Tuesday, December 15, 2020

संविधान के सभी अनुच्छेद सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू क्यों नहीं हैं?

15 दिसंबर 2020


कुछ समय से देश में समान नागरिक संहिता की चर्चा बार-बार हो रही है, लेकिन वह आगे नहीं बढ़ पा रही है। इसी तरह हिंदू मंदिरों को सरकारी कब्जे से मुक्त कराने की मांग भी अनुसनी बनी हुई है। छोटे-मोटे संगठन और एक्टिविस्ट धर्मांतरण के विरुद्ध कानून बनाने की भी मांग कर रहे हैं। भोजन उद्योग में हलाल मांस का दबाव बढ़ाने की संगठित गतिवधियों के विरुद्ध भी असंतोष बढ़ा है। शिक्षा अधिकार कानून में हिंदू-विरोधी पक्षपात पर भी काफी उद्वेलन है। आखिर इन मांगों पर सत्ताधारियों का क्या रुख है?




समान नागरिक संहिता की चाह तो मूल संविधान में ही थी, लेकिन शासकों ने शुरू से इसे उपेक्षित किया। कई बार सुप्रीम कोर्ट के पूछने पर भी कार्रवाई नहीं की। समान संहिता की मांग हिंदू मुद्दा नहीं, बल्कि सेक्युलर मांग है। यह मांग तो सेक्युलरवादियों को करनी चाहिए। धर्मांतरण रोकना भी कानूनी प्रतिबंध का विषय नहीं। धर्मांतरण कराने में मिशनरी रणनीति और कटिबद्धता ऐसी है कि चीन जैसा कठोर शासन भी महज कानून से इसे रोकने में विफल रहा है। धर्मांतरण रोकने के आसान रास्ते की आस छोड़नी चाहिए। इसका उपाय शिक्षा और वैचारिक युद्ध में है। उससे कतरा कर संगठित धर्मांतरणकारियों से पार पाना असंभव है।

कुछ लोग जब-तब हिंदू राष्ट्र की बातें किया करते हैं, जबकि यथार्थवादी मांग यह होती कि हिंदुओं को दूसरे समुदायों जैसे बराबर अधिकार मिलें। दुर्भाग्यवश अधिकांश लोगों को इसकी चेतना नहीं। हालिया समय में संविधान के अनुच्छेद 25 से 31 की हिंदू-विरोधी व्याख्या स्थापित कर दी गई है। कई शैक्षिक, सांस्कृतिक, सामाजिक अधिकारों पर केवल गैर-हिंदुओं यानी अल्पसंख्यकों का एकाधिकार बना दिया गया है।

सरकार हिंदू शिक्षा संस्थान और मंदिरों पर मनचाहा हस्तक्षेप करती है और अपनी शर्तें लादती है। वह ऐसा गैर-हिंदू संस्थाओं पर नहीं करती। इसी तरह अल्पसंख्यकों को संवैधानिक उपचार पाने का दोहरा अधिकार है, जो हिंदुओं को नहीं है। हिंदू केवल नागरिक रूप में न्यायालय से कुछ मांग सकते हैं, जबकि अन्य नागरिक और अल्पसंख्यक, दोनों रूपों में संवैधानिक अधिकार रखते हैं। ऐसा अंधेर दुनिया के किसी लोकतंत्र में नहीं कि अल्पसंख्यक को ऐसे विशेषाधिकार हों जो अन्य को न मिलें। यह हमारे संविधान निर्माताओं की कल्पना न थी।

1970 के आसपास कांग्रेस-कम्युनिस्ट दुरभिसंधि और हिंदू संगठनों के निद्रामग्न होने से संविधान के अनुच्छेद 25 से 31 को मनमाना अर्थ दिया जाने लगा। संविधान की उद्देशिका में जबरन "सेक्युलर" शब्द जोड़ने से लेकर दिनों-दिन विविध अल्पसंख्यक संस्थान, आयोग, मंत्रालय आदि बना-बना कर अधिकाधिक सरकारी संसाधन मोड़ने जैसे अन्यायपूर्ण कार्य होते गए। विडंबना यह कि इनमें कुछ कार्य स्वयं हिंदूवादी कहलाने वाले नेताओं ने किए। वे केवल सत्ता कार्यालय, भवन, कुर्सी आदि की चाह में रहे।

नीतियों में होते परिवर्तनों की दूरगामी मार पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। इसके विपरीत, कम्युनिस्टों ने शिक्षा-संस्कृति की धारा पर कब्जा करने की कोशिश की, क्योंकि सामाजिक बदलाव का मूल स्रोत वही होती है। इसीलिए सत्ता पर काबिज हुए बिना भी कम्युनिस्टों ने देश की शिक्षा-संस्कृति पर वर्चस्व बनाया और हिंदू ज्ञान-परंपरा को बेदखल कर दिया। आज हिंदू धर्म-समाज डूबता जहाज समझा जाने लगा है, जिससे निकल कर ही जान बचाई जा सकती है। इन सच्चाइयों की अनदेखी कर अनेक हिंदूवादी खुद अपनी वाह-वाही करते हैं, किंतु हालिया दशकों में भारत में ही हिंदू धर्म का चित्रण जातिवादी, उत्पीड़क, दकियानूस आदि जैसा प्रचलित हुआ है। यही विदेशों में प्रतिध्वनित हुआ। किसी पार्टी की सत्ता बनने से इसमें अंतर नहीं पड़ा, यह विविध घटनाओं से देख सकते हैं।

अयोध्या में राम-जन्मभूमि के लिए सदियों पुराने सहज हिंदू संघर्ष की जितनी बदनामी पिछले तीन दशकों में हुई, वह पूरे इतिहास में कभी नहीं मिलती। सदैव दूसरों को दोष देना और अपनी भूल न देखना बचकानापन है। यहां ईसाई और इस्लामी दबदबा बढ़ने में उनके नेताओं का समर्पण और दूरदृष्टि भी कारण है। उन्होंने कुर्सी के लिए अपने धर्म-समाज के मूल हितों से कभी समझौता नहीं किया। यह न समझना आत्मप्रवंचना है।

हिंदुओं को दूसरों के समान संवैधानिक अधिकार दिलाने की लड़ाई जरूरी है। इसमें दूसरे का कुछ नहीं छिनेगा। केवल हिंदुओं को भी वह मिलेगा, जो मुसलमानों, ईसाइयों को हासिल है। "संविधान दिवस" मनाने की अपील तो ठीक है, लेकिन यह समझा जाना चाहिए कि संविधान के अनुच्छेद 25-31 को देश के सभी नागरिकों के लिए समान रूप से लागू करना आवश्यक। यह न केवल संविधान की मूल भावना के अनुरूप, बल्कि सहज न्याय है। हिंदुओं के हित की कुंजी अन्य धर्मावलंबियों जैसे समान अधिकार में है। स्वतंत्र भारत में हिंदू समाज का मान-सम्मान, क्षेत्र संकुचित होता गया है और यह प्रक्रिया चालू है।

धर्मांतरण रोकना सामाजिक काम है। भारत में यह आसान भी है। धर्मांतरण को समान धरातल पर लाना चाहिए। विभिन्न धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन-परीक्षण का वातावरण बनाना चाहिए। चूंकि ईसाइयत और इस्लाम धर्मांतरणकारी हैं, इसलिए वे विपरीत गमन का विरोध नहीं कर सकते। वस्तुत: पश्चिम में पिछली दो-तीन सदियों में एक विस्तृत श्रेष्ठ साहित्य तैयार हुआ, जिसने ईसाइयत की कड़ी समीक्षा कर यूरोप को चर्च के अंधविश्वासों से मुक्त कराया। फलत: वहां ईसाइयत में धर्मांतरण शून्यप्राय हो गए।

उसी विमर्श को भारत लाकर यहां ईसाई मिशनों को ठंडा करना था, किंतु दुर्भाग्य से गांधीजी ने उस आलोचनात्मक विमर्श के बदले मिशनरी प्रचारों को ही आदर देकर ईसाइयों को ‘अच्छा ईसाई’ बनने का उपदेश दिया। फलत: यहां मिशनरी और जम गए, जबकि धर्मांतरण रोकने का रामबाण सभी धर्मों के वैचारिक दावों के खुले बौद्धिक परीक्षण में है। इसी से हिंदू, बौद्ध, सिख धर्म सुरक्षित होंगे, कानून बनाकर नहीं। तुलनात्मक धर्म अध्ययन और शोध को विषय के रूप में शिक्षा में स्थापित करना इस में उपयोगी होगा।

यह सब करना कोई "हिंदू राष्ट्र" बनाना नहीं, बल्कि हिंदू-विरोधी भेदभाव खत्म कर स्थिति सामान्य बनाना भर है। जैसे जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाना सामान्यीकरण है, कोई हिंदू राज्य बनाना नहीं। इसी प्रकार अनुच्छेद 25-31 के व्यवहार में की गई विकृति को खत्म कर उसे सबके लिए बराबर घोषित करना एक सामान्यीकरण भर होगा। इसके बिना हिंदुओं के हितों पर दिनों-दिन चोट बढ़ती जाएगी। - डॉ. शंकर शरण

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