Thursday, December 31, 2020

भारतीय सनातन संस्कृति सर्वोत्तम व महान क्यो है?

 पश्चिमी संस्कृति के क्रिसमस डे की जगह पूज्य संत श्री आशारामजी बापू की दिव्य सौगात 25 दिसंबर को तुलसी-पूजन दिवस के रूप में मनाना सर्वहितकारी है। 





क्रिसमस का उत्सव मनाने के लिए लोग शंकुधर वृक्ष काट कर घर लाते हैं और फिर सजाते हैं - ये वृक्ष पृथ्वी के उत्तरी पृष्ठ पर कार्बन डायोक्साईड को कम करने वाले सबसे कारगर जंगल बनाते हैं। जो शिक्षित, प्रगतिवादी समाजवर्ग हिंदुओं को दीवाली पर दिया जलाने पर global warming के उलाहने देता है उनका ध्यान इधर क्यों नही आकर्षित होता। कुछ लोग पेड़ काटने के बजाये प्लास्टिक के पेड़ ( क्रिसमस ट्री ) से भी अपना उत्सव मनाते हैं। पर वह भी वातावरण के लिए घातक है, इसके निस्तारण में तो बहुत रासायनिक प्रदूषण होता है।

दुर्बल निर्णय शक्ति के कारण हम पश्चिमी समाज का अनुसरण करने लगे। ये बुद्धिमानी नहीं है - इसमें पर्यावरण व समाज - दोनो की हानि अवश्यंभावी है। पश्चिम देशों की देखा-देखी भारत में भी 25 दिसंबर से 1 जनवरी तक क्रिसमस-उत्सव मनाया जाने लगा है जिसमें सभ्य-समाज भी दारू पीता है, मांस खाता है, डांस-पार्टी आदि के बहाने महिलाओं से छेड़खानी करता है। इन दिनों में आत्महत्या, महिलाओं से दुष्कर्म एवम् सड़क-दुर्घटनाएँ अत्यधिक घटित होती है। ऐसा सिर्फ यूरोप या अमेरिका में ही नही अब भारत में भी घटित होने लगा है।

सच पूछे तो इस त्यौहार का हमारी संस्कृति-समाज से कोई सरोकार नही है। ऊपर से यह हमारी स्वदेशी सभ्यता को भ्रष्ट करने वाला है। इसको मनाना माने आसुरी गुणों को बढ़ावा देना है। सनातन संस्कृति और अपने गौरवशाली इतिहास की सुरक्षा हेतु हमे इसको स्वीकारना नही चाहिए।

जहाँ एक ओर क्रिसमस मनाने के दुष्परिणाम सर्वविदित हैं तो दूसरी ओर तुलसी-निष्ठा से समाज उत्थान भी विदित है। तुलसी माता में निष्ठा धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष चारो दिलाने में सक्षम है। इसीलिए धर्म, समाज के उत्थान की दृष्टि से संत श्री आशारामजी बापू ने सन 2012 से 25 दिसम्बर को तुलसी-पूजन दिवस के रूप में मनाने का आवाह्न किया। इस पवित्र परंपरा से सभी भारतवासी लाभान्वित हो रहे हैं। परिवार सहित मनाने से बुद्धिबल, मनोबल , चारित्र्यबल और आरोग्यबल तो बढ़ता है पर मानसिक अवसाद, दुर्व्यसन, आत्महत्या आदि कुत्सित कर्म करने की रूचि भी चली जाती है।

सिर्फ भारत में ही नहीं विश्व के कई अन्य देशों में भी तुलसी को पूजनीय व शुभ मानते हैं और तुलसी की पूजा करते हैं। पूर्वकाल में ग्रीस के ईस्टर्न-चर्च नामक संप्रदाय में तुलसी की पूजा होती थी। तुलसी मानव जीवन की रक्षक व पोषक है। यह स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है - कई प्रकार के औषधीय गुण इसमें विद्यमान है। तुलसी का पूजन, सेवन व रोपण करने से अनेक प्रकार के लाभ होते हैं। भगवान विष्णु ने स्वयं तुलसी को सर्व-पूज्या होने का वरदान दिया है। तुलसी प्रदूषित वायु को शुद्ध कर पर्यावरण की सुरक्षा करती है ।  पूरे भारतवर्ष में तुलसी का पौधा सुलभ और सुप्रसिद्ध है। अधिकांश हिंदू अपने घरों में तुलसी का रोपण करते हैं और बहुत पवित्रता से इसकी पूजा कर भगवान श्री हरि की कृपा प्राप्त करते हैं। जो भी जन समुदाय सत्संग और सेवा कार्यों मे जुड़े हैं उनके घरों में प्रायः संध्या के समय तुलसी की पूजा होती है।

क्रिसमस डे जैसे त्योहार के नाम पर शराब-कबाब के जश्न, मांस-भक्षण, धूम्रपान और नशे आदि करना हमें कतई शोभा नही देता। भारतीय संस्कृति व सभ्यता का दमन करने वाली संस्कृति का अनुसरण हमे नही करना है। ऐसा करना ऋषि-मुनियों की संतानों को ग्लानि से भर देता है। अतः 25 दिसंबर को तुलसी-पूजन दिवस मनाकर देश में जागृति लाएं। अपने परिवार, पड़ोस व समाज को ऊँचा उठायें - विश्व पटल पर भारतवर्ष का गौरव बढ़ाएँ।

आईये 25 दिसम्बर को तुलसी पूजन दिवस मनाएं।

बसन्त कुमार मानिकपुरी
पाली, जिला -कोरबा
छत्तीसगढ़, भारत

अंग्रेजों वाला 1 जनवरी नववर्ष मना रहे हैं तो पढ़ लीजिये सच्चाई क्या है?

31 दिसंबर 2020


देश में स्वराज्य की मांग जोर पकड रही थी। अंग्रेज भयभीत थे, इसलिए उन्होंने नया साल 1930 संयुक्त प्रांत की हर सामाजिक एवं धार्मिक संस्था से मनाने का आदेश जारी किया और साथ ही यह भी धमकी दी कि जो संस्था यह नया साल नहीं मनाएगी उसके सदस्यों को जेल भेज दिया जाएगा।




आपको बता दें कि सृष्टि का जिस दिन निर्माण हुआ था उस दिन ही चैत्री शुक्लपक्ष प्रतिपदा थी और सनातन हिंदू धर्म में इसी दिन को नूतन वर्ष मनाया जाता है लेकिन 700 साल मुग़लों और 200 साल अंग्रेजों के गुलाम रहे जिसके कारण हम अपना नूतन वर्ष भूल गए और अंग्रेजों के नूतन वर्ष मनाने लगे, अंग्रेज गये 70 साल से ऊपर हो गए लेकिन उनकी शिक्षा की पढ़ाई करने के कारण मानसिक गुलामी अभी नहीं गई जिसके कारण अपना नूतन वर्ष हमें याद भी नहीं आता है।

जो भारतीय नूतन वर्ष भूल गए हैं और अंग्रेजों वाला नया वर्ष मना रहे हैं उनके लिए कवि ने अपनी व्यथा प्रकट करते हुए एक कविता लिखी है आप भी पढ़ लीजिये...।

ना सुंदर फूल खिलते हैं, ना वातावरण में महकते हैं।
प्रकृति भी निस्तेज सी लगती, ना ही पक्षी चकहते हैं।।

01 जनवरी नववर्ष से हमें क्या मतलब, क्यों मनाये हम हर्ष।
हम हैं सनातन संस्कृति परंपरा से, हम क्यों मनाएं ईसाई नववर्ष।।

सबसे पहले ईसाई नववर्ष, जूलियस सीजर ने मनवाया।
अंग्रेज़ों ने भारत में आकर, इस परंपरा को और चमकाया।।

सनातन संस्कृति से ईसाई नववर्ष का, कोई सरोकार नहीं है।
क्यों हो पाश्चात्य संस्कृति के पीछे अंधे, ये हमारे संस्कार नहीं हैं।।

क्यों हो व्यसनों की तरफ आकर्षित, क्यों पीएं शराब, बियर।
क्यों करें अपना नैतिक पतन, क्यों बोलें हैप्पी न्यू ईयर।।

ईसाई देशों में खूब बम पटाखे फोड़ेंगे, मीडिया वाले कुछ नहीं कहेंगे।
होली दीवाली में प्रदूषण देखने वाले, देखना इस पर मौन रहेंगे।।

वास्तव में ये नववर्ष नहीं है, ये है सनातन संस्कृति पर प्रहार।
समय की मांग है एकत्र हो, करो ईसाई नववर्ष का बहिष्कार।।

चैत्र मास शुक्लपक्ष प्रतिपदा को, चलो हम नववर्ष मनाएं।
रंगोली बनाएं, दीप जलाएं, घर घर भगवा पताका फहराए।। - कवि सुरेन्द्र भाई

इस कविता के माध्यम से हमें समझना चाहिए कि अंग्रेजो के द्वारा थोपा गया नूतन वर्ष हमारा सांस्कृतिक, शारिरिक, मानसिक और सामाजिक पतन करता है जो राष्ट्र के लिए भी हानि करता है इसलिए हमें ऐसे त्यौहार से बचना चाहिए और अपने आसपास ऐसा कोई गलती से नया साल मना रहा हो तो उसको भी समझाइये कि भाई ये हमारा त्यौहार नहीं है हमारी संस्कृति सबसे महान है और वे नूतन वर्ष चैत्री शुक्लपक्ष प्रतिपदा को आएगा उस दिन हम सभी मिलकर धूमधाम से मनायेंगे।

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Wednesday, December 30, 2020

पादरी ने 22 हजार हिंदुओं की हत्या की थी, 1 जनवरी को हैप्पी न्यू ईयर बोलने वाले जान ले इतिहास

30 दिसंबर 2020


ईसाईयत और इस्लाम ये दो पंथ ऐसे हैं जिनका जन्म भारत के बाहर हुआ है । ईसाई लोग भारत में आए लगभग दूसरी शताब्दी में । तब यहां का राजा हिन्दू था, प्रजा हिन्दू थी और व्यवस्था भी हिन्दू थी । फिर भी इन ईसाईयों को केरल के राजा ने, प्रजा ने आश्रय दिया, चर्च बनाने के लिए जमीन उपलब्ध कराई, धर्म पालन और धर्म प्रचार की अनुमति प्रदान की । इस कारण आज केरल में ईसाईयों की संख्या 20 प्रतिशत से अधिक है । उसी प्रकार जब भारत में अंग्रेजी राज कायम हुआ तब से यहां के हिन्दुओं को ईसाई बनाने का काम चल रहा है ।




हिन्दू समाज के इस मतान्तरण के खिलाफ राजा राममोहन रॉय, स्वामी दयानंद, स्वामी श्रद्धानंद से लेकर महात्मा गांधी, डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार आदि महानुभावों ने चिंता जताई है । भारत सरकार ने मध्य प्रदेश, उड़ीसा, अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों ने धर्मान्तरण विरोधी कानून बनाए हैं, फिर भी ईसाई मिशनरियों द्वारा नए-नए तरीके खोज कर गरीब, पिछड़े, झुग्गियों में रहनेवाले हिन्दू लोगों के धर्म परिवर्तन का काम धड़ल्ले से चलता है ।

ईसाईयत का यह इतिहास क्रूरता, हिंसा, धर्मविरोधी आचरण एवं असहिष्णुता से भरा पड़ा है। गोवा के अन्दर ईसाई मिशनरी फ्रांसिस जेवियर, जिसके शव का निर्लज्ज प्रदर्शन अभी भी गोवा के चर्च के भीतर हो रहा है, ने गोवा के हिन्दू लोगों पर क्रूरतापूर्ण तरीके अपनाकर अत्याचार किए और गैर-ईसाईयों को ईसाई बनाया । ए.के. प्रियोलकर द्वारा लिखित ‘Goa Inquisition’ नामक पुस्तक में इसका विस्तार से वर्णन किया है । भोले-भाले वनवासी, गिरिवासी और गरीब लोगों को झांसा देकर ईसाई बनाना इन मिशनरियों का मुख्य धंधा है।

पोप जॉन पोल जब 1999 में भारत आए थे तब उन्होंने भारत के ईसाइयों को आह्वान किया था कि जिस प्रकार शुरुआत के ईसाई पादरियों, संत फ्रांसिस जेवियर, रॉबर्ट दी नोबिलि, आदि जैसे उनके पूर्वजों ने प्रथम सहस्राब्दी में समूचा यूरोप, दूसरे में अफ्रीका और अमेरिका को ईसाई बनाया, उसी प्रकार तीसरी सहस्राब्दी में एशिया में ईसा मसीह के क्रॉस को मजबूत उनका उद्देश्य है, ताकि दुनिया में ईसाईयत का साम्राज्य कायम हो सके । पोप के आदेश का पालन करने के लिए तत्पर ईसाई मिशनरी तुरंत इस काम को अंजाम देने में लगे हैं और भले-बुरे सभी उपायों का अवलम्बन कर हिन्दू समाज को तोड़ने के षड्यंत्र में लगे हैं।

सम्पूर्ण विश्व को ईसाईयत के झंडे के नीचे लाने की योजना के तहत फ्रांसिस जेवियर ने भारत में जो काले कारनामे किये थे, उस इतिहास के एक क्रूर अध्याय को जानने के लिए आपके लिए प्रस्तुत है ।

500 साल पहले गोवा में कुमुद राजा का शासन चलता था । राजा कुमुद को जबरदस्ती से हटा कर पोर्तुगीज ने गोवा को अपने कब्जे में कर दिया ।

पुर्तगाल सेना के साथ केथलिक पादरी ने भी धर्मान्तरण करने के लिए बड़ी संख्या में हमला किया। हर गाँव में लोगो को धमकी और जबरन ईसाई बनाते पादरी ने गोवा के पूरे शहर पर कब्जा किया । जो लोग चलने के लिए तैयार नहीं होते उनको क्रूरता से मार दिया जाता ।

जैनधर्मी राजा कुमुद और गोवा के सारे 22 हजार जैनों को भी धर्म परिवर्तन करने के लिए ईसाईयों ने धमकी दे दी कि 6 महीनों में जैन धर्म छोड़ कर ईसाई धर्म स्वीकार कर दो अथवा मरने के लिए तैयार हो जाओ राजा कुमुद एवं और भी जैन मरने के लिए तैयार थे परंतु धर्म परिवर्तन के लिए हरगिज राजी नहीं थे ।

छः महीने के दौरान ईसाई जेवियर्स ने जैनों का धर्म परिवर्तन करने के लिए साम-दाम, दंड-भेद जैसे सभी प्रयत्न कर देखे । तब भी एक भी जैन ईसाई बनने के लिए तैयार नहीं हुआ। तब क्रूर जेवियर्स पोर्तुगीझ लश्कर को सभी का कत्ल करने के लिए सूचित किया। एक बड़े मैदान में राजा कुमुद और जसिं धर्मी श्रोताओं, बालक-बालिकाओं को बांध कर खड़ा कर दिया गया। एक के बाद एक को निर्दयता से कत्ल करना शुरू किया । ईसाई जेवियर्स हँसते मुख से संहारलीला देख रहा था । ईसाई बनने के लिए तैयार न होनेवालों के ये हाल होंगे। यह संदेश जगत को देने की इच्छा थी। बदले की प्रवृति को वेग देने के लिए ऐसी क्रूर हिंसा की होली जलाई थी।

केथलिक ईसाई धर्म के मुख्य पॉप पोल ने ईसाई पादरी जेवियर्स के बदले के कार्य की प्रशंसा की और उसके लिए उसने बहाई हुई खून की नदियों के समाचार मिलते पॉप की खुशी की सीमा नहीं रही । जेवियर्स को विविध इलाक़ा देकर सम्मान किया। जेवियर्स को सेंट जेवियर्स के नाम से घोषित किया और भारत में शुरू हुई अंग्रेजी स्कूल और कॉलेजों की श्रेणी में सेंट जेवियर्स का नाम जोड़ने में आया। आज भारत में सबसे बड़ा स्कूल नेटवर्क में सेंट जेवियर्स है।

हजारों जैनों और हिंदुओं के खून से पूर्ण एक क्रूर ईसाई पादरी के नाम से चल रही स्कूल में लोग तत्परता से डोनेशन की बड़ी रकम दे कर अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेज रहें है। कैसे करुणता है और जेवियर्स कि बदले की वृत्ति को पूर्ण समर्थन दे रहे पुर्तगालियों को पॉप ने पूरे एशिया खंड के बदले की वृत्ति के सारे हक दे दिए। धर्म परिवर्तन प्राण की बलि देकर भी नहीं करने वाले गोवा के राजा कुमुद और बाईस हजार धर्मनिष्ठ जैनों का ये इतिहास जानने के बाद हमें इससे बोध पाठ लेना चाहिए। आज की रहन-सहन में पश्चिमीकरण ईसाईकरण का प्रभाव बढ़ रहा है। भारत की तिथि-मास भूलते जा रहें है। अंग्रेजी तारीख पर ही व्यवहार बढ़ रहा है। भारतीय पहेरवेश घटता जा रहा है ।पश्चिमीकरण की दीमक हमें अंदर से कमज़ोर कर रही है। धर्म और संस्कृति रक्षा के लिए फनाहगिरी संभाले ।
स्त्रोत : ह्रदय परिवर्तन पत्रिका, दिसम्बर 2017

हिंदुस्तानी ईसाइयत का 1 जनवरी नुतन वर्ष मनाने लग गए, बधाई देने लग गए पहले उनको यह इतिहास पढ़ना चाहिए कि पादरियों ने कैसा अत्याचार किया है हिंदुओं पर सही इतिहास पढेंगे तो पता चलेगा कि भारतीय खुद का नुतन वर्ष सृष्टि रचना की तिथि चैत्री शुक्लपक्ष प्रतिपदा भूल गए। हमें इस दिन न बधाई देना है और न ही लेना है कोई देता है तो उसको समझाना है कि अपना नुतन वर्ष चैत्री शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को हैं।

जनता की मांग है कि सरकार भी ईसाई मिशनरियां और धर्मान्तरण पर रोक लगाएं और हिंदुस्तानियों को कॉन्वेंट स्कूल में बच्चों को नहीं पढ़ना चाहिए और न ही धर्मपरिवर्तन करना चाहिए तभी देश, समाज सुरक्षित रहेगा।

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Tuesday, December 29, 2020

भयानक रिपोर्ट : 1 जनवरी को नववर्ष मनाने वाले सावधान हो जाएं

29 दिसंबर 2020


भारत की इतनी दिव्य और महान संस्कृति है कि इसका अनुसरण करने वाला बिना किसी वस्तु, व्यक्ति के यहां तक कि विपरीत परिस्थितियों में भी सुखी रह सकता है, इसके विपरीत विदेशों में भोग सामग्री होते हुए भी वहां के लोग इतने दुःखी व चिंतित हैं कि वहां के आंकड़े देखकर दंग रह जाएंगे आप लोग !!




फिर भी भारत का एक बड़ा वर्ग उनका अंधानुकरण कर, उनका नववर्ष मनाने लगा  और भूल गया अपनी संस्कृति को ।

एक सर्वे के अनुसार...

ईसाई नववर्ष पर तीन गुनी हुई एल्कोहल की खपत:-

वाणिज्य एवं उद्योग मंडल ( एसोचेम - ASSOCHAM ) के क्रिसमस और ईसाई नववर्ष पर एल्कोहल पर खपत किये गये सर्वेक्षण में यह निष्कर्ष सामने आया है कि इन अवसरों पर 14 से 19 वर्ष के किशोर भी शराब व मादक पदार्थों का जमकर सेवन करते हैं और यही कारण है कि इस दौरान शराब की खपत तीन गुनी बढ़ जाती है।

इन दिनों में दूसरे मादक पेय पदार्थों की भी खपत बढ़ जाती है । बड़ों के अलावा छोटी उम्रवाले भी बड़ी संख्या में इनका सेवन करते हैं । इससे किशोर-किशोरियों, कोमल वय के लड़के-लड़कियों को शारीरिक नुकसान तो होता ही है, उनका व्यवहार भी बदल जाता है और हरकतें भी जोखिमपूर्ण हो जाती हैं । उसका परिणाम कई बार एचआईवी संक्रमण (एड्स रोग) के तौर पर सामने आता है तो कइयों को टी.बी., लीवर की बीमारी, अल्सर और गले का कैंसर जैसे कई असाध्य रोग भी पैदा हो जाते हैं । करीब 70 प्रतिशत किशोर फेयरवेल पार्टी, क्रिसमस एवं ईसाई नूतन वर्ष पार्टी, वेलेंटाइन डे और बर्थ डे जैसे अवसरों पर शराब का सेवन करते हैं । एक अन्य सर्वेक्षण के अनुसार भारत में कुल सड़क दुर्घटनाओं में से 40 प्रतिशत शराब के कारण होती हैं ।

सूत्रों का कहना है कि क्रिसमस (25 दिसम्बर से 1 जनवरी ) के दिनों में शराब आदि नशीले पदार्थों का सेवन, युवाधन की तबाही व आत्महत्याएँ खूब होती हैं ।

भारत से 10 गुणा ज्यादा दवाईयां खर्च होती हैं ।

पाश्चात्य संस्कृति और त्यौहार का अनुसरण करने पर यूरोप, अमेरिका आदि देशों में मानसिक रोग इतने बढ़ गए हैं कि हर दस व्यक्ति में से एक को मानसिक रोग होता है । दुर्वासनाएँ इतनी बढ़ी हैं कि हर छः सेकंड में एक बलात्कार होता है और हर वर्ष लगभग 20 लाख से अधिक कन्याएँ विवाह के पूर्व ही गर्भवती हो जाती हैं । वहाँ पर 65% शादियाँ तलाक में बदल जाती हैं । AIDS की बीमारी दिन दुगनी रात चौगुनी फैलती जा रही है | वहाँ के पारिवारिक व सामाजिक जीवन में क्रोध, कलह, असंतोष, संताप, उच्छृंखता, उद्यंडता और शत्रुता का महा भयानक वातावरण छाया रहता है ।

विश्व की लगभग 4% जनसंख्या अमेरिका में है । उसके उपभोग के लिये विश्व की लगभग 40% साधन-सामग्री (जैसे कि कार, टी वी, वातानुकूलित मकान आदि) मौजूद हैं फिर भी वहाँ अपराधवृति इतनी बढ़ी है कि हर 10 सेकण्ड में एक सेंधमारी होती है, 1 लाख व्यक्तियों में से 425 व्यक्ति कारागार में सजा भोग रहे हैं । इन सबका मुख्य कारण दिव्य संस्कारों की कमी है ।

31 दिसम्बर की रात नए साल के स्वागत के लिए लोग जमकर दारू पीते हैं । हंगामा करते हैं, महिलाओं से छेड़खानी करते हैं, रात को दारू पीकर गाड़ी चलाने से दुर्घटना की सम्भावना, रेप जैसी वारदात, पुलिस व प्रशासन बेहाल और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का विनाश होता है और 1 जनवरी से आरंभ हुई ये घटनाएं सालभर में बढ़ती ही रहती हैं ।

जबकि भारतीय नववर्ष नवरात्रों के व्रत से शुरू होता है ।घर-घर में माता रानी की पूजा होती है । शुद्ध सात्विक वातावरण बनता है । चैत्र प्रतिपदा के दिन से महाराज विक्रमादित्य द्वारा विक्रमी संवत् की शुरुआत, भगवान झूलेलाल का जन्म, नवरात्रे प्रारंम्भ, ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि की रचना इत्यादि का संबंध है ।

भोगी देश का अन्धानुकरण न करके युवा पीढ़ी भारत देश की महान संस्कृति को पहचाने ।

1 जनवरी में सिर्फ नया कलैण्डर आता है, लेकिन चैत्र में नया पंचांग आता है उसी से सभी भारतीय पर्व ,विवाह और अन्य मुहूर्त देखे जाते हैं । इसके बिना हिन्दू समाज जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता इतना महत्वपूर्ण है ये कैलेंडर यानि पंचांग ।

स्वयं सोचें कि क्यों मनाएं एक जनवरी को नया वर्ष..???

केवल कैलेंडर बदलें अपनी संस्कृति नहीं...!!!

रावण रूपी पाश्‍चात्य संस्कृति के आक्रमणों को नष्ट कर चैत्र प्रतिपदा के दिन नववर्ष का विजयध्वज अपने घरों व मंदिरों पर फहराएं ।

अंग्रेजी गुलामी तजकर ,अमर स्वाभिमान भर लें भारतवासी । हिन्दू नववर्ष मनाकर खुद में आत्मसम्मान भर लें भारतवासी ।।

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Monday, December 28, 2020

अंग्रेजों का नया साल 1 जनवरी मना रहे हैं तो सावधान, होती है भयंकर हानि

28 दिसंबर 2020


आजकल, 31 दिसंबर की रात्रि में छोटे बालकों से वृद्ध तक सभी एक-दूसरे को शुभकामना संदेश-पत्र अथवा प्रत्यक्ष मिलकर हैप्पी न्यू इयर कहते हुए नववर्ष की शुभकामनाएं देते हैं ।




वास्तविक, भारतीय संस्कृति के अनुसार चैत्र-प्रतिपदा(गुड़ीपाडवा) ही हिंदुओं का नववर्ष दिन है । किंतु, आज के हिंदु 31 दिसंबर की रात्रि में नववर्ष दिन मनाकर अपने आपको धन्य मानने लगे हैं । आजकल, भारतीय वर्षारंभ दिन चैत्र प्रतिपदा पर एक-दूसरे को शुभकामनाएं देनेवाले हिंदुओं के दर्शन भी दुर्लभ हो गए हैं ।

चैत्री नूतन वर्ष के फायदें और 31 दिसंबर के नुकसान

हिंदु धर्म के अनुसार शुभ कार्य का आरंभ ब्रह्ममुहूर्त में उठकर, स्नानादि शुद्धिकर्म के पश्‍चात, स्वच्छ वस्त्र एवं अलंकार धारण कर, धार्मिक विधि-विधान से करना चाहिए । इससे व्यक्ति पर वातावरण की सात्विकता का संस्कार होता है ।

31 दिसंबर की रात्रि में किया जानेवाला मद्यपान एवं नाच-गाना, भोगवादी वृत्ति का परिचायक है । इससे हमारा मन भोगी बनेगा । इसी प्रकार, रात्रि का वातावरण तामसिक होने से हमारे भीतर तमोगुण बढ़ेगा । इन बातों का ज्ञान न होने के कारण, अर्थात धर्मशिक्षा न मिलने के कारण, ऐसे दुराचारों में रुचि लेने वाली आज की युवा पीढी भोगवादी एवं विलासी बनती जा रही है । इस संबंध में इनके अभिभावक भी आनेवाले संकट से अनभिज्ञ दिखाई देते हैं ।

ऋण उठाकर 31 दिसंबर मनाते हैं

प्रतिवर्ष दिसंबर माह आरंभ होने पर, मराठी तथा स्वयं भारतीय संस्कृति का झूठा अभिमान अनुभव करने वाले परिवारों में चर्चा आरंभ होती है, `हमारे बच्चे अंग्रेजी माध्यम में पढते हैं । 'क्रिसमस’ कैसे मनाना है, यह उन्हें पाठशाला में पढ़ाते हैं, अत: हमारे घर ‘ना ताल’ का त्यौहार मनाना ही पड़ता है, आदि।’ तत्पश्चात वे क्रिसमस ट्री, सजाने का साहित्य, बच्चों को सांताक्लॉज की टोपी, सफेद दाढ़ी मूंछें, विक, मुखौटा, लाल लंबा कोट, घंटा आदि वस्तुएं ऋण उठाकर खरीदते हैं । गोवा में एक प्रसिद्ध आस्थापन ने 25 फीट के अनेक क्रिसमस ट्री प्रत्येक को 1 लाख 50 हजार रुपयों में खरीदे हैं । ये सब करनेवालों को एक ही बात बताने की इच्छा है, कि ऐसा कर हम एक प्रकार से धर्मांतर ही कर रहे हैं । कोई भी तीज-त्यौहार, व्यक्ति को आध्यात्मिक लाभ हो, इस उद्देश्य से मनाया जाता है ! हिंदू धर्म के हर तीज-त्यौहार से उन्हें मनानेवाले, आचार-विचार तथा कृत्यों में कैसे उन्नत होंगे, यही विचार हमारे ऋषि-मुनियों ने किया है । अत: ईश्वरीय चैतन्य, शक्ति एवं आनंद देनेवाले `गुड़ीपाडवा’ के दिन ही नववर्ष का स्वागत करना शुभ एवं हितकारी है ।

अनैतिक तथा कानून द्रोही कृत्य कर नववर्ष का स्वागत !

वर्तमान में पाश्चात्त्य प्रथाओं के बढ़ते अंधानुकरण से तथा उनके नियंत्रण में जाने से अपने भारत में भी नववर्ष ‘गुड़ीपाडवा’ की अपेक्षा बडी मात्रा में 31 दिसंबर की रात 12 बजे मनाने की कुप्रथा बढ़ने लगी है । वास्तव में रात के 12 बजे ना रात समाप्त होती है, ना दिन का आरंभ होता है । अत: नववर्ष भी कैसे आरंभ होगा ? इस समय केवल अंधेरा एवं रज-तम का राज होता है । इस रात को युवकों का मदिरापान, नशीले पदार्थों का सेवन करने की मात्रा में बढोतरी हुई है । युवक-युवतियों का स्वेच्छाचारी आचरण बढ़ा है । तथा मदिरापान कर तेज सवारी चलाने से दुर्घटनाओं में बढोतरी हुई है । कुछ स्थानों पर भार नियमन रहते हुए बिजली की झांकी सजाई जाती है, रातभर बड़ी आवाज में पटाखे जलाकर प्रदूषण बढ़ाया जाता है, तथा कर्ण कर्कश ध्वनिवर्धक लगाकर उनके तालपर अश्लील पद्धति से हाथ-पांव हिलाकर नाच किया जाता है, गंदी गालियां दी जाती हैं तथा लडकियों को छेडने की घटना बढकर कानून एवं सुव्यवस्था के संदर्भ में गंभीर समस्या उत्पन्न होती है । नववर्ष के अवसर पर आरंभ हुई ये घटनाएं सालभर में बढती ही रहती हैं ! इस ख्रिस्ती नए वर्ष ने युवा पीढ़ी को विलासवाद तथा भोगवाद की खाई में धकेल दिया है ।

राष्ट्र तथा धर्म प्रेमियो, इन कुप्रथाओं को रोकने हेतु आपको ही आगे आने की आवश्यकता है !

31 दिसंबर को होने वाले अपकारों के कारण अनेक नागरिक, स्त्रियों तथा लडकियों का घर से बाहर निकलना असंभव हो जाता है । राष्ट्र की युवा पीढी ध्वस्त होने के मार्ग पर है । इसका महत्त्व जानकर हिंदू जनजागृति समिति इस विषय में जनजागृति कर पुलिस एवं प्रशासन की सहायता से उपक्रम चला रही है । ये गैरप्रकार रोकने हेतु 31 दिसंबर की रात को प्रमुख तीर्थक्षेत्र, पर्यटनस्थल, गढ-किलों जैसे ऐतिहासिक तथा सार्वजनिक स्थान पर मदिरापान-धूम्रपान करना तथा प्रीतिभोज पर प्रतिबंध लगाना आवश्यक है । पुलिस की ओर से गश्तीदल नियुक्त करना, अपकार करनेवाले युवकों को नियंत्रण में लेना, तेज सवारी चलाने वालों पर तुरंत कार्यवाही करना, पटाखों से होनेवाले प्रदूषण के विषय में जनता को जागृत करना, ऐसी कुछ उपाय योजना करने पर इन अपकारों पर निश्चित ही रोक लगेगी । आप भी आगे आकर ये गैरप्रकार रोकने हेतु प्रयास करें । ध्यान रखें, 31 दिसंबर मनाने से आपको उसमें से कुछ भी लाभ तो होता ही नहीं, किंतु सारे ही स्तरों पर, विशेष रूप से अध्यात्मिक स्तर पर बड़ी हानि होती है ।

हिंदू जनजागृति समिति के प्रयासों की सहायता करें !

नए वर्ष का आरंभ मंगलदायी हो, इस हेतु शास्त्र समझकर भारतीय संस्कृतिनुसार ‘चैत्र शुद्ध प्रतिपदा’, अर्थात ‘गुड़ीपाडवा’ को नववर्षारंभ मनाना नैसर्गिक, ऐतिहासिक तथा अध्यात्मिक दृष्टि से सुविधाजनक तथा लाभदायक है । अत: पाश्चात्त्य विकृति का अंधानुकरण करने से होनेवाला भारतीय संस्कृति का अधःपतन रोकना, हम सबका ही आद्यकर्तव्य है । राष्ट्राभिमान का पोषण करने तथा गैरप्रकार रोकने हेतु हिंदू जनजागृति समिति की ओर से आयोजित उपक्रम को जनता से सहयोग की अपेक्षा है । भारतीयो, गैरप्रकार, अनैतिक तथा धर्मद्रोही कृत्य कर नए वर्ष का स्वागत न करें, यह आपसे विनम्र विनती ! – श्री. शिवाजी वटकर, समन्वयक, हिंदू जनजागृति समिति, मुंबई-ठाणे-रायगढ ।

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Sunday, December 27, 2020

दलित और मुस्लिम एकता की जमीनी हकीकत कितनी है?

27 दिसंबर 2020

  
आजकल देश में दलित राजनीति की चर्चा जोरों पर है।  इसका मुख्य कारण नेताओं द्वारा दलितों का हित करना नहीं अपितु उन्हें एक वोट बैंक के रूप में देखना हैं। इसीलिए हर राजनीतिक पार्टी दलितों को लुभाने की कोशिश करती दिखती है। अपने आपको सेक्युलर कहलाने वाले कुछ नेताओं ने एक नया जुमला उछाला है। यह जुमला है दलित मुस्लिम एकता। इन नेताओं ने यह सोचा कि दलितों और मुस्लिमों के वोट बैंक को संयुक्त कर दे तो 35 से 50 प्रतिशत वोट बैंक आसानी से बन जायेगा और उनकी जीत सुनिश्चित हो जाएगी। जबकि सत्य विपरीत है। दलितों और मुस्लिमों का वोट बैंक बनना असंभव हैं। क्योंकि जमीनी स्तर पर दलित हिन्दू समाज सदियों से मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा प्रताड़ित होता आया है।




1. मुसलमानों ने दलितों को मैला ढोने के लिए बाध्य किया

भारत देश में मैला ढोने की कुप्रथा कभी नहीं थी। मुस्लिम समाज में बुर्के का प्रचलन था। इसलिए घरों से शौच उठाने के लिए हिंदुओं विशेष रूप से दलितों को मैला ढोने के लिए बाधित किया गया। जो इस्लाम स्वीकार कर लेता था। वह इस अत्याचार से छूट जाता था। धर्म स्वाभिमानी दलित हिंदुओं ने अमानवीय अत्याचार के रूप में मैला ढोना स्वीकार किया। मगर अपने पूर्वजों का धर्म नहीं छोड़ा। इनमें अनेक हिन्दू राजपूत भी थे। फिर भी अनेक दलित प्रलोभन और दबाव के चलते मुसलमान बन गए।
(सन्दर्भ- स्वामी श्रद्धानंद जी का लेख, उर्दू तेज़ समाचारपत्र, पृष्ठ 5, 5 मई 1924 )

2. इस्लाम स्वीकार करने के बाद भी दलितों को बराबरी का दर्जा नहीं मिला।

दलितों को  इस्लाम स्वीकार करने के बाद भी बराबरी का दर्जा नहीं मिला। इसका मुख्य कारण इस्लामिक भेदभाव था। डॉ. अम्बेडकर इस्लाम में प्रचलित जातिवाद से भली प्रकार से परिचित थे। वे जानते थे कि मुस्लिम समाज में अरब में पैदा हुए मुस्लिम (शुद्ध रक्त वाले) अपने आपको उच्च समझते है और धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बने भारतीय दूसरे दर्जे के माने जाते हैं। अपनी पुस्तक पाकिस्तान और भारत के विभाजन, अम्बेडकर वांग्मय खंड 15 में उन्होंने स्पष्ट लिखा है-

१. ‘अशरफ’ अथवा उच्च वर्ग के मुसलमान (प) सैयद, (पप) शेख, (पपप) पठान, (पअ) मुगल, (अ) मलिक और (अप) मिर्ज़ा।

२. ‘अज़लफ’ अथवा निम्न वर्ग के मुसलमान इसलिए जो दलित मुस्लिम बन गए वे दूसरे दर्जे के ‘अज़लफ’ मुस्लिम कहलाये। उच्च जाति वाले  ‘अशरफ’ मुस्लिम नीच जाति वाले  ‘अज़लफ’ मुसलमानों से रोटी-बेटी का रिश्ता नहीं रखते। ऊपर से शिया-सुन्नी, देवबंदी-बरेलवी के झगड़ों का मतभेद। सत्य यह है कि इस्लाम में समानता और सदभाव की बात करने और जमीनी सच्चाई एक दूसरे के विपरीत थी। इसे हम हिंदी की प्रसिद्द कहावत चौबे जी गए थे छबे जी बनने दुबे जी बन कर रह गए से भली भांति समझ सकते है।

3. दलित समाज में मुसलमानों के विरुद्ध प्रतिक्रिया

दलितों ने देखा कि इस्लाम के प्रचार के नाम पर मुस्लिम मौलवी दलित बस्तियों में प्रचार के बहाने आते और दलित हिन्दू युवक-युवतियों को बहकाने का कार्य करते। दलित युवकों को बहकाकर उन्हें गोमांस खिला कर अपभ्रष्ट कर देते थे और दलित लड़कियों को भगाकर उन्हें किसी की तीसरी या चौथी बीवी बना डालते थे। दलित समाज के होशियार चौधरियों ने इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए एक व्यावहारिक युक्ति निकाली। उन्होंने प्रतिक्रिया रूप से दलितों ने सूअरों को पालना शुरू कर दिया था। एक सुअरी के अनेक बच्चे एक बार में जन्मते। थोड़े समय में पूरी दलित बस्ती में सूअर ही सूअर दिखने लगे। सूअरों से मुस्लिम मौलवियों को विशेष चिढ़ थी। सूअर देखकर मुस्लिम मौलवी दलितों की बस्तियों में इस्लाम के प्रचार करने से हिचकते थे। यह एक प्रकार का सामाजिक बहिष्कार रूपी प्रतिरोध था। पाठक समझ सकते है कैसे सूअरों के माध्यम से दलितों ने अपनी धर्मरक्षा की थी। उनके इस कदम से उनकी बस्तियां मलिन और बीमारियों का घर बन गई। मगर उन्हें मौलवियों से छुटकारा मिल गया।

4. दलित हिंदुओं का सवर्ण हिंदुओं के साथ मिलकर संघर्ष
 
जैसे सवर्ण हिन्दू समाज मुसलमानों के अत्याचारों से आतंकित था वैसे ही हिन्दू दलित भी उनके अत्याचारों से पूरी तरह आतंकित था। यही कारण था जब जब हिंदुओं ने किसी मुस्लिम हमलावर के विरोध में सेना को एकत्र किया। तब तब सवर्ण एवं दलित दोनों हिंदुओं ने बिना किसी भेदभाव के एक साथ मिलकर उनका प्रतिवाद किया। मैं यहाँ पर एक प्रेरणादायक घटना को उदहारण देना चाहता हूँ। तैमूर लंग ने जब भारत देश पर हमला किया तो उसने क्रूरता और अत्याचार की कोई सीमा नहीं थी। तैमूर लंग के अत्याचारों से पीड़ित हिन्दू जनता ने संगठित होकर उसका सामना करने का निश्चय किया। खाप नेता धर्मपालदेव के नेतृत्व में पंचायती सेना को एकत्र किया गया। इस सेना के दो उपप्रधान सेनापति थे। इस सेना के सेनापति जोगराजसिंह नियुक्त हुए थे जबकि उपप्रधान सेनापति - (1) धूला भंगी (बालमीकी) (2) हरबीर गुलिया जाट चुने गये। धूला भंगी जि० हिसार के हांसी गांव (हिसार के निकट) का निवासी था। यह महाबलवान्, निर्भय योद्धा, गोरीला (छापामार) युद्ध का महान् विजयी धाड़ी  था। जिसका वजन 53 धड़ी था। उपप्रधान सेनापति चुना जाने पर इसने भाषण दिया कि - “मैंने अपनी सारी आयु में अनेक धाड़े मारे हैं। आपके सम्मान देने से मेरा खूब उबल उठा है। मैं वीरों के सम्मुख प्रण करता हूं कि देश की रक्षा के लिए अपना खून बहा दूंगा तथा सर्वखाप के पवित्र झण्डे को नीचे नहीं होने दूंगा। मैंने अनेक युद्धों में भाग लिया है तथा इस युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान दे दूंगा।” यह कहकर उसने अपनी जांघ से खून निकालकर प्रधान सेनापति के चरणों में उसने खून के छींटे दिये। उसने म्यान से बाहर अपनी तलवार निकालकर कहा “यह शत्रु का खून पीयेगी और म्यान में नहीं जायेगी।” इस वीर योद्धा धूला के भाषण से पंचायती सेना दल में जोश एवं साहस की लहर दौड़ गई और सबने जोर-जोर से मातृभूमि के नारे लगाये।

दूसरा उपप्रधान सेनापति हरबीरसिंह जाट था । यह हरयाणा के जि० रोहतक गांव बादली का रहने वाला था। इसकी आयु 22 वर्ष की थी और इसका वजन 56 धड़ी (7 मन) था। यह निडर एवं शक्तिशाली वीर योद्धा था उप-प्रधानसेनापति हरबीरसिंह गुलिया ने अपने पंचायती सेना के 25,000 वीर योद्धा सैनिकों के साथ तैमूर के घुड़सवारों के बड़े दल पर भयंकर धावा बोल दिया जहां पर तीरों तथा भालों से घमासान युद्ध हुआ। इसी घुड़सवार सेना में तैमूर भी था। हरबीरसिंह गुलिया ने आगे बढ़कर शेर की तरह दहाड़ कर तैमूर की छाती में भाला मारा जिससे वह घोड़े से नीचे गिरने ही वाला था कि उसके एक सरदार खिज़र ने उसे सम्भालकर घोड़े से अलग कर लिया। तैमूर इसी भाले के घाव से ही अपने देश समरकन्द में पहुंचकर मर गया। वीर योद्धा हरबीरसिंह गुलिया पर शत्रु के 60 भाले तथा तलवारें एकदम टूट पड़ीं जिनकी मार से यह योद्धा अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ा। उसी समय प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर ने अपने 22000 मल्ल योद्धाओं के साथ शत्रु की सेना पर धावा बोलकर उनके 5000 घुड़सवारों को काट डाला। जोगराजसिंह ने स्वयं अपने हाथों से अचेत हरबीर सिंह को उठाकर यथास्थान पहुंचाया। परन्तु कुछ घण्टे बाद यह वीर योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गया। हरद्वार के जंगलों में तैमूरी सेना के 2805 सैनिकों के रक्षादल पर भंगी कुल के उपप्रधान सेनापति धूला धाड़ी वीर योद्धा ने अपने 190 सैनिकों के साथ धावा बोल दिया। शत्रु के काफी सैनिकों को मारकर ये सभी 190 सैनिक एवं धूला धाड़ी अपने देश की रक्षा हेतु वीरगति को प्राप्त हो गये।
(सन्दर्भ-जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ 380-383)

हमारे महान इतिहास की इस लुप्त प्रायः घटना को यहाँ देने के दो प्रयोजन है।  पहला तो यह सिद्ध करना कि हिन्दू समाज को अगर अपनी रक्षा करनी है तो उसे जातिवाद के भेद को भूलकर संगठित होकर विधर्मियों का सामना करना होगा। दूसरा इससे यह भी सिद्ध होता है कि उस काल में जातिवाद का प्रचलन नहीं था। धूला भंगी (बालमीकी) अपनी योग्यता, अपने क्षत्रिय गुण,कर्म और स्वभाव के कारण सवर्ण और दलित सभी की मिश्रित धर्मसेना का नेतृत्व किया। https://www.facebook.com/288736371149169/posts/4025107447512024/

जातिवाद रूपी विषबेल हमारे देश में पिछली कुछ शताब्दियों में ही पोषित हुई।  वर्तमान में भारतीय राजनीति ने इसे अधिक से अधिक गहरा करने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया।

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Saturday, December 26, 2020

1 जनवरी का इतिहास जान लेंगे आप तो छोड़ देंगे नववर्ष मनाना

26 दिसंबर 2020


विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत में राज करने के लिए सबसे पहले भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात किया जिससे हम अपनी महान दिव्य संस्कृति भूल जाएं और उनकी पाश्चात्य संस्कृति अपना लें जिसके कारण वे भारत में राज कर सकें।




अपनी संस्कृति का ज्ञान न होने के कारण आज हिन्दू भी 31 दिसंबर की रात्रि में एक-दूसरे को हैपी न्यू इयर कहते हुए नववर्ष की शुभकामनाएं देते हैं ।

नववर्ष उत्सव 4000 वर्ष पहले से बेबीलोन में मनाया जाता था। लेकिन उस समय नए वर्ष का ये त्यौहार 21 मार्च को मनाया जाता था जो कि वसंत के आगमन की तिथि (हिन्दुओं का नववर्ष ) भी मानी जाती थी। प्राचीन रोम में भी ये तिथि नव वर्षोत्सव के लिए चुनी गई थी लेकिन रोम के तानाशाह जूलियस सीजर को भारतीय नववर्ष मनाना पसन्द नहीं आ रहा था इसलिए उसने ईसा पूर्व 45वें वर्ष में जूलियन कैलेंडर की स्थापना की, उस समय विश्व में पहली बार 1 जनवरी को नए वर्ष का उत्सव मनाया गया। ऐसा करने के लिए जूलियस सीजर को पिछला वर्ष यानि, ईसापूर्व 46 ईस्वी को 445 दिनों का करना पड़ा था । उसके बाद भारतीय नववर्ष के अनुसार छोड़कर ईसाई समुदाय उनके देशों में 1 जनवरी से नववर्ष मनाने लगे ।

भारत देश में अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कम्पनी की 1757 में  स्थापना की । उसके बाद भारत को 190 साल तक गुलाम बनाकर रखा गया। इसमें वो लोग लगे हुए थे जो भारत की ऋषि-मुनियों की प्राचीन सनातन संस्कृति को मिटाने में कार्यरत थे। लॉड मैकाले ने सबसे पहले भारत का इतिहास बदलने का प्रयास किया जिसमें गुरुकुलों में हमारी वैदिक शिक्षण पद्धति को बदला गया ।

भारत का प्राचीन इतिहास बदला गया जिसमें भारतीय अपने मूल इतिहास को भूल गये और अंग्रेजों का गुलाम बनाने वाले इतिहास याद रह गया और आज कई भोले-भाले भारतवासी सृष्टि की रचना तिथि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष नहीं मनाकर 1 जनवरी को ही नववर्ष मनाने लगे ।

हद तो तब हो जाती है जब एक दूसरे को नववर्ष की बधाई भी देने लग जाते हैं। क्या किसी भी ईसाई देशों में हिन्दुओं को हिन्दू नववर्ष की बधाई दी जाती है..??? किसी भी ईसाई देश में हिन्दू नववर्ष नहीं मनाया जाता है फिर भोले भारतवासी उनका नववर्ष क्यों मनाते हैं?

इस साल आने वाला नया वर्ष 2021 अंग्रेजों अर्थात ईसाई धर्म का नया साल है।

हिन्दू धर्म का इस समय विक्रम संवत 2077 चल रहा है।

इससे सिद्ध हो गया कि हिन्दू धर्म ही सबसे पुराना धर्म है ।

इस विक्रम संवत से 5000 साल पहले इस धरती पर भगवान विष्णु श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए । उनसे पहले भगवान राम, और अन्य अवतार हुए यानि जब से पृथ्वी का प्रारम्भ हुआ तब से सनातन (हिन्दू) धर्म है।

कहाँ करोड़ों वर्ष पुराना हमारा सनातन धर्म और कहाँ भारतीय अपनी गरिमा से गिर 2020 साल पुराना नववर्ष मना रहे हैं!

जरा सोचिए....!!!

सीधे-सीधे शब्दों में हिन्दू धर्म ही सब धर्मों की जननी है। यहाँ किसी धर्म का विरोध नहीं है परन्तु सभी भारतवासियों को बताना चाहते हैं कि इंग्लिश कैलेंडर के बदलने से हिन्दू वर्ष नहीं बदलता!


जब बच्चा पैदा होता है तो पंडित जी द्वारा उसका नामकरण कैलेंडर से नहीं हिन्दू पंचांग से किया जाता है । ग्रहदोष भी हिन्दू पंचाग से देखे जाते हैं और विवाह, जन्मकुंडली आदि का मिलान भी हिन्दू पंचाग से ही होता है । सभी व्रत, त्यौहार हिन्दू पंचाग से आते हैं। मरने के बाद तेरहवाँ भी हिन्दू पंचाग से ही देखा जाता है। मकान का उद्घाटन, जन्मपत्री, स्वास्थ्य रोग और अन्य सभी समस्याओं का निराकरण भी हिन्दू कैलेंडर {पंचाग} से ही होता है।

आप जानते हैं कि रामनवमी, जन्माष्टमी, होली, दीपावली, राखी, भाई दूज, करवा चौथ, एकादशी, शिवरात्री, नवरात्रि, दुर्गापूजा सभी विक्रमी संवत कैलेंडर से ही निर्धारित होते हैं । इंग्लिश कैलेंडर में इनका कोई स्थान नहीं होता।

सोचिये! आपके इस सनातन धर्म के जीवन में इंग्लिश नववर्ष या कैलेंडर का स्थान है कहाँ ?

1 जनवरी को क्या नया हो रहा है..????

न ऋतु बदली... न मौसम...न कक्षा बदली...न सत्र....न फसल बदली...न खेती.....न पेड़ पौधों की रंगत...न सूर्य चाँद सितारों की दिशा.... ना ही नक्षत्र...

हाँ, नए साल के नाम पर करोड़ो /अरबों जीवों की हत्या व करोड़ों /अरबों गैलन शराब का पान व रात पर फूहडता अवश्य होगी।

भारतीय संस्कृति का नव संवत्  ही नया साल है.... जब ब्रह्माण्ड से लेकर सूर्य चाँद की  दिशा, मौसम, फसल, कक्षा, नक्षत्र, पौधों की नई पत्तियां, किसान की नई फसल, विद्यार्थी की नई कक्षा, मनुष्य में नया रक्त संचरण आदि परिवर्तन होते हैं जो विज्ञान आधारित है और चैत्र नवरात्रि का पहला दिन होने के कारण घर, मन्दिर, गली, दुकान सभी जगह पूजा-पाठ व भक्ति का पवित्र वातावरण होता है ।

अतः हिन्दुस्तानी अपनी मानसिकता को बदले, विज्ञान आधारित भारतीय काल गणना को पहचाने और चैत्री शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन ही नूतन वर्ष मनाये।

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