Thursday, February 10, 2022

पानी तो केवल बहाना है, मंदिर असली निशाना है...

17 मार्च 2021

azaadbharat.org

साल 2018 शुरू होते ही माहौल बनाया जाने लगा था कि मंदिरों में बलात्कार होते हैं क्योंकि जम्मू के कठुआ में एक मामले में मंदिर के पुजारी और उसके बेटे-भतीजे पर एक 8 साल की लड़की के रेप का आरोप लगा। हालाँकि, इस केस का एक आरोपित विशाल जंगोत्रा निर्दोष पाया गया। ग्रामीणों का कहना था कि लड़की के अपहरण के बाद मंदिर में छिपाया ही नहीं जा सकता। लेकिन, तब तक मंदिरों को बदनाम करने वाले इस काम में आगे निकल चुके थे।



हाल ही में मायावती की अनधिकृत बायोपिक कही जा रही फिल्म ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ में ऋचा चड्ढा के मुख्य किरदार के माध्यम से दिखाया गया है कि मंदिरों में दलितों को प्रवेश नहीं दिया जाता है।अब जब देश के लाखों मंदिर बर्बाद हो चुके हैं, कइयों की मरम्मत के लिए रुपए नहीं हैं और जिनके पास हैं वो सरकार के पास चले जाते हैं – वामपंथी-इस्लामी गठजोड़ ने बचे-खुचे मंदिरों को बदनाम करने का ठेका ले लिया है।

बस यही ‘सॉरी आसिफ’ प्रकरण का सार है। बच्चे की जिस तरह से पिटाई की गई, उसका कोई समर्थन नहीं कर सकता। उसे डाँट कर वहाँ से भगाया जा सकता था या फिर पुलिस को सूचित किया जा सकता था। दो लोगों ने उसकी पिटाई कर दी और वीडियो वायरल हो गया। मामला गाजियाबाद के डासना स्थित देवी मंदिर का है। वीडियो वायरल होने के बाद स्वरा भास्कर सरीखे सेलेब्रिटीज ने इस ट्रेंड में भागीदारी सुनिश्चित की।

कठुआ वाले मामले के बाद भगवान शिव के त्रिशूल पर कंडोम की तस्वीर बना कर वायरल किया गया था। अबकी बाबासाहब भीमराव आंबेडकर द्वारा एक बच्चे को चुल्लू से पानी पिलाने की तस्वीर वायरल कर लिखा गया कि यहाँ पानी पीने का संघर्ष पुराना है। इसकी तुलना कथित जमींदारी प्रथा से कर के दलितों को हिन्दुओं से अलग दिखा कर मुस्लिमों के साथ उनकी एकता प्रदर्शित की है। ‘भीम आर्मी’ जैसे दलों के नेता आसिफ से मिलने पहुँचने लगे।

‘भीम आर्मी’ वाले मीडिया के सामने आकर बोलने लगे कि दलितों का मंदिरों में प्रवेश पहले से ही वर्जित है। जबकि वहाँ के स्थानीय लोगों का कहना है कि नाबालिग आसिफ मंदिर के भीतर पानी पीने क्यों आया जब बाहर आसपास कई नल थे? मंदिर में कई बार डकैती हो चुकी है। एक हिन्दू नेता की हत्या हो गई थी। एक महंत को जान की धमकी मिलती रहती है। ऐसे में एक मुस्लिमों के प्रभाव वाले इलाके में एक भी ऐसी मस्जिद नहीं थी, जहाँ आसिफ पानी पी पाता?

मदिर में आने के कुछ तय नियम-कानून होते हैं। वहाँ लोग स्नान करने के बाद भगवान के दर्शन के लिए जाते हैं। मंदिर प्रशासन के कायदों के हिसाब से चीजें होती हैं। क्या कल को आसिफ को शौच लग जाए तो वो किसी दूसरे मजहब या धर्म के पवित्र स्थल में कर देगा और बाद में इसे ‘स्वच्छ भारत’ से जोड़ दिया जाएगा? आसिफ को अगर किसी ने भेजा था, तो उसका पता लगाया जाना चाहिए।

एक नाबालिग के नाम पर राजनीति नई नहीं है। शाहीन बाग़ आंदोलन के समय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस तरफ लोगों का ध्यान दिलाया भी था कि कैसे पुरुष खुद रजाई में सो रहे हैं और महिलाओं को सड़क पर भेज दिया गया है। बिलकिस दादी से लेकर कई महिलाओं की तस्वीरें वायरल की गईं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी तस्वीरें बिकती हैं। महिलाओं, खासकर बुजुर्गों, के नाम पर सहानुभूति आती है।

JNU में ऐसे ही एक दिव्यांग छात्र को आगे कर के पोस्टर बॉय बना दिया गया था और उसके बहाने दिल्ली पुलिस पर निशाना साधा गया था। हाल ही में हजारीबाग की तस्वीर वायरल हुई, जहाँ करीब एक दर्जन बच्चों को सड़क पर नमाज पढ़ने भेज दिया गया और उनका स्पीड ब्रेकर की तरह उपयोग किया गया। बसों से लेकर बाइक्स तक रुके रहे। अगर बच्चों की गलती नहीं है तो उन्हें आगे कर के कौन प्रोपेगंडा की फसल काटना चाह रहा है?

आखिर क्यों सॉरी आसिफ? ये बात उसके अम्मी-अब्बू कहें, जिन्होंने उसे सिखाया नहीं कि मंदिर में बिना मतलब घुस कर कुछ भी नहीं शुरू कर देते। ये बात वहाँ का मुस्लिम समाज कहे जिन्होंने मस्जिदों में पानी पीने की व्यवस्था नहीं की। अगर की, तो आसिफ को बताया नहीं। आसिफ को सॉरी वो सेलेब्रिटीज बोलें, जिन्हें लगता है कि मंदिरों ने उनकी कमाई खा ली है और उन्हें वही सब करना चाहिए, जैसा बॉलीवुड के लोग चाहते हैं।

हिन्दू शर्मिंदा नहीं होगा क्योंकि ये मामले प्यास और पानी से जुड़ा ही नहीं हुआ है। हिन्दू सॉरी इसीलिए नहीं बोलेंगे, क्योंकि कश्मीर में उनके नरसंहार के बाद भी बॉलीवुड का एक डायरेक्टर कहता है कि अपना नरसंहार करने वालों को ही सॉरी बोलो। हिन्दुओं को कोई सॉरी बोलने को इसीलिए न कहे, क्योंकि डासना में जो हुआ वो एक स्थानीय मारपीट थी जिसे सांप्रदायिक रंग देकर मंदिर को बदनाम करने वाला नैरेटिव गढ़ा गया।

उस मंदिर में अक्सर मुस्लिम समाज के लोग आते हैं और हिन्दू बहू-बेटियों के साथ छेड़खानी करते हैं – ऐसा वहाँ के स्थानीयोगों और महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती का भी कहना है। जब निर्भया मामले में एक नाबालिग बलात्कार कर सकता है तो फिर क्या जहाँ इस तरह की घटनाएँ आम हैं, वहाँ के लोग ऐसे किसी लड़के पर उसकी हरकतों को देख कर शक नहीं कर सकते? 15 साल का लड़का पढ़ा-लिखा भले न हो, उसे आसपास की समझ तो होती है।

🚩दोनों पक्षों के सामने आने से पहले ही ‘सॉरी आसिफ’ ट्रेंड होने लगता है, मीडिया उसका इंटरव्यू लेने लग जाता है, ‘भीम आर्मी’ उसके घर पहुँच जाती है और मंदिरों के विरोध में प्रोपेगंडा फैलाया जाता है – क्या ये सब कुछ ही देर में अचानक हो गया? इस पूरे प्रकरण में दूसरे पक्ष की एक ही गलती है कि उसने लड़के की पटाई की। ये नहीं होना चाहिए था। जैसा कि महंत यति ने सवाल पूछा – मंदिरों में डकैती होती थी तब वामपंथी मीडिया पोर्टल्स कहाँ थे?

ऐसे कृत्यों से सांप्रदायिक तनाव बढ़ता है। राम मंदिर को उन्होंने घृणा का प्रतीक साबित करने की लाख कोशिशें की, लेकिन जनभावनाओं के आगे सफल नहीं हो पाए। इसीलिए, अब किसी भी मंदिर, संत या हिन्दू एक्टिविस्ट को लेकर पूरे समुदाय को शर्मिंदा महसूस करने का ज्ञान दिया जा रहा है। नहीं, हिन्दू सॉरी नहीं बोलेगा। हिन्दू समुदाय शर्मिंदा नहीं है। आसिफ को उसके परिवार और मुस्लिम समाज सॉरी कहे, जिन्होंने उसे सिखाया नहीं कि मंदिर के नियम-कायदे क्या होते हैं।

https://twitter.com/OpIndia_in/status/1372012311435644928?s=19


सकड़ो मंदिरों का नियंत्रण सरकार के हाथ में है, और कुछ मंदिर व आश्रम बचे हैं, वे भी सरकार के पास चले जाएं और हिंदू समाज पूरी दुनिया में बदनाम हो इसके लिए साधू-संतों व मदिरों पर षडयंत्र किये जा रहे हैं। उसके लिए हिंदुस्तानी सावधान रहें।

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कोरोना वायरस से बचना है तो होली पर इतना काम जरूर करें

16 मार्च 2021

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दसी गाय का गोबर में अनेकों ऐसे गुण छिपे हैं जिन के बारे में हम जानते ही नहीं हैं। आयुर्वेद में भी इन सब का बहुत महत्व पाया जाता है और इसके मूत्र को बड़े-बड़े रोगों को दूर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अमेरिका के एक रिसर्च में देशी गाय का गोबर को भी एक महान औषधि सिद्ध किया है। गोबर में कीटाणुओं को दूर करने की बहुत बड़ी शक्ति होती है।



गाय के गोबर के कण्डों से होली जलाने पर गौशालाओं को स्वाबलंबी बनाया जा सकता है, जिससे गौहत्या कम हो सकती है, कंडे बनाने वाले गरीबों को रोजी-रोटी मिलेगी, और वतावरण में शुद्धि होने से हर व्यक्ति स्वस्थ रहेगा ।

दूसरा कि वृक्षों को काटना नहीं पड़ेगा जिससे वातावरण में संतुलन बना रहेगा।

वातावरण अशुद्ध होने पर कोरोना जैसे भयंकर वायरस आ जाते हैं, अगर देशी गाय के गोबर के कंडे से होली जलाई जाए तो कोरोना जैसे एक भी वायरस वातावरण में नहीं रहेंगे और हमारा स्वास्थ्य उत्तम हो जायेगा जिससे देश के करोड़ों रूपये बच जाएंगे।


•★ गोबर के फायदे..

वज्ञानिक कहते हैं कि गाय के गोबर में विटामिन बी-12 प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह रेडियोधर्मिता को भी सोख लेता है। आम मान्यता है कि गाय के गोबर के कंडे से धुआं करने पर कीटाणु, मच्छर आदि भाग जाते हैं तथा दुर्गंध का नाश हो जाता है।

गौमूत्र और गोबर, फसलों के लिए बहुत उपयोगी कीटनाशक सिद्ध हुए हैं। कीटनाशक के रूप में गोबर और गौमूत्र के इस्तेमाल के लिए अनुसंधान केंद्र खोले जा सकते हैं, क्योंकि इनमें रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभावों के बिना खेतिहर उत्पादन बढ़ाने की अपार क्षमता है। इसके बैक्टीरिया अन्य कई जटिल रोगों में भी फायदेमंद होते हैं। गौमूत्र अपने आस-पास के वातावरण को भी शुद्ध रखता है।

कषि में रासायनिक खाद्य और कीटनाशक पदार्थ की जगह गाय का गोबर इस्तेमाल करने से जहां भूमि की ऊर्वरता बनी रहती है, वहीं उत्पादन भी अधिक होता है। दूसरी ओर पैदा की जा रही सब्जी, फल या अनाज की फसल की गुणवत्ता भी बनी रहती है। जुताई करते समय गिरने वाले गोबर और गौमूत्र से भूमि में स्वतः खाद डलती जाती है।

एक गाय का गोबर 7 एकड़ भूमि को खाद और मूत्र 100 एकड़ भूमि की फसल को कीटों से बचा सकता है। केवल 40 करोड़ गौवंश के गोबर व मूत्र से भारत में 84 लाख एकड़ भूमि को उपजाऊ बनाया जा सकता है।

गाय के गोबर का चर्म रोगों में उपचारीय महत्व सर्वविदित है। प्राचीनकाल के मकानों की दीवारों और भूमि को गाय के गोबर से लीपा-पोता जाता था। यह गोबर जहां दीवारों को मजबूत बनाता था वहीं यह घरों पर परजीवियों, मच्छर और कीटाणुओं के हमले भी रोकता था। आज भी गांवों में गाय के गोबर का प्रयोग चूल्हे बनाने, आंगन लीपने एवं मंगल कार्यों में लिया जाता है।

दशी गाय के गोबर के है ये 5 चौका देने वाले फायदे

1•● काटने पर

बर्र, मच्छर, मक्खी, मकड़ी के काटने पर काटे हुए स्थान पर तुरंत गाय का गोबर मलें और लेप करके बांध दें ऐसा दिन में 2-3 बार करें इससे जहर का असर कम हो कर आराम मिलता है।

2•● मिर्गी में सहायक

सखे गोबर की राख को पानी में मिला लें और छान लें। छानकर इस पानी को पीने से मिर्गी की बीमारी में लाभ होगा।

3•● पेट के कीड़े

पट में कीड़े होने की अवस्था में गाय के गोबर की सफेद राख को 1 गिलास पानी में 1 चम्मच मिला कर इसे कपडे से छान लें। रोगी को तीन दिन तक सुबह शाम यह पानी पिलाने से लाभ होगा।

4•● खाज खुजली

गाय के गोबर को सुखा कर जला कर भस्म बना लें। गाय के मक्खन को 100 बार पानी से धो लें। इसके बाद इस मक्खन में 25 ग्राम भस्म को मिला कर रख लें। और जब भी खाज खुजली हो इसे लगायें तुरंत लाभ होता है।


5•● एड़ी का दर्द

जब किसी भी कारण से एड़ी में दर्द होने लगे और चलने फिरने में परेशानी हो तो रोज सूर्य उदय से पहले गाय के ताजा गोबर में एड़ी को रख कर 10 मिनट खड़े रहें अगर सुबह शाम दोनों टाइम करें तो और भी ज्यादा लाभ देता है। ( गोबर ताजा और गर्म होना चाहिए) इससे दर्द कुछ ही दिनों में ठीक हो जायेगा।

वज्ञानिक कहते हैं कि गाय एकमात्र ऐसी प्राणी है, जो ऑक्सीजन ग्रहण करती है और ऑक्सीजन ही छोड़ती है, ‍जबकि मनुष्य सहित सभी प्राणी ऑक्सीजन लेते और कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ते हैं। पेड़-पौधे इसका ठीक उल्टा करते हैं।

रस में गाय के घी से हवन पर वैज्ञानिक प्रयोग किए गए हैं कि एक तोला (10 ग्राम) गाय के घी से यज्ञ करने पर एक टन ऑक्सीजन बनती है।

आपने अब देशी गाय के गोबर के कंडों को जलाने की महिमा जानी तो आइए हम सभी मिलकर संकल्प करते हैं कि इस बार सिर्फ गाय के गोबर के कंडे से ही होली जलाएंगे, इसके लिए अभी से अपनी नजदीकी गौशाला का संपर्क करें और कंडे बनाने का ऑर्डर दें जिससे आपको कंडे पर्याप्त मात्रा में मिल सकते हैं।


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झठी शिकायत पर हो कार्रवाई, पीड़ितों को मिले मुआवजा:- जनहित याचिका

15 मार्च 2021

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दश में कानून की आड़ लेकर पैसे ऐठने, बदला लेने की भावना अथवा षडयंत्र के तहत झूठे केस दर्ज किए जाते हैं। यहां तक कि निचली अदालत से उनको सजा भी हो जाती है फिर सालों बाद ऊपरी न्यायालय से निर्दोष रिहा किया जाता है लेकिन तबतक उसका आधा जीवन चला जाता है, उसका घर परिवार उजड़ जाता है, समय पैसे और इज्जत चली जाती है उसका एक ताजा उदाहरण है 20 साल के बाद निर्दोष बरी हुए विष्णु तिवारी...।



दहेज, बलात्कार और SC/ST आदि कानूनों में झूठे केस के तहत निर्दोषों को जेल भेजा जाता है, सालों बाद रिहा होते है लेकिन न उनको मुआवजा मिलता है और नही झूठे केस करने वालो पर कोई कार्यवाही होती है उसकी अभी एक अच्छी पहल की है जनहित याचिका में।

आपको बता दे कि विष्णु तिवारी के मामले का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। याचिका में SC/ST एक्ट के तहत झूठी शिकायतें करने वालों पर कार्रवाई और पीड़ितों को पर्याप्त मुआवजे के लिए सिस्टम बनाने की अपील की गई है। याचिका भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे के माध्यम से दायर की है। 20 साल जेल में बिताने के बाद बरी किए गए विष्णु तिवारी के लिए भी पर्याप्त मुआवजे की माँग की गई है।

याचिका में केंद्र सरकार को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि वह आपराधिक मामलों में झूठी शिकायतें दर्ज कराने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई और इस तरह के गलत आरोप लगाए जाने पर पीड़ितों के लिए मुआवजा सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश बनाए।

कपिल मिश्रा ने याचिका में विष्णु तिवारी का उल्लेख किया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले दिनों विष्णु तिवारी को निर्दोष करार दिया था। तिवारी को SC/ST (अत्याचार रोकथाम) कानून के तहत अत्याचार और बलात्कार के मामले में 16 सितंबर, 2000 को गिरफ्तार किया गया था।

याचिका में गलत तरीके से दोषी ठहराए जाने और झूठे मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के कारण तिवारी को मुआवजा दिए जाने का अनुरोध किया है। याचिका में कहा गया है, “झूठी और दुर्भावनापूर्ण शिकायतें दर्ज करके कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है। केंद्र को निर्देश दिया जाए कि वह फर्जी शिकायत करने वालों के खिलाफ अभियोग चलाने और कड़ी कार्रवाई करने के लिए एक सिस्टम बनाने और गलत तरीके से चलाए गए मुकदमों के पीड़ितों को पर्याप्त मुआवजा देने के लिए दिशा-निर्देश बनाए। गलत तरीके से मुकदमा चलने पर विधि आयोग की रिपोर्ट की सिफारिश लागू करे।”

याचिका में यह भी कहा गया है कि विशेष अधिनियमों के तहत झूठी शिकायत करने पर यानी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 व यौन उत्पीड़न के मामलों में झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ भी कोई मुकदमा नहीं चल पाता है। झूठे मुकदमों के पीड़ितों को भी आर्थिक मुआवजा नहीं मिलता।

BJP नेता ने इस याचिका में केंद्रीय गृह मंत्रालय, केंद्रीय विधि और न्याय मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार और विधि आयोग को पक्षकार बनाया है। याचिका में विशेष कानूनों के तहत आरोपित बनाए गए विचाराधीन कैदियों के मामलों के जल्द निपटारे के लिए एक सिस्टम बनाए जाने और निश्चित समय के भीतर विचाराधीन कैदियों के मामलों पर फैसला किए जाने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जाने का अनुरोध किया गया है।

गौरतलब है कि विष्णु तिवारी के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने संज्ञान लेते हुए विस्तृत रिपोर्ट तलब की थी। संस्था ने उत्तर प्रदेश के DGP और और मुख्य सचिव को जवाब देने को कहा था। NHRC ने पूछा कि इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई? साथ ही पीड़ित विष्णु तिवारी को राहत और उनके पुनर्वास के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं, NHRC ने इसका भी विस्तृत विवरण माँगा था। स्त्रोत:  ऑप इंडिया

अनेकों निर्दोषों की झूठे केस में जिंदगी बर्बाद हो जाती है जनता की मांग है कि ऐसे कानूनों में बदलाव होना चाहिए और झूठे केस करने वालो पर कड़क कार्यवाही होनी चाहिए।

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ऐसे खेले होली मिल जाएगा कालसर्पदोष से मुक्ति, होंगे ढेरों फायदे

14 मार्च 2021

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होली का त्यौहार हास्य-विनोद करके छुपे हुए आनंद-स्वभाव को जगाने के लिए है, लेकिन आजकल केमिकल रंगों से होली खेलने का जो प्रचलन चल रहा है वो बहुत नुकसानदायक है । अगर पलाश के रंगों से होली खेलेंगे तो इतने फायदे होंगे कि आपको डॉक्टर की ज्यादा आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी ।



पलाश को हिंदी में ढाक, टेसू, बंगाली में पलाश, मराठी में पळस, गुजराती में केसूड़ा कहते हैं ।

इसके पत्त्तों से बनी पत्तलों पर भोजन करने से चाँदी – पात्र में किये भोजन के तुल्य लाभ मिलते हैं ।

कालसर्प दोष से मुक्ति

कालसर्प दोष बहुत भयंकर माना जाता है और ये करो, वो करो, इतना खर्चा करो, इतना जप करो, कई लोग इनको ठग लेते हैं । फिर भी कालसर्प दोष से उनका पीछा नहीं छूटता, लेकिन ज्योतिष के अनुसार उनका कालसर्प योग नहीं रहता जो पलाश के रंग अपने पर डालते हैं ।  कालसर्प दोष के भय से पैसा खर्चना नहीं और अपने को ग्रह दोष है, कालसर्प है ऐसा मानकर डरना नहीं पलाश के रंग शरीर पर लगाओ जिससे काल कालसर्प दोष चला जायेगा ।

पलाश से पाएं अनेक रोगों से मुक्ति

‘लिंग पुराण’ में आता है कि पलाश की समिधा से ‘ॐ नम: शिवाय’ मंत्र द्वारा 10 हजार आहुतियाँ दें तो सभी रोगों का शमन होता है ।

पलाश के फूल : प्रेमह (मूत्रसंबंधी विकारों) में: पलाश-पुष्प का काढ़ा (50 मि.ली.) मिश्री मिलाकर पिलायें ।

रतौंधी की प्रारम्भिक अवस्था में : फूलों का रस आँखों में डालने से लाभ होता है । आँखे आने पर (Conjunctivitis) फूलों के रस में शुद्ध शहद मिलाकर आँखों में आँजे ।

वीर्यवान बालक की प्राप्ति : एक पलाश-पुष्प पीसकर, उसे दूध में मिला के गर्भवती माता को रोज पिलाने से बल-वीर्यवान संतान की प्राप्ति होती है ।

पलाश के बीज : 3 से 6 ग्राम बीज-चूर्ण सुबह दूध के साथ तीन दिन तक दें | चौथे दिन सुबह 10 से 15 मि.ली. अरंडी का तेल गर्म दूध में मिलाकर पिलाने से कृमि निकल जायेंगे ।


🚩पत्ते : पलाश व बेल के सूखे पत्ते, गाय का घी व मिश्री समभाग मिला के धूप करने से बुद्धि की शुद्धि व वृद्धि होती है ।

बवासीर में : पलाश के पत्तों की सब्जी घी व तेल में बनाकर दही के साथ खायें ।

छाल : नाक, मल-मूत्र मार्ग या योनि द्वारा रक्तस्त्राव होता हो तो छाल का काढ़ा (50 मि.ली.) बनाकर ठंडा होने पर मिश्री मिला के पिलायें ।

पलाश का गोंद : पलाश का 1 से 3 ग्राम गोंद मिश्रीयुक्त दूध या आँवला रस के साथ लेने से बल-वीर्य की वृद्धि होती है तथा अस्थियाँ मजबूत बनती हैं । यह गोंद गर्म पानी में घोलकर पीने से दस्त व संग्रहणी में आराम मिलता है ।

पलाश के फूलों से होली खेलने की परम्परा का फायदा बताते हुए हिन्दू संत आसाराम बापू कहते हैं कि ‘‘पलाश कफ, पित्त, कुष्ठ, दाह, वायु तथा रक्तदोष का नाश करता है। साथ ही रक्तसंचार में वृद्धि करता है एवं मांसपेशियों का स्वास्थ्य, मानसिक शक्ति व संकल्पशक्ति को बढ़ाता है ।

रासायनिक रंगों से होली खेलने में प्रति व्यक्ति लगभग 35 से 300 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि सामूहिक प्राकृतिक-वैदिक होली में प्रति व्यक्ति लगभग 30 से 60 मि.ली. से कम पानी लगता है ।

इस प्रकार देश की जल-सम्पदा की हजारों गुना बचत होती है । पलाश के फूलों का रंग बनाने के लिए उन्हें इकट्ठे करनेवाले आदिवासियों को रोजी-रोटी मिल जाती है ।पलाश के फूलों से बने रंगों से होली खेलने से शरीर में गर्मी सहन करने की क्षमता बढ़ती है, मानसिक संतुलन बना रहता है ।

इतना ही नहीं, पलाश के फूलों का रंग रक्त-संचार में वृद्धि करता है, मांसपेशियों को स्वस्थ रखने के साथ-साथ मानसिक शक्ति व इच्छाशक्ति को बढ़ाता है । शरीर की सप्तधातुओं एवं सप्तरंगों का संतुलन करता है ।  (स्त्रोत : संत श्री आशारामजी आश्रम द्वारा प्रकाशित ऋषि प्रसाद पत्रिका)

आपको बता दें कि पलाश से वैदिक होली खेलने का अभियान हिन्दू संत आशाराम बापू ने शुरू किया था जिसके कारण केमिकल रंगों का और उससे फलने-फूलनेवाला अरबों रुपयों का दवाइयों का व्यापार प्रभावित हो रहा था ।

बापू आसारामजी के सामूहिक प्राकृतिक होली अभियान से शारीरिक मानसिक अनेक बीमारियों में लाभ होकर देश के अरबो रुपयों का स्वास्थ्य-खर्च बच रहा है । जिससे विदेशी कंपनियों को अरबों का घाटा हो रहा था इसलिए एक ये भी कारण है उनको फंसाने का । साथ ही उनके कार्यक्रमों में पानी की भी बचत हो रही है ।


पर मीडिया ने तो ठेका लिया है समाज को गुमराह करने का।  5-6 हजार लीटर प्राकृतिक रंग (जो कि लाखों रुपयों का स्वास्थ्य व्यय बचाता है) के ऊपर बवाल मचाने वाली मीडिया को शराब, कोल्डड्रिंक्स उत्पादन तथा कत्लखानों में गोमांस के लिए प्रतिदिन हो रहे अरबों-खरबों लीटर पानी की बर्बादी जरा भी समस्या नही लगती। ऐसा क्यों ???

कछ सालों से अगर गौर करें तो जब भी

हिन्दू त्यौहार नजदीक आता है तो दलाल मीडिया और भारत का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग हमारे हिन्दू त्यौहारों में खोट निकालने लग जाता है ।

जसे दीपावली नजदीक आते ही छाती कूट कूट कर पटाखों से होने वाले प्रदूषण का रोना रोने वाली मीडिया को 31 दिसम्बर को आतिशबाजियों का प्रदूषण नही दिखता ।आतिशबाजियों से क्या ऑक्सीजन पैदा होती है?

जन्माष्टमी पर दही हांडी कार्यक्रम नहीं हो लेकिन खून-खराबा वाला ताजिया पर आपत्ति नही है।

ऐसे ही शिवरात्रि के पावन पर्व पर दूध की बर्बादी की दलीलें देने वाली मीडिया हजारों दुधारू गायों की हत्या पर मौन क्यों हो जाती है?

अब होली आई है तो बिकाऊ मीडिया पानी बचत की दलीलें लेकर फिर उपस्थित होंगी । लेकिन पानी बचाना है तो साल में 364 दिन बचाओ पर पलाश की वैदिक होली अवश्य मनाओ । क्योंकि बदलना है तो अपना व्यवहार बदलो....त्यौहार नहीं ।

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नटफ्लिक्स की वेब सीरिज ने फिर से हिन्दू धर्मग्रंथ व बच्चों पर चोट किया...

13 मार्च 2021

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अमेरिकन कंपनी नेटफ्लिक्स ने हिन्दू भावनाओं से साथ कई बार खिलवाड़ किया है। उनकी छवि को नकारात्मक तरीके से पेश किया गया हो। एंटी हिन्दू नैरेटिव को स्थापित करने का प्रयास नेटफिक्स लगातार कर रहा है। ‘Ghoul' ,  ‘Sacred Games’ और ‘लैला’ इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।



वब सीरिज के माध्यम से लगातार एंटी-हिन्दू सामग्री दिखाने पर लोगों ने Netflix को Boycott करना शुरू किया है। सोशल मीडिया के जरिए कई बार लोगों ने नेटफ्लिक्स को देश में बैन करने की मांग की हैं।

नटफ्लिक्स की एक वेब सीरिज "मैंगो ड्रीम्स" में भारत के नक्शे को गलत दिखाया गया था। जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्से को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया है।  इसलिए नेटफ्लिक्स धर्म के साथ देशविरोधी भी बन गया है।

आपको बता दे कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स (Netflix) से वेब सीरिज ‘बॉम्बे बेगम्स (Bombay Begums)’ की स्ट्रीमिंग बंद करने को कहा। ऐसा नहीं होने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। दो ट्विटर हैंडल की तरफ से इस वेब सीरिज में बच्चों के गलत चित्रण को लेकर शिकायत मिलने पर यह कार्रवाई की गई है। साथ ही यूजर्स ने सीरिज के हिंदूफोबिक कंटेट को लेकर भी नाराजगी जताई है।

शीर्ष बाल अधिकार संस्था ने गुरुवार (11 मार्च 2021) को वेब सीरिज में बच्चों के अनुचित चित्रण का हवाला देते हुए नेटफ्लिक्स से इसकी स्ट्रीमिंग तुरंत बंद करने को कहा। साथ ही 24 घंटे के भीतर एक विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट भी पेश करने को कहा है। NCPCR ने कहा है कि यदि ओटीटी प्लेटफॉर्म ऐसा नहीं करती है तो वह कानूनी कार्रवाई को विवश होगी।

एनसीपीसीआर ने नोटिस में कहा है कि नाबालिगों के कैजुअल सेक्स को सामान्य बताने के बाद अब वेब सीरिज बच्चों के बीच ड्रग्स के सेवन को सामान्य दिखा रही है। आयोग ने कहा है कि वह बच्चों का इस तरह से चित्रण करने की अनुमति नहीं दे सकती। नोटिस में कहा गया है, “इस प्रकार की सामग्री के साथ सीरीज न केवल बच्चों के युवा दिमाग को दूषित करेगी, बल्कि इसका परिणाम अपराधियों के हाथों बच्चों के साथ दुर्व्यवहार और शोषण भी हो सकता है।”

आयोग को इस संबंध में दो ट्विटर हैंडल से शिकायत मिली थी। @DeepikaBhardwaj नामक हैंडल ने ‘बॉम्बे बेगम्स’ में बच्चों के चित्रण पर कड़ा एतराज जताया है। खासकर, जिस तरीके से बच्चों के बीच ड्रग्स के सेवन को दिखाया गया है।

एक अन्य लोकप्रिय ट्विटर हैंडल @GemsOfBollywood ने भी शिकायत की थी। उसने बताया था कि इस वेब सीरिज में लड़कियों के अपने शरीर के अंगों की तस्वीरें खींचकर सहपाठियों को भेजते दिखाया गया है। यह ट्विटर हैंडल फिल्म उद्योग के हिंदूफोबिक एजेंडे को बेनकाब करने के लिए जाना जाता है।

वेब सीरिज में एक तिलकधारी नेता को भगवद्गीता के हवाले से यह बताते दिखाया गया है कि पुरुष के भावना की तृप्ति ही स्त्री का सर्वोच्च धर्म है।

एनसीपीसीआर को किए गए इन ट्वीट्स सीपीसीआर (बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए आयोग) अधिनियम 2005 की धारा 13(1)(जे) के तहत कार्रवाई करने की मांग की गई थी। एनसीपीसीआर की नोटिस में कहा गया है, “नेटफ्लिक्स को बच्चों के संबंध में या बच्चों के लिए किसी भी सामग्री को स्ट्रीम करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। इसलिए, इस मामले को देखने के लिए आपको निर्देशित किया जाता है और तुरंत इस सीरीज की स्ट्रीमिंग रोकने के लिए कहा जाता है।”

‘बॉम्बे बेगम्स’ की स्क्रिप्ट अलंकृता श्रीवास्तव ने लिखी है और पूजा भट्ट मुख्य भूमिका में है। यह सीरिज मुंबई में विभिन्न क्षेत्रों की 5 महिलाओं के जीवन पर आधारित है। गौरतलब है कि यह पहला मौका नहीं है जब कोई वेब सीरिज अपने कंटेंट को लेकर विवादों में है। हाल ही में अमेजन प्राइम वीडियो की वेब सीरिज ‘तांडव’ हिंदूफोबिक कंटेट को लेकर विवादों में थी। इससे जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म पर रिलीज से पहले कंटेंट की स्क्रीनिंग पर जोर दिया था।

आपको बता दें कि हिन्दू नॅशनलिस्ट शिवसेना के आई टी सेल के सदस्य समेश सोलंकी ने 4 सितंबर को नेटफ्लिक्स के विरोध में एलटी मार्ग पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी। अपनी शिकायत में उन्होने कहा है कि अमेरिका की कंपनी नेटफ्लिक्स हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचा रही है। वेब सीरीज सेक्रेड गेम्स, लैला और घुल का उदाहरण देते हुए कहा है कि इन सीरियल्स में हिन्दुओं और भारत का गलत चित्रण किया गया है। 

नटफ्लिक्स हिंदू विरोधी तो है साथ में देशविरोधी भी है। देशवासियों को इसका बहिष्कार करना चाहिए और भारत सरकार को इसपर तुरंत प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए ऐसी जनता की मांग हैं।

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इकलौता ऐसा शासक, जिसका खौफ अंग्रेजी सेना में साफ-साफ दिखता था !!

12 मार्च 2021

azaadbharat.org

एक ऐसा भारतीय शासक जिसने अकेले दम पर ब्रिटिश हुकूमत को नाकों चने चबाने पर मजबूर कर दिया था। इकलौता ऐसा शासक, जिसका खौफ अंग्रेजी सेना में साफ-साफ दिखता था। एकमात्र ऐसा शासक जिसके साथ ब्रिटिश सेनापति हर हाल में बिना शर्त समझौता करने को तैयार थे। एक ऐसा शासक, जिसे अपनों ने ही बार-बार धोखा दिया, फिर भी उन्होंने जंग के मैदान में कभी हिम्मत नहीं हारी।



इतना महान था वो भारतीय शासक, फिर भी इतिहास के पन्नों में वो कहीं खोया हुआ है। उसके बारे में आज भी बहुत लोगों को जानकारी नहीं है। उसका नाम आज भी लोगों के लिए अनजान है। उस महान शासक का नाम है - यशवंतराव होलकर। यह उस महान वीरयोद्धा का नाम है, जिसकी तुलना विख्यात इतिहास शास्त्री एन एस इनामदार ने 'नेपोलियन' से की है।

पश्चिम मध्यप्रदेश की मालवा रियासत के महाराज यशवंतराव होलकर का भारत की आजादी के लिए किया गया योगदान महाराणा प्रताप और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से कहीं कम नहीं है। यशवतंराव होलकर का जन्म 1776 ई. में हुआ। इनके पिता थे - तुकोजीराव होलकर। होलकर साम्राज्य के बढ़ते प्रभाव के कारण ग्वालियर के शासक दौलतराव सिंधिया ने यशवंतराव के बड़े भाई मल्हारराव को मौत की नींद सुला दिया।

इस घटना ने यशवंतराव को पूरी तरह से तोड़ दिया था। उनका अपनों पर से विश्वास उठ गया। इसके बाद उन्होंने खुद को मजबूत करना शुरू कर दिया। ये अपने काम में काफी होशियार और बहादुर थे। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 1802 ई. में इन्होंने पुणे के पेशवा बाजीराव द्वितीय व सिंधिया की मिलीजुली सेना को मात दी और इंदौर वापस आ गए।

इस दौरान अंग्रेज भारत में तेजी से अपने पांव पसार रहे थे। यशवंत राव के सामने एक नई चुनौती सामने आ चुकी थी। भारत को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद कराना। इसके लिए उन्हें अन्य भारतीय शासकों की सहायता की जरूरत थी। वे अंग्रेजों के बढ़ते साम्राज्य को रोक देना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने नागपुर के भोंसले और ग्वालियर के सिंधिया से एकबार फिर हाथ मिलाया और अंग्रेजों को खदेड़ने की ठानी। लेकिन पुरानी दुश्मनी के कारण भोंसले और सिंधिया गद्दार ने उन्हें फिर धोखा दिया( इसी शाही परिवार का वंशज ज्योतिरादित्य सिंधिया आज भी भारत की संसद में मौजूद है) और यशवंतराव पुनः अकेले पड़ गए।

उन्होंने अन्य शासकों से फिर एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का आग्रह किया, लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं मानी। इसके बावजूद उन्होंने अकेले दम पर अंग्रेजों को छठी का दूध याद दिलाया। 8 जून 1804 ई. को उन्होंने अंग्रेजों की सेना को धूल चटाई। फिर 8 जुलाई 1804 ई. में कोटा से उन्होंने अंग्रेजों को खदेड़ दिया।

◆ श्रीमंत चक्रवर्ती महाराजा यशवंतराव होळकर

11 सितंबर 1804 ई. को अंग्रेज जनरल वेलेस्ले ने लॉर्ड ल्युक को लिखा कि यदि यशवंतराव पर जल्दी काबू नहीं पाया गया तो वे अन्य शासकों के साथ मिलकर अंग्रेजों को भारत से खदेड़ देंगे। इसी मद्देनजर नवंबर, 1804 ई. में अंग्रेजों ने दिग पर हमला कर दिया। इस युद्ध में भरतपुर के महाराज रंजित सिंह के साथ मिलकर उन्होंने अंग्रेजों को पुनः धूल चटाई। एक ब्रिटिश इतिहासकर के अनुसार उन्होंने 300 अंग्रेजों के नाक काट डाली थी।

अचानक रंजित सिंह ने भी यशवंतराव का साथ छोड़ दिया और अंग्रजों से हाथ मिला लिया। इसके बाद सिंधिया ने यशवंतराव के विजयी अभियान व बहादुरी देखते हुए उनसे हाथ मिलाया जिससे अंग्रेजों की चिंता बढ़ गई। लॉर्ड ल्युक ने लिखा कि यशवंतराव की सेना अंग्रेजों को मारने में बहुत आनंद लेती है। ततपश्चात अंग्रेजों ने यह फैसला किया कि यशवंतराव के साथ संधि से ही बात संभल सकती है। इसलिए उनके साथ बिना शर्त संधि की जाए। उन्हें जो चाहिए, दे दिया जाए। उनका जितना साम्राज्य है, सब लौटा दिया जाए। परन्तु यशवंतराव ने संधि से इंकार कर दिया।

व सभी शासकों को एकजुट करने में जुटे हुए थे। अंत में जब उन्हें सफलता नहीं मिली तो उन्होंने दूसरी चाल से अंग्रेजों को मात देने की सोची। इस मद्देनजर उन्होंने 1805 ई. में अंग्रेजों के साथ संधि कर ली। अंग्रेजों ने उन्हें स्वतंत्र शासक माना और उनके सारे क्षेत्र लौटा दिए। इसके बाद उन्होंने सिंधिया के साथ मिलकर अंग्रेजों को खदेड़ने का एक और प्लान बनाया। उन्होंने सिंधिया को खत लिखा, लेकिन सिंधिया दगेबाज निकले और वह खत अंग्रेजों को दिखा दिया।

ततपश्चात पूरा मामला फिर से बिगड़ गया। यशवंतराव ने हल्ला बोल दिया और अंग्रेजों को अकेले दम पर मात देने की पूरी तैयारी में जुट गए। इसके लिए उन्होंने भानपुर में गोला बारूद का कारखाना खोला। इसबार उन्होंने अंग्रेजों को जड़ से उखाड़ने की शपथ उठा ली, इसलिए दिन-रात मेहनत करने में जुट गए थे। लगातार मेहनत करने के कारण उनका स्वास्थ्य भी गिरने लगा। लेकिनने इस ओर ध्यान नहीं दिया और 28 अक्टूबर 1811 ई. में सिर्फ 35 साल की उम्र में वे स्वर्ग सिधार गए।

इस तरह से एक महान शासक का अंत हो गया। एक ऐसे शासक का जिसपर अंग्रेज कभी अधिकार नहीं जमा सके। एक ऐसे शासक का जिन्होंने अपनी छोटी उम्र को जंग के मैदान में झोंक दिया। यदि भारतीय शासकों ने उनका साथ दिया होता तो शायद तस्वीर कुछ और होती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और एक महान शासक यशवंतराव होलकर इतिहास के पन्नों में कहीं खो गया और खो गई उनकी बहादुरी, जो आज अनजान बनी हुई है।

आपसे निवेदन है कि उनके वीरत्व को बच्चों को बताए और प्रयास करें कि इतिहास के पन्नो पर भी उन्हें वह सम्मानजनक स्थान मिले जिसके वो हकदार है।

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भगवान शिवजी के 'तांडव नृत्य' को यूरोप ने माना ब्रह्मांडीय शक्ति

11 मार्च 2021

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यरोपीय देश हिन्दू धर्म की महानता को उजागर कर रहे हैं, पर यदि हमारे भारत देश में ऐसे होता, तो सेक्युलरवादी इस पर बवाल खड़ा कर इसका विरोध करते !



भगवान शिव की पूजा धार्मिक नजरिए से महत्वपूर्ण तो है ही, विज्ञान में भी इसकी अहमियत है। ऑस्ट्रियन मूल के अमेरिकन भौतिकी वैज्ञानिक और दार्शनिक फ्रिटजॉफ कैपरा ने शिवजी के स्वरूप नटराज के तांडव नृत्य को परमाणु की उत्पत्ति और विनाश से जोड़ा है। कैपरा ने 1972 में प्रकाशित अपनी किताब ‘मेन करेंट्स ऑफ मॉडर्न थॉट’ में ‘द डांस ऑफ शिव’ लेख में शिवजी के नृत्य और परमाणु के बीच समानता की चर्चा की थी। इसके बाद 8 जून 2004 को जेनेवा स्थित सर्न के यूरोपियन सेंटर फॉर रिसर्च इन पार्टिकल फिजिक्स में तांडव नृत्य करती नटराज की 2 मीटर ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया गया। इस मूर्ति को सर्न के साथ भारत के लंबे सहयोग का जश्न मनाने के लिए दिया गया था।

1●) शिव के तांडव में विज्ञान

शिवजी के नृत्य के दो रूप हैं। एक है लास्य, जिसे नृत्य का कोमल रूप कहा जाता है। दूसरा तांडव है, जो विनाश को दर्शाता है। भगवान शिव के नृत्य की अवस्थाएं सृजन और विनाश, दोनों को समझाती हैं। शिव का तांडव नृत्य ब्रह्मांड में हो रहे मूल कणों के उतार-चढ़ाव की क्रियाओं का प्रतीक है।

यरोपियन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्‍यूक्‍लियर रिसर्च यानी सर्न लेबोरेटरी के बाहर नटराज की मूर्ति रखी हुई है। नटराज की मूर्ति और ब्रह्मांडीय नृत्य के बारे में कैपरा ने बताया है कि वैज्ञानिक उन्‍नत तकनीकों का उपयोग करते हुए कॉस्‍मिक डांस का प्रारूप तैयार कर रहे हैं। कॉस्मिक डांस यानी भगवान शिव का तांडव नृत्य, जो विनाश और सृजन दोनों का प्रतीक है।

तांडव करते हुए नटराज के पीछे बना चक्र ब्रह्मांड का प्रतीक है। उनके दाएं हाथ का डमरू नए परमाणु की उत्पत्ति और बाएं हाथ में अग्नि पुराने परमाणुओं के विनाश की ओर संकेत करती है। इससे ये समझा जा सकता है कि, अभय मुद्रा में भगवान का दूसरा दायां हाथ हमारी सुरक्षा, जबकि वरद मुद्रा में उठा दूसरा बायां हाथ हमारी जरूरतों की पूर्ति सुनिश्चित करता है।

2●) पूजन सामग्री : जल, दूध, दही, शहद और फूल

उज्जैन के धर्म विज्ञान शोध संस्थान के वैज्ञानिकों ने शिवलिंग पर चढ़ाए जाने वाली पूजन सामग्री पर शोध किया है। शोध में दावा किया है कि न्यूक्लियर रिएक्टर और शिवलिंग में समानता होती है। ज्योतिर्लिंग से ज्यादा मात्रा में ऊर्जा निकलती है। उस ऊर्जा को नियंत्रित करने के लिए शिवलिंग पर लगातार जल चढ़ाया जाता है।

सस्थान के वरिष्ठ धर्म वैज्ञानिक डॉ. जगदीशचंद्र जोशी के अनुसार न्यूक्लियर में आग के पदार्थ कार्डिएक ग्लाएकोसाइट्स कैल्शियम ऑक्सीलेट, फैटी एसिड, यूरेकिन, टॉक्सिन पाए जाते हैं। इनसे पैदा होने वाली गर्मी को संतुलित करने के लिए ही शिव पूजा में मदार के फूल और बिल्व पत्र चढ़ाए जाते हैं, जो कि न्यूक्लियर ऊर्जा को संतुलित रखते हैं।

धर्म विज्ञान शोध संस्थान के वैभव जोशी के अनुसार दूध में फैट, प्रोटीन, लैक्टिक एसिड, दही में विटामिन्स, कैल्शियम, फॉस्फोरस और शहद में फ्रक्टोस, ग्लूकोज जैसे डाईसेक्राइड, ट्राईसेक्राइड, प्रोटीन, एंजाइम्स होते हैं वही दूध, दही और शहद शिवलिंग पर कवच बनाए रखते हैं। इसके साथ ही शिव मंत्रों से निकलने वाली ध्वनि सकारात्मक ऊर्जा को ब्रह्मांड में बढ़ाने का काम करती है। धर्म और विज्ञान पर अध्ययन करने वाली इस संस्था ने शिवलिंग पर चढ़ाए जाने वाली चीजों की प्रकृति और उनमें पाए जाने वाले तत्वों की वैज्ञानिक व्याख्या के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है।

3●) बिल्वपत्र से नियंत्रित होती है गर्मी

बिल्वपत्र से गर्मी नियंत्रित होती है। इसमें टैनिन, लोह, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नीशियम जैसे रसायन होते हैं। इससे बिल्वपत्र की तासीर बहुत शीतल होती है। तपिश से बचने के लिए इसका उपयोग फायदेमंद होता है। बिल्वपत्र का औषधीय उपयोग करने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। पेट के कीड़े खत्म होते हैं और शरीर की गर्मी नियंत्रित होती है।

4●) शिव के रूद्राक्ष में छुपा विज्ञान

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिषाचार्य पं. गणेश मिश्रा के अनुसार शिवपुराण की विद्येश्वर संहिता में बताया गया है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति शिवजी के आंसुओं से हुई है। वहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार रूद्राक्ष में पाए जाने वाले गुण मनुष्य के नर्वस सिस्टम को दुरुस्त रखते हैं।

रद्राक्ष में केमो फॉर्मेकोलॉजिकल नाम का गुण पाया जाता है। इस गुण से ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रहता है। इससे दिल की बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। रुद्राक्ष में आयरन, फॉस्फोरस, एल्युमीनियम, कैल्शियम, सोडियम और पोटैशियम गुण पर्याप्त मात्रा में होते हैं। रुद्राक्ष के ये गुण शरीर के नर्वस सिस्टम को

रखते हैं। स्त्रोत : दैनिक भास्कर

हमारी भारतीय संस्कृति की कितनी महिमा है और हमारे भगवान कितने महान हैं, वे विदेश के लोग भी जानने लगे हैं। लेकिन कुछ भारतवासी अभीतक समझ नहीं पा रहे हैं, अभी समय आ गया है कि हमारी संस्कृति की महिमा समझकर उसका अनुसरण एवं प्रचार-प्रसार करें।

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