंने लिखा कि उसे 8 महीने पहले ही हटा दिया जाना चाहिए था, लेकिन उसका वरिष्ठ उसके साथ मिलकर हत्या जैसे मामलों को भी ढक रहा है।

🚩उन्होंने दावा किया कि कई विश्वसनीय और प्रतिष्ठित लोगों ने मचाडो को सबूतों के साथ 17 बार लिखित शिकायतें भेजी, लेकिन उसके कान पर जूँ तक न रेंगी।

🚩पूर्व जस्टिस ने ताज़ा मामलों की बात करते हुए कहा कि बिशप विलियम ने 12 घंटे के शॉर्ट नोटिस में बैठक बुला कर ट्रांसफर ऑर्डर्स जारी कर दिए, ताकि अपने विरोधियों को हटा सके। उन्होंने कहा कि जब कोर्ट से लेकर सरकार तक में इस आपदा के वक़्त ऐसे फैसलें नहीं लिए जा रहे हैं, बिशप ऐसे समय में ट्रांसफर कर रहा है। उन्होंने कहा कि अगर जल्द ही इसे वापस नहीं किया गया तो कुछ कड़े क़दम उठाए जाएँगे।

🚩उन्होंने उन 37 पादरियों से बातचीत की, जो बिशप के खिलाफ हैं। पूर्व जज ने ‘मिड डे’ से बात करते हुए कहा कि जब भी महिलाओं के साथ संबंधों में बिशप विलियम को कोई समस्या आई, उसने चर्च के रुपए ख़र्च कर चीजें सेटल की। एसोसिएशन ऑफ कंसर्नड कैथोलिक्स के सेक्रेटरी मेल्विन फर्नांडिस ने कहा कि कई पादरियों की हत्या को एक्सीडेंट का रूप दे दिया गया। उन्होंने निर्दोष पादरियों की हत्या की पुलिसिया जाँच की माँग की।

🚩आर्कबिशप मचाडो ने इस बारे में कहा कि उनके पास ऐसी जो भी शिकायतें आती हैं, उसे वो दिल्ली में अपने वरिष्ठ पदाधिकारियों के पास भेज देते है। उन्होंने कहा कि इस मामले को भी वो ऊपर भेज चुके है। बिशप विलियम ने अब तक इन आरोपों पर कोई जवाब नहीं दिया है।

🚩इससे पहले नवम्बर 2019 में मैसूर में 37 चर्चों के पादरियों ने पोप फ्रांसिस को पत्र लिख कर बिशप के ए विलियम को अपदस्थ करने की माँग की थी। उनके ख़िलाफ़ आपराधिक कृत्य, फंड्स का दुरुपयोग और यौन शोषण सहित कई आरोप लगाए गए थे। पादरियों ने वेटिकन को पत्र लिख कर कहा था कि बिशप ने एक महिला से शादी की है, जो बंगलुरु ओडीपी में कार्यरत है। साथ ही बिशप पर गुटबंदी और अपने ख़ास लोगों को फेवर करने का आरोप भी लगा था।

🚩बिशप पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए गए थे। बिशप ने जिस महिला से शादी की है, वो पहले से ही शादीशुदा थी। उसकी एक बेटी भी थी। शादी के बाद बिशप और उस महिला का एक बेटा हुआ। आरोप लगाया गया है कि उक्त महिला के पति ने उसे बिशप के साथ विवाहेत्तर संबंधों के कारण छोड़ दिया था। अब वो महिला अपने बच्चों के साथ अलग रहती है। पादरियों ने लिखा है कि बिशप उससे मिलता रहता है और परिवार की देखभाल भी करता है।

🚩पादरियों ने एक प्रेस नोट जारी कर बिशप विलियम के व्यवहार को अनैतिक और पापपूर्ण बताते हुए कहा कि उस पर न सिर्फ़ रुपयों की हेराफेरी और यौन शोषण, बल्कि हत्या और अपहरण तक के आरोप हैं। क्लर्जी में उसके करियर के दौरान बिशप विलियम पर लगे आरोपों को लेकर पादरियों ने कई घटनाओं का उदाहरण दिया। हिंकल पैरिश के पादरियों ने आरोप लगाया कि वहाँ बिशप विलियम के एक एंग्लो-इंडियन महिला के साथ सम्बन्ध थे।

🚩आरोप है कि बिशप ने उक्त महिला को गर्भवती कर दिया था। फ़िलहाल वो अपने बच्चे के साथ विदेश में शिफ्ट हो गई है। पत्र में एक अन्य घटना के बारे में बताया गया है, जब बिशप हाउस के एक कमरे में कर्मचारियों ने बिशप विलियम को महिला के साथ हमबिस्तर देखा था। पादरियों का कहना है कि उसके लिए महिलाओं की सहमति लेना आसान था, क्योंकि वो अपने अंतर्गत कार्यरत महिलाओं को तमाम तरह के लालच देता था।

🚩पत्र की मानें तो वो महिलाओं को घर और नौकरी से लेकर हर प्रकार की लग्जरी सुविधाएँ उपलब्ध कराता था। कैम्पस में साफ़-सफाई करने आने वाली महिलाओं और लड़कियों का भी उसने यौन शोषण किया था। उसके ख़िलाफ़ आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत कई मामले दर्ज हैं। उसने कई डील्स में हिस्सेदारी कर अपने लिए किकबैक के तहत रुपए और संपत्ति जुटाए। उसकी कई सम्पत्तियाँ जाँच के दायरे में है।

🚩ईसाई धर्मगुरुओं के काले कर्मों की यह तो मात्र एक घटना ही बताई गई, पूरी लिस्ट बनाएंगे तो एक बडी पुस्तक भी छोटी पड़ेगी।

🚩कई ईसाई पादरी हैं जिन्होंने कई छोटे बच्चों के साथ और कई नन के साथ रेप किया है पर मीडिया इस पर मौन रहती है। दूसरी तरफ न्यायालय भी उनको तुरंत राहत दे देता है। बिशप फ्रैंको को 21 दिन में ही जमानत हासिल हो गई थी जबकि 85 वर्षीय हिंदू संत आसाराम बापू के खिलाफ 5 साल तक न्यायालय में सुनवाई होती रही पर 1 दिन भी जमानत नहीं दी गई, हर बार खारिज कर दिया गया।

🚩मीडिया द्वारा हिंदू साधु-संतों को बदनाम करना और न्यायलय द्वारा जमानत नहीं मिलना और पादरीयों और मौलवीयों के दुष्कर्म को छुपाना और न्यायालय से तुरंत जमानत हासिल होना, यह भारतीय संस्कृति को खत्म करने की एक भयंकर साजिश ही है, हिंदुस्तानी इससे समझे और सावधान रहें।

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Friday, June 5, 2020

वियतनाम में पहले थे हिंदू मंदिर, 1100 साल पुराना मिला शिवलिंग

05 मई 2020

🚩विश्व मे प्रथम धर्म एकमात्र सनातन धर्म ही था, जब ब्रह्माजी ने सृष्टि का उद्गम किया तब केवल सनातन धर्म ही था जिसको आज हिंदू धर्म के नाम से बोला जाता है। आपने पुराणों में सुना होगा की कई राजा एकछत्र सम्राट थे अर्थात पूरी पृथ्वी पर सिर्फ एक राजा का ही राज होता था, विक्रम संवत जिनके नाम से है उन राजा विक्रमादित्य का राज्य भी अरब देश तक फैला था लेकिन 2020 साल पुराने ईसाई मत और 1500 साल पुराने इस्लाम मजहब ने सनातन धर्म को तोड़ने के लिए अनेक प्रयत्न किये और हिंदू आपस मे बंटते गए, जिसकी वजह से आज ईसाईयों के 172 देश और मुस्लिमो के 54 देश बन चुके हैं और बौद्ध धर्म के 8 से अधिक देश बन चुके हैं लेकिन हिंदू सोया रहा तो आज एक भी हिंदू राष्ट्र नहीं हैं।

🚩आपको बता दें कि वियतनाम में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को एक संरक्षण परियोजना की खुदाई के दौरान 9वीं शताब्दी का शिवलिंग मिला है। 

🚩खुदाई में प्राप्त बलुआ पत्थर से निर्मित यह शिवलिंग पूरी तरह से सुरक्षित है। इसे किसी तरह की हानि नहीं पहुँची है। यह शिवलिंग ASI को वियतनाम के माई-सन (मी-सान) मंदिर परिसर की खुदाई के दौरान मिला है।

🚩इस ऐतिहासिक शिवलिंग के मिलने पर ASI की प्रशंसा करते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने आधिकारिक ट्विटर एकाउंट से लिखा, “9वीं शताब्दी का अखंड बलुआ पत्थर शिवलिंग वियतनाम के ‘माई सन’ मंदिर परिसर में जारी संरक्षण परियोजना की नवीनतम खोज है। एएसआई की टीम को बधाई।”

🚩इसके साथ ही विदेश मंत्री ने खुदाई में प्राप्त शिवलिंग की तस्वीरें ट्वीट कर 2011 में इस अभयारण्य की अपनी यात्रा का भी जिक्र किया है। एक अन्य ट्वीट में उन्होंने इस खोज को भारत की विकास साझेदारी का एक महान सांस्कृतिक उदाहरण भी बताया है।

🚩पूरी तरह से सुरक्षित यह शिवलिंग हिंदू मंदिरों के एक परिसर का हिस्सा है। इसका निर्माण शक्तिशाली चंपा साम्राज्य द्वारा चौथी शताब्दी ईस्वी सन् और 13 वीं शताब्दी ईस्वी के बीच माई सन में किया गया था।

🚩उल्लेखनीय है कि ‘माई सन’ एक यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर केंद्र है, जो 10 शताब्दियों में निर्मित विभिन्न हिंदू मंदिरों का घर है। यह चाम लोगों की उन्नत तकनीकी सभ्यता का एक अद्भुत उदाहरण है।

🚩आपने जाना कि हिंदू वियतनाम में भी थे, वहाँ शिवलिंग मिलने पर कुछ हिंदू खुश भी होंगे लेकिन हिंदू केवल वियतनाम में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व मे फैले थे, हिंदू जाती मे बँटते गए और आज सिर्फ भारत में ही हैं और उसमे भी 8 राज्यों में तो अल्पसंख्यक बन चुके हैं। हरियाणा के मेवात में करीब 50 से अधिक गांव हिन्दू विहीन बन गए हैं, हिंदू साधु-संतों ही हत्या कर दी जा रही है अथवा जेल भेज दिया जाता है, हिंदू मंदिरों के पैसे चर्च, मस्जिद आदि अन्य जगह उपयोग किये जा रहे हैं। हिंदुनिष्ठ लोगो की हत्या की जा रही है, फिल्मों, मीडिया, वेब सीरीज आदि द्वारा हिंदुओ को गलत तरीके से दिखाया जा रहा है, भीम आर्मी वाले हिंदुओं को ही आपस में तोड़ रहे हैं अर्थात हिंदू बाहुल्य देश मे भी हिन्दू सुरक्षित नहीं हैं।

🚩अभी भी जाति-पाती में बंटे रहें तो फिर कौन बचायेगा? इसलिए अभी भी समय है, एक हो जाइए और एकता के सूत्र में बंधकर भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करना चाहिए।

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Tuesday, June 2, 2020

जनता की आवाज अंग्रेजों का नाम 'इंडिया' हटाओ, केवल 'भारत' रखो

02 जून 2020

🚩भारत का नाम सुनते ही देशवासियों के अंदर राष्ट्रभक्ति की उमंग जगने लगती है और इंडिया नाम से न राष्ट्रभक्ति जगती है और न ही अंदर कोई उमंग जगती है।

🚩आपको बता दें कि भारत ही एक ऐसा देश है कि उसको दो नामों से पुकारा जाता है जबकि जापान को जापान, अमेरिका को अमेरिका, नेपाल को नेपाल, भूटान को भूटान कहते हैं लेकिन भारत को इंडिया के नाम से बुलाते हैं जो अंग्रेजों की गुलामी का प्रतीक है।

🚩मंगलवार को ट्वीटर पर हैशटैग #ByeByeIndiaOnlyBharat दिनभर टॉप ट्रेंड में रहा उसमें करीब लाखों ट्वीट हुई। जानकारी के मुताबिक हिंदू संत श्री आशाराम बापू के समर्थकों ने सुबह 08 के बाद ट्रेंड शुरू किया था फिर तो जनता जुड़ गई और दिनभर टॉप ट्रेंड बना रहा, इसमें जनता की एक ही मांग थी कि देश को आज़ाद हुए 72 साल हुए फिर भी काफी जगह इंडिया नाम उपयोग किया जा रहा है जबकि भारत नाम बोला जाना चाहिए था।

🚩नामकरण बौद्धिक-सांस्कृतिक प्रभुत्व के प्रतीक और उपकरण होते हैं। पिछले आठ सौ वर्षों से भारत में विदेशी आक्रांताओं ने हमारे सांस्कृतिक, धार्मिक और शैक्षिक केंद्रों को नष्ट कर उसे नया रूप और नाम देने का अनवरत प्रयास किया। अंग्रेज शासकों ने भी यहाँ अपने शासकों, जनरलों के नाम पर असंख्य स्थानों के नाम रखें। शिक्षा में वही काम लॉर्ड मैकॉले ने खुली घोषणा करके किया, कि वे भारतवासियों की मानसिकता ही बदल कर उन्हें स्वैच्छिक ब्रिटिश नौकर बनाना चाहते हैं, जो केवल शरीर से भारतीय रहेंगे।

🚩नाम और शब्द कोई निर्जीव उपकरण नहीं होते। वह किसी भाषा व संस्कृति की धरोहर होते हैं। जैसा निर्मल वर्मा ने लिखा है, "कई शब्द अपने आप में संग्रहालय होते हैं जिन में किसी समाज की सहस्त्रों वर्ष पुरानी पंरपरा, स्मृति, रीति और ज्ञान संघनित रहता है।" 

🚩सन् 1947 में हमसे जो सबसे बड़ी भूलें हुईं उन में से एक यह भी थी कि स्वतंत्र होने के बाद भी देश का नाम ‘इंडिया’ रहने दिया। टाइम्स ऑफ इंडिया के लब्ध-प्रतिष्ठित विद्वान संपादक गिरिलाल जैन ने लिखा था कि स्वतंत्र भारत में इंडिया नामक इस “एक शब्द ने भारी तबाही की”। यह बात उन्होंने इस्लामी समस्या के संदर्भ में लिखी थी। यदि देश का नाम भारत होता, तो भारतीयता से जुड़ने के लिए यहाँ किसी से अनुरोध नहीं करना पड़ता! गिरिलाल जी के अनुसार, इंडिया ने पहले इंडियन और हिन्दू को अलग कर दिया। उससे भी बुरा यह कि उसने ‘इंडियन’ को हिन्दू से बड़ा बना दिया। यदि यह न हुआ होता तो आज सेक्यूलरिज्म, डाइवर्सिटी, और मल्टी-कल्टी का शब्द-जाल व फंदा रचने वालों का काम इतना सरल न रहा होता।

🚩यदि देश का नाम भारत रहता तो इस देश के मुसलमान स्वयं को भारतीय मुसलमान कहते। इन्हें अरब में अभी भी ‘हिन्दवी’ मुसलमान’ ही कहा जाता है। सदियों से विदेशी लोग भारतवासियों को ‘हिन्दू’ ही कहते रहे और आज भी कहते हैं। यह पूरी दुनिया में हमारी पहचान है, जिस से मुसलमान भी जुड़े थे। क्योंकि वे सब हिन्दुओं से धर्मांतरित हुए लोग ही हैं (यह महात्मा गाँधी ही नहीं, फारुख अब्दुल्ला भी कहते हैं)।

🚩विदेशियों द्वारा दिए गए नामों को त्यागना आवश्यक है। इस में अपनी पहचान के महत्व और गौरव की भावना है। ‘इंडिया’ को बदलकर भारत करने में किसी भाषा, क्षेत्र, जाति या संप्रदाय को आपत्ति नहीं हो सकती। इंडिया शब्द भारत पर ब्रिटिश शासन का सीधा ध्यान दिलाता है। आधिकारिक नाम में ‘इंडिया’ का पहला प्रयोग ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ में किया गया था जिसने हमें गुलाम बना कर दुर्गति की। जब वह व्यापार करने इस देश में आई थी तो यह देश स्वयं को भारतवर्ष या हिन्दुस्तान कहता था।
🚩पूर्व में गोवा के कांग्रेस सांसद श्री शांताराम नाईक ने इस विषय में संविधान संशोधन हेतु राज्य सभा में एक निजी विधेयक प्रस्तुत किया भी था। इस में उन्होंने कहा कि संविधान की प्रस्तावना तथा अनुच्छेद एक में इंडिया शब्द को हटाकर भारत कर लिया जाए। क्योंकि भारत अधिक व्यापक और अर्थवान शब्द है, जबकि इंडिया मात्र एक भौगोलिक उक्ति। श्री नाईक को हार्दिक धन्यवाद कि वह एक बहुत बड़े दोष को पहचानकर उसे दूर करने के लिए आगे बढ़े।

🚩भारत मे अंग्रेज देश को लूटने के लिए आये थे और हमारी सम्पत्ति लूटने के लिए उन्होंने अनेक षडयंत्र किये। हमारी संस्कृति को तोड़ने के लिए भरपूर प्रयास किया फिर देशवासियों को गुलाम बनाकर रखे थे, भारत की संपत्ति को लूटकर अपने देश में ले गये, 200 साल तक भारत को लूटा और आखिर में भारत का बंटवारा भी करवा दिया। आज भी उनके द्वारा चलाई हुई परंपरा चल रही है और उनके दिए हुए नाम भी चल रहे हैं जो गुलामी का प्रतीक हैं इसलिए सरकार और न्यायलय से प्रार्थना है कि गुलामी का प्रतीक इंडिया नाम हटाकर भारत किया जाए ऐसी जनता की मांग हैं।

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Monday, June 1, 2020

राज्य की सभी न्यायालयों में 'हिंदी' का उपयोग होना चाहिए : हरियाणा सरकार

01 जून 2020

🚩भारत की राष्ट्र भाषा हिंदी है और देश मे अधिकतर भारतवासी हिंदी ही समझते है लेकिन फिर भी न्यायालय और सरकारी कार्यालय में हिंदी की जगह अंग्रेजी भाषा का प्रयोग होता है बड़ा आश्चर्य की बात है और वे भी हमे 200 साल गुलाम रखने वालों की भाषा का प्रयोग कर रहे है भारत मे अधिकतर लोगों को अंग्रेजी भाषा नहीं आने के कारण वे न्यायालय की बहस और फैसले भी समझ नही पाते और सरकारी कार्यलय की तरफ से क्या निर्देश है वे भी समझ नही पाते है इसलिए अब समय आ गया है कि हरियाणा सरकार की तरह देशभर की न्यायालय से अंग्रेजी खत्म कर दी जाए और हिंदू का मुख्य रूप से कार्य चल ओर स्थानीय भाषा का थोड़ा बहुत प्रयोग किया जाए।

🚩आपको बता दे कि हरियाणा ने 11 मई, 2020 को एक अधिसूचना जारी कर कहा कि राज्य के सभी न्यायालयों और न्यायाधिकरणों में 'हिंदी' का उपयोग किया जाना चाहिए। राज्य सरकार ने हरियाणा राजभाषा (संशोधन) अधिनियम, 1969 की धारा 3 में संशोधन किया। इस अधिनियम को अब हरियाणा राजभाषा (संशोधन) अधिनियम, 2020 कहा जाता है।

🚩हरियाणा मंत्रिमंडल ने इससे पहले मई के पहले सप्ताह में अधीनस्थ न्यायालयों में हिंदी भाषा की शुरुआत को मंजूरी दी थी। विधानसभा ने फैसले के कार्यान्वयन के लिए एक विधेयक पारित किया था। 78 विधायकों, महाधिवक्ता और सैकड़ों अधिवक्ताओं ने अदालतों में इस्तेमाल के लिए हिंदी भाषा को अधिकृत करने में अपनी रुचि दिखाई थी, ताकि हरियाणा के नागरिक पूरी न्याय‌िक प्रक्रिया को समझ सकें क्योंकि यह उनकी अपनी भाषा में होगा। और ऐसा होने पर वह भी आसानी से न्यायालयों के सामने अपने विचार रख पाएंगे।

🚩संशोधन के महत्वपर्ण हिस्से-

हरियाणा राजभाषा (संशोधन) अधिनियम, 1969 की धारा 3 के बाद, निम्नलिखित अनुभाग शामिल किया जाएगा:

🚩"3-ए- न्यायालयों और न्यायाधिकरणों में हिंदी का उपयोग: - 

(1) हरियाणा में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के अधीनस्थ सभी सिविल न्यायालय और आपराधिक न्यायालय, सभी राजस्व न्यायालय और रेंट ट्र‌िब्‍यूनल्स या राज्य सरकार द्वारा गठित अन्य न्यायालय या न्यायाधिकरण हिंदी भाषा में काम करेंगे।

(2) राज्य सरकार हरियाणा राजभाषा (संशोधन) अधिनियम, 2020 के प्रारंभ होने के छह महीने के भीतर अपेक्षित बुनियादी ढांचा और कर्मचारियों को प्रशिक्षण प्रदान करेगी।

🚩न्यायिक कार्य में हिंदी का उपयोग करने के पक्ष में हरियाणा सरकार का तर्क यह है कि अधिकांश वादकर्ता अंग्रेजी नहीं समझ सकते हैं और वे न्यायिक कार्यवाही के दौरान मूकदर्शक बने रहते हैं, जो उनके हितों के लिए उचित नहीं है।

🚩आम आदमी अदालत की कार्यवाही सहित दिन-प्रतिदिन के आधिकारिक कार्यों में अपनी भागीदारी चाहता हैं। यह भागीदारी वास्तविक नहीं हो पाता यदि वे दस्तावेजों में प्रयुक्त भाषा से परिचित नहीं होता है। हरियाणा में साक्षरता दर लगभग 80 प्रतिशत है, लेकिन उनमें से अधिकांश अंग्रेजी पढ़ना, बोलना या समझना नहीं जानते हैं। ऐसे में आम आदमी की शासन में भागीदारी की उम्मीद करना हास्यास्पद है। अदालत में एक आवेदन दाखिल करने के लिए, उन्हें मोटी रकम का भुगतान करने के बाद भी वकीलों के चक्‍कर काटने पड़ते हैं।
हिंदी के पक्ष में आम लोगों का तर्क यह है कि अगर हिंदी को कार्यालयों के कामकाज की भाषा बनाया जाता है तो वे अपने ही देश में पराया महसूस नहीं करेंगे।

🚩जिला अदालत, झज्जर (हरियाणा का एक जिला) में एक किसान और वादी रमेश ढाका ने अपना दर्द यूं बयां किया, "मैं टेन प्लस टू पास हूं, लेकिन अंग्रेजी समझ या पढ़ नहीं सकता। सभी समन, आवेदन, वकालतनामा अंग्रेजी में आते हैं जिन्हें मैं पढ़ नहीं पाता। उन्हें समझने के लिए मुझे या तो किसी वकील के पास जाना पड़ता है या गांव के किसी पढ़े-लिखे आदमी के पास। अगर ये हिंदी में होते तो मैं खुद इन्हें पढ़ लेता।"

🚩अगर हिंदी को न्यायालयों की भाषा बना दिया जाए तो इससे आम लोगों को काफी हद तक मदद मिल सकती है। अदालतों में अंग्रेजी भाषा के कारण हरियाणा राज्य में वादकारों कई मुश्‍किलों का सामना करना पड़ता है-

1. वे ‌शिकायतों या अन्य दस्तावेजों में क्या लिखा है, समझ नहीं पाते। उन्हें पूरी तरह से अपने वकीलों पर निर्भर रहना पड़ता है।

2. अदालती कार्यवाही के दौरान, वे यह समझ नहीं पाते कि रिकॉर्ड पर दर्ज सबूत उनके पक्ष में हैं या ख‌िलाफ हैं।

3. आपराधिक कार्यवाह‌ियों में सीआरपीसी की धारा 273 में, जहां अभियुक्त की उपस्थिति में साक्ष्य लिए जाने का प्रावधान है, निरर्थक हो जाता है, जब अभियुक्त यह नहीं समझ पाता कि उसके खिलाफ किस प्रकार के साक्ष्य दर्ज किए गए हैं।

4. अंग्रेजी भाषा न समझ पाने के कारण, वादकार, एक वकील के साथ पूरी तरह से भरोसे के आधार पर डील करने के लिए मजबूर हो जाता है। वो उन वकालतनामों या हलफनामों को पढ़ नहीं पाता, जिन्हें उसे वकील के निर्देशों के अनुसार साइन करना होता है। बार काउंसिल में पास वकीलों के कदाचार के कई मामले लंबित हैं।

5. वादियों के लिए तब और मुश्किल हो जाती है जब वकील कोर्ट रूम  में अंग्रेजी में बहस करते हैं। तब वादियों के पास मूक रहने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहता।

6. फैसले और आदेश की प्रतियां अंग्रेजी में होती हैं, इसलिए वे फैसले या आदेशों के तर्क या कारण को समझने में विफल रहते हैं। इसलिए भी उन्हें अधिवक्ताओं पर निर्भर रहना पड़ता है।

7. भाषा के कारण गवाह को भी परेशान होना पड़ता है, क्योंकि उनमें से अधिकांश अंग्रेजी नहीं जानते हैं।

8. हिंदी के दस्तावेज को रिकॉर्ड में लेने के लिए अंग्रेजी में अनुवाद किया जाता है। यदि सभी न्यायिक कार्यों के लिए हिंदी भाषा को अपनाया जाए तो यह कवायद नहीं करना पड़ेगी।

🚩जब अदालत में भाषाई परिवर्तन की चर्चा ह‌रियाणा के वकीलों से की तो तो अधिकांश ने हिंदी के पक्ष में राय दी और कहाकि उच्च न्यायालय में भी ऐसा होना चाहिए।
रोहतक जिला अदालत के एक वकील रोहताश मलिक ने कहा,
"चाहे जैसी भी दलील या कानूनी तर्क हम दे लें, हमे हाईकोर्ट के वकीलों से केवल इसलिए अलग रखा जाता है कि क्योंकि हम अंग्रेजी में बहस नहीं कर सकते। यह भाषा के आधार पर भेदभाव है और असंवैधानिक है।"

🚩कई ऐसे वकील हैं, जिन्होंने मुकदमेबाजी में लंबा समय दिया है, अंग्रेजी में अपना केस फ्रेम कर लेते हैं, काम करते-करते वो अंग्रेजी के साथ सहज हो चुके हैं।


🚩परेशानी युवा और नए वकीलों को आती है। उन्हें किसी मामले के कानूनी या तकनीकी को समझने से पहले मुकदमे/ कार्यवाही की भाषा को समझना पड़ता है। हालांकि, हरियाणा में अधिकांश लॉ कॉलेज अंग्रेजी माध्यम में एलएलबी की डिग्री प्रदान करते हैं, लेकिन लेक्चर और शिक्षक-छात्रों की बातचीत हिंदी में होती है। वे हिंदी के साथ अधिक सहज महसूस करते हैं। ऐसे कॉलेजों के छात्रों पर पर भी अंग्रेजी का अदृश्य दबाव देखा जा सकता है। यह दबाव हीन भावना को आमंत्रित करता है।

🚩एक और मुद्दा जो लेखक ने हिंदी माध्यम के वकीलों के साथ बात करते हुए पाया, वह उनके जज बनने का सपना होता है।
राजस्‍थान के हनुमानगढ़ के एक लोकल कॉलेज से 2017 में एलएलबी पास करने वाले ये बाते अनिल राणा का कहना है, "हम केवल मुकदमेबाजी करने के लिए एलएलबी करते हैं, हरियाणा न्यायिक सेवा की परीक्षा में बैठने के लिए शायद ही कोई विचार हमारे दिमाग में आता है, क्योंकि यह मुख्य रूप से अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के लिए आरक्षित है।"

🚩हरियाणा मुख्य रूप से हिंदी भाषी राज्य है, जिसकी 100% आबादी हिंदी बोलती या समझती है। संयुक्त राज्य अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने सही ही कहा था कि लोकतंत्र लोगों का है, लोगों के लिए और लोगों से है। लोकतंत्र कोई संस्था नहीं है, बल्कि यह संस्थानों के समूह का सुचारू कामकाज है।

🚩न्यायालय ऐसे संस्थानों में से एक हैं, जो समग्र रूप में किसी भी लोकतंत्र का बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हिस्सा है। यह समझना उचित होगा कि अदालतें लोगों के लिए होती हैं और लोग अदालतों के लिए नहीं होते हैं। न तो अदालतें वकीलों के लिए हैं और न ही न्यायाधीशों या मजिस्ट्रेटों के लिए। अदालतें समाज के हित में और जनता के लिए न्याय का माध्यम हैं। वकील और जज न्याय का माध्यम हो सकते हैं न कि खुद न्याय। इसलिए अदालतों के लिए, जनता का हित सर्वोच्च और सर्वोपरि होना चाहिए। 


🚩राष्ट्रपति कोविंद ने भी हाईकोर्ट के फैसलों को उस भाषा में समझने योग्य बनाए जाने की पैरवी की है, जिसे लोग जानते हैं। उन्होंने फैसलों की प्रमाणित अनुवादित प्रतियां जारी करने के लिए व्यवस्था बनाये जाने का भी सुझाव दिया था उन्होंने कहा था कि उच्च न्यायालय अंग्रेजी में निर्णय देते हैं लेकिन हमारे देश में विविध भाषाएं हैं। हो सकता है कि वादी अंग्रेजी भाषा में दिए गए निर्णय को अच्छे से नहीं समझ पाते हों।

🚩राष्ट्रपति ने कहा था कि ऐसी व्यवस्था विकसित किए जाने की जरूरत है जहां न्यायालयों द्वारा स्थानीय या क्षेत्रीय भाषाओं में निर्णयों की प्रमाणित अनुवादित प्रतियां 24 या 36 घण्टे में उपलब्ध कराई जाएं। आगे कहा कि यह महत्वूपर्ण है कि न केवल लोगों को न्याय मिले बल्कि निर्णयों को वादियों के लिए उस भाषा में समझने योग्य बनाया जाना चाहिए ।

🚩जनता की अब यही मांग है कि न्यायालय और सरकार कार्यलय में अंग्रेजी खत्म करके  राष्ट्र भाषा 
हिंदी में कार्य होना चाहिए।

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