Wednesday, September 4, 2019

सावधान :रेप कानून का हो रहा है भयंकर दुरपयोग,कहि आप न बन जाये शिकार

04 सितंबर 2019
http://azaadbharat.org
🚩 महिला सुरक्षा के लिए बने कानूनों का भारी दुरुपयोग हो रहा है और दुरूपयोग कर रही हैं कुछ लालची, महत्वकांक्षी औरतें जो निजी स्वार्थ, पैसों के लालच, ईर्ष्यावश या बदले की भावना से निर्दोष पुरुषों को फंसा रही हैं। इसके कारण जो सही में महिला पीड़ित है उनको भी न्याय नही मिल पाता है।
🚩 बता दे कि हर्ष यादव व माधव चौधरी एमिटी विश्वविद्यालय नोयडा में बीए के छात्र हैं। हर्ष के मुताबिक, बुधवार दोपहर करीब दो बजे वह आइ-20 कार से गेट 3बी से विवि में प्रवेश कर रहे थे। गेट पर ही कार सवार छात्रा खड़ी थी। उनके कहने पर छात्रा ने रास्ता नहीं छोड़ा और उनके साथ गाली- गलौज की। आरोप है कि छात्रा 15 से 20 छात्रों के साथ उनके क्लास रूम में घुस गई और मारपीट की। बीच बचाव कर रहे उनके दोस्त माधव व महिला शिक्षिका को भी चोट आई है। उन्होंने छात्रा के अलावा उसके साथ आए कुछ छात्रों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई है। उधर, छात्रा ने भी तीन छात्रों पर छेड़छाड़ की रिपोर्ट दर्ज कराई है।
🚩 दूसरा मामला रतलाम का है जिसमे एक युवक को पत्नी द्वारा 15 लाख का दहेज मांगने पर और दहेज नही देने पर सपरिवार जेल भजेने की धमकी देने पर युवक ने परेशान होकर आत्महत्या कर ली।
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=883247765373198&id=777836699247639

🚩 भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 375 बलात्कार को परिभाषित करती है और धारा 376 बलात्कार की सजा से सम्बंधित है। कानून के अनुसार बलात्कार Cognizable और Non-Bailable आरोप है। Cognizable का मतलब है कि बलात्कार के आरोप में पुलिस आरोपी को बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है और बिना कोर्ट की आज्ञा से अनुसंधान शुरू कर सकती है। Non-Bailable का अर्थ है कि बलात्कार के आरोप में आरोपी को बेल नहीं मिलती।
🚩 निर्भया केस के बाद सरकार ने महिलाओं से सम्बंधित कानूनों को और कठोर कर दिया।  The Criminal Law Amendment Act 2013 के द्वारा सरकार ने भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 375 और 376 को और कठोर कर दिया। उसी अधिनियम द्वारा Indian Penal Code, 1860 की कुछ और धाराएं भी कठोर की गई तथा The Code of Criminal Procedure, 1973 और The Evidence Act, 1872 की कुछ धाराओं में संसोधन किया गया। POCSO Act, 2012 भी लागू किया गया। The Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act 2013 भी बनाया। The Dowry Prohibition Act, 1961 और Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 पहले ही थे। पर दुर्भाग्य ये है कि महिलाओं की रक्षा के लिए लागू किए गए इन कानूनों का महिलाओं के द्वारा ही निर्दोष पुरुषों को फंसाने के लिए भारी दुरुपयोग हो रहा है।
🚩 इन कानूनों के दुरुपयोग से निर्दोष पुरुषों की ज़िंदगी तबाह हो रही हैं। कुछ पुरुष निर्दोष होते हुए भी आरोपी सिद्ध होकर सालों साल जेल की प्रताड़ना सहन करते हैं तो कुछ पुरुष कुछ साल जेल में रहकर निर्दोष बाहर आ जाते हैं। कुछ पुरुष तो आरोप के सदमे में खुदकुशी तक कर लेते हैं।
🚩 हिंदू संस्कृति रक्षक हिंदू साधु-संतों को भी झूठे केस में फंसाया जा रहा है जैसे कि स्वामी नित्यानंद जी, स्वामी केशवानन्दजी आदि को सेशन कोर्ट ने सजा भी कर दी फिर ऊपरी कोर्ट ने निर्दोष बरी किया, ऐसा ही मामला हिंदु संत आसाराम बापू का भी है उनके पास पुख्ता सबूत है की तथाकथित घटना के समय वहाँ लड़कीं थी ही नही फिर कैसे सजा हुई? खेर वे ऊपरी कोर्ट से निर्दोष बरी हो जाएंगे ।
🚩 👉🏻लेकिन अब प्रश्न ये है कि जो समय निर्दोष पुरुष जेल में प्रताड़ित होकर गुजारते है क्या न्यायपालिका वो समय वापिस दे पाएगी?
🚩 👉🏻जो मानसिक उत्पीड़न निर्दोष पुरुष झेलते हैं क्या न्याय व्यवस्था उसकी भरपाई कर पाएगी?
🚩 👉🏻झूठे आरोप से जो निर्दोष पुरुषों की मान प्रतिष्ठा को हानि होती हैं, क्या अदालत उसकी भरपाई कर पाएगी?
🚩 👉🏻निर्दोष होते हुए भी बलात्कारी का जो कलंक लग जाता है, क्या अदालत उसको मिटा पाएगी?
🚩 👉🏻कोई निर्दोष पुरुष जब सदमे में आकर आत्महत्या कर लेते है तो क्या ये कानून व्यवस्था उसका जीवन लौटा पाएगी?
🚩 👉🏻जब संविधान सबको बराबर मूलभूत अधिकार देता है तो झूठे आरोप में फंसे पुरुष के मूलभूत अधिकारों की रक्षा कैसे होगी? कौन करेगा?
🚩 👉🏻किसी औरत द्वारा लगे झूठे आरोप से किसी पुरुष की परिवार को जो आर्थिक और सामाजिक हानि होती है क्या उस हानि की भरपाई अदालत कर पाएगी?
🚩 👉🏻क्या झूठे आरोप में प्रताड़ित पुरुष कभी खुद को समाज में सुरक्षित महसूस कर पाएगा?
🚩 👉🏻झूठे आरोप से प्रताड़ित कोई पुरुष क्या कभी कानून व्यवस्था पर विश्वास कर पाएगा?

🚩 👉🏻कानून व्यवस्था से प्रताड़ित मनुष्य भविष्य में कभी जरूरत पड़ने पर कानून का दरवाजा खटखटा पाएगा?
🚩 ऐसे बहुत से प्रश्न है जिसका किसी के पास कोई जवाब नहीं है। झूठे केसों से एक बात तो स्पष्ठ है कि समाज में नैतिकता का पत्तन हो चुका है। सोचिए अगर किसी परिवार में बस एक कमाने वाला हो और उसी पर कोई लालची औरत बलात्कार का झूठा इल्जाम लगा दे तो बताओ उसके पूरे परिवार का क्या होगा? और अगर वहीं सदमे में आकर आत्महत्या कर ले तो बताओ उसके परिवार का क्या होगा? वास्तविकता ये है कि परिवार के परिवार तबाह हो रहे हैं इन कानूनों के दुरुपयोग से।
🚩 पर अब समाज में थोड़ी चेतना भी आ रही है। निर्दोष पुरुषों की रक्षा हेतु आवाज़ उठने लगी है। कुछ सामाजिक संगठन आगे भी आ रहे हैं। #MeToo Movement की तर्ज पर #MenToo Movement विश्वभर में चल रहा है और इसे विश्वव्यापी में समर्थन मिल रहा है। महिला आयोग की तर्ज पर पुरुष आयोग की मांग की जा रही हैं ताकि निर्दोष पुरुषों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा हो।
🚩 इस विषय पर एक फ़िल्म भी बन रही है। फ़िल्म का नाम है "INDIA' SONS - TALE OF FALSE RAPE CASE SURVIVORS" जो 2020 में रिलीज होगी। इसमें दिखाया गया है कि किस तरह महिलाओं द्वारा कानूनों के दुरुपयोग द्वारा निर्दोष पुरुषों को फंसाया जा रहा है। इस फ़िल्म में उन कुछ पुरुषों के विषय में भी दिखाया गया है जिन्होंने निर्दोष होते हुए भी झूठे बलात्कार के आरोप की प्रताड़ना झेली है। फ़िल्म का ट्रेलर देखिए 👉🏻  https://youtu.be/SPH6DMCSC6Q . ये ट्रेलर देखने के बाद आप समझ जाएंगे कि किस तरह कानूनों का दुरुपयोग कर निर्दोष पुरुषों को फंसाया जा रहा है।
🚩 पर अभी समाज में जितनी चेतना आई है, जो प्रयास अभी समाज में निर्दोष पुरुषों को बचाने के लिए हो रहे हैं, वे काफी कम है। अभी जरूरत है कि सभी देशवासी एकजुट हो और इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाए। ध्यान रखिए एक गलत बलात्कार का आरोप मतलब एक परिवार की तबाही। अगर आज आवाज़ नहीं उठाई तो कल तबाह होने वाला परिवार आपका भी हो सकता है।
🚩Official Azaad Bharat Links:👇🏻
🔺Youtube : https://goo.gl/XU8FPk
🔺 Twitter : https://goo.gl/kfprSt
🔺 Instagram : https://goo.gl/JyyHmf
🔺 Word Press : https://goo.gl/ayGpTG
🔺Pinterest : https://goo.gl/o4z4B

Tuesday, September 3, 2019

क्या न्यायपालिका मीडिया और विधानपालिका के दबाव में चल रही है?

🚩क्या न्यायपालिका मीडिया और विधानपालिका के दबाव में चल रही है?
3 सितंबर 2019
http://azaadbharat.org
🚩भारत देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है मतलब भारत की जनता अपनी सरकार स्वयं मतदान द्वारा चुनती है।
🚩लोकतंत्र के कुल चार स्तम्भ माने गए हैं। ये स्तम्भ हैं 👇
1. न्यायपालिका
2. कार्यपालिका
3. विधानपालिका
4. मीडिया
🚩न्यायपालिका को लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तम्भ माना गया है। भारतीय संविधान ने ही विधानपालिका और कार्यपालिका की चुनाव प्रक्रिया, कार्यकाल, शक्तियों और कार्यक्षेत्र को परिभाषित किया है।

🚩पर ऐसा लगता है कि भारत देश में मात्र कहने को ही न्यायपालिका लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तम्भ है। विधानपालिका ने सदा न्यायपालिका को प्रभावित किया है।
🚩सबसे बड़ा उदाहरण है राजनेताओं पर चल रहे केस जो सालों साल चलते रहते हैं। राजेनताओं को बेल पर बेल, अग्रिम बेल भी बड़ी आसानी से मिल जाती है। जैसे राहुल गांधी सोनिया गांधी, रॉबट वाड्रा, पी चिदंबरम आदि को अनगिनत बार बेल मिल चुकी है। चारा घोटाले वाले केस में लालू जी को भी कई बार जमानत मिली थी। फिर बाद में या तो ये आरोपी ही सिद्ध नहीं होते और अगर होते हैं तो सजा कम से कम मिलती हैं। फिर बाद में इनको पैरोल या जमानत बड़ी ही आसानी से मिल जाती हैं।
🚩दूसरी ओर हिन्दू संतों को झूठे केसों में भी बेल नहीं मिलती। सालों साल केस चलते हैं, एक दिन की भी बेल नहीं मिलती। कुछ संत तो निचली अदालत में दोषी करार हुए पर बाद में ऊपरी अदालत से बाइज्जत बरी हुए। इन संतों को ना ही एक दिन की बेल मिली और ना ही एक दिन की पैरोल? साध्वी प्रज्ञा जी, स्वामी असीमानन्द जी, स्वामी जयेंद्र सरस्वती जी आदि कई नाम है इस सूची में। क्या बेल या पैरोल का प्रावधान बस राजनेताओं के लिए ही है?
🚩पहलू खान की मोबलीचिंग में मौत हुई। 6 आरोपियों पर अलवर कोर्ट में केस चला। कोर्ट ने सबको बाइज्जत बरी कर दिया। इस पर कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा कि "पहलू खान मामले में लोअर कोर्ट का फैसला चौंका देने वाला है। हमारे देश में अमानवीयता की कोई जगह नहीं होनी चाहिए और भीड़ द्वारा हत्या एक जघन्य अपराध है।"
🚩फिर प्रियंका गांधी वाड्रा का एक ट्वीट और आता है - "राजस्थान सरकार द्वारा भीड़ द्वारा हत्या के खिलाफ कानून बनाने की पहल सराहनीय है। आशा है कि पहलू खान मामले में न्याय दिलाकर इसका अच्छा उदाहरण पेश किया जाएगा।"
🚩कानून व्यवस्था का ऐसे खुलेआम मजाक क्यों उड़ाते हैं राजनेता? किसने इनको अधिकार दिया कि कानून व्यवस्था पर गलत टिप्पणी करे? क्या ये उचित है कि कोई ऐसे न्यायालय के फैसले पर उंगली उठाए? ऐसे बयान देने वाले नेताओं पर कार्यवाही क्यों नहीं होती?
🚩अभी हाल में भ्रष्टाचार के केस में पी चिदंबरम को गिरफ्तार किया गया तो राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, कपिल सिब्बल और दूसरे कई नेता उसके बचाव में कूद पड़े। एक भ्र्ष्टाचार में संलिप्त राजनेता को समर्थन क्यों? और फिर कानून व्यवस्था के तहत हो रही कार्यवाही पर प्रश्न क्यों, उसमें खलल डालने की कोशिश क्यों? क्या ये नेता कानून व्यवस्था से भी बड़े हो गए हैं?
🚩जब कानून व्यवस्था ने मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध कब्जे के मामले में आज़म खान पर कार्यवाही की तो वो बोला कि हमारे पूर्वजों ने गलती कि जो बटवारे के समय पाकिस्तान नहीं गए। देखिए किस स्तर तक गिर चुके हैं राजनेता। पहले अपराध करते हैं, फिर उसे धर्म से जोड़कर धार्मिक भावनाएं भड़काने की कोशिश करते हैं। अकबरुद्दीन ओवैसी कहता है कि 15 मिनट पुलिस हटा लो, सभी हिन्दुओं को काट देंगे। ऐसे नेता पहले ही कानून तोड़ चुके हैं फिर कानून व्यवस्था को चोट पहुँचाने वाली बयानबाजी करते हैं। ऐसे राजनेताओं पर क्यों कानून व्यवस्था उचित कार्यवाही नहीं कर पा रही?
🚩ये तो बस कुछ उदाहरण ही दिए हैं और ये कोई नई चीज नहीं, ये वर्षों से होता आ रहा है। कब तक विधानपालिका न्यायपालिका को तुच्छ सिद्ध करती रहेगी?
🚩अब आइए मीडिया पर। मर्यादा की सीमा लांघना मीडिया के लिए आम बात हो गई है। ये खुद ही जज बन जाती है, बिना न्यायालय का फैसला आए किसी को भी अपराधी ठहरा देती है। निर्दोष लोगों की भी झूठी खबर बनाकर इतना बदनाम कर देती है कि उस बदनामी की भरपाई नहीं हो पाती। वे न्यायालय से तो निर्दोष छूटकर बाहर आ जाते हैं पर मीडिया द्वारा ब्रेनवाश किए हुए समाज उनको हमेशा गलत नजर से देखता है।
🚩किसी निर्दोष को दोषी दिखाते हुए जब ज्यादा खबर चलती है तो समाज में नकारात्मक माहौल तैयार हो जाता है और जज भी दबाव में आ जाते हैं और निर्दोष को भी दोषी करार देना पड़ता है।
🚩ऐसे निर्दोष कई साल जेलों में प्रताड़ित होते हैं, कुछ भाग्यशाली ऊपरी अदालतों से छूट जाते हैं पर जो कीमती समय नष्ठ हुआ, उसका क्या, क्या मीडिया वो समय लौटा पाएगी? जो मानसिक प्रताड़ना हुई, उसकी भरपाई मीडिया कैसे करेगी?
🚩मीडिया धार्मिक तुष्टिकरण का कुकृत्य भी कर रही है और इसके लिए कानून को मोहरा भी बना रही है। किसी पादरी या मौलवी के कुकृत्यों की खबर मीडिया कभी नहीं दिखाती और हिन्दू संतों के विषय में गलत खबर बार बार दिखाती रहती है। 13 बार बलात्कार का आरोपी पादरी फ्रांको मुल्लकल को 21 दिन में बेल मिल गई थी और मीडिया ने कोई प्रतिरोध नहीं किया। 2-3 दिन बाद मुख्य गवाह संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाया गया पर मीडिया में कोई खबर नहीं। राजनेताओं और फिल्मी हस्तियों को पैरोल पर पैरोल मिलती है पर मीडिया द्वारा कोई प्रतिरोध नहीं।
🚩पर जब हिन्दू संतों की बात आती है और उनको अगर फ़र्ज़ी केस में ही बेल मिल रही होती हैं तो मीडिया ऐसे विलाप करने लगती हैं जैसे उन संत को बेल मिलने से प्रलय आ जाएगी। इससे जज दबाव में आ जाता है और वो बेल को ठुकरा देता है। हिन्दू संतों के विषय में तो गवाहों के मरने की, गवाहों पर हमला होने की फ़र्ज़ी खबर पहले ही चला दी जाती है ताकि जज संत को बेल ही ना दे। और फ़र्ज़ी केस में दोषी करार दिए जाने के बाद जब कोई संत पैरोल मांगता है तो मीडिया पहले ही विलाप शुरू कर देती है और इससे संतों को पैरोल भी नहीं मिल पाती। एक भी संत का नाम बता दो जो आज तक बेल या पैरोल पर एक दिन भी बाहर आया हो।
🚩ये तो बस कुछ उदाहरण ही दिए हैं। देख लीजिए किस प्रकार मीडिया लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तम्भ न्यायपालिका को प्रभावित करने के लिए अपनी मर्यादा का उल्लंघन कर रही है।
🚩कब तक न्यायपालिका की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करेंगी विधानपालिका और मीडिया। देश का संविधान कहता है कि न्यायपालिका लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तम्भ है और इस स्तम्भ को वास्विकता में सबसे मजबूत स्तम्भ बनाने के लिए अब देश की जनता को ही आवाज़ उठानी पड़ेगी तभी देश की स्तिथि सुधर पाएगी।
🚩Official Azaad Bharat Links:👇🏻
🔺Youtube : https://goo.gl/XU8FPk
🔺 Twitter : https://goo.gl/kfprSt
🔺 Instagram : https://goo.gl/JyyHmf
🔺 Word Press : https://goo.gl/ayGpTG
🔺Pinterest : https://goo.gl/o4z4BJ